पूजा संग्रह · Mixed · Devanagari

अकृत्रिम-चैत्यालय-पूजन

कविश्री नेम (पूजन विधि निर्देश) आठ करोड़ अरु छप्पन लाख, सहस सत्याणव चतुशत भाख | जोड़ इक्यासी जिनवर-थान, तीनलोक आह्वान करान || ॐ ह्रीं श्री त्रैलोक्यसम्बन्ध्यष्टकोटि-षट्पंचाशल्लक्ष-सप्तनवतिसहस्र-चतु: शतैकाशीति-अकृ​त्रिमजि...

कविश्री नेम
(पूजन विधि निर्देश)
आठ करोड़ अरु छप्पन लाख, सहस सत्याणव चतुशत भाख |
जोड़ इक्यासी जिनवर-थान, तीनलोक आह्वान करान ||
ॐ ह्रीं श्री त्रैलोक्यसम्बन्ध्यष्टकोटि-षट्पंचाशल्लक्ष-सप्तनवतिसहस्र-चतु: शतैकाशीति-अकृ​त्रिमजिनचैत्यालयानि !
अत्र अवतर अवतर संवौषट् ! (आह्वाननम्)
ॐ ह्रीं श्री त्रैलोक्यसम्बन्ध्यष्टकोटि-षट्पंचाशल्लक्ष-सप्तनवतिसहस्र-चतु: शतैकाशीति-अकृ​त्रिमजिनचैत्यालयानि !
अत्र तिष्ट तिष्ट ठ: ठ:! (स्थापनम्)
ॐ ह्रीं श्री त्रैलोक्यसम्बन्ध्यष्टकोटि-षट्पंचाशल्लक्ष-सप्तनवतिसहस्र-चतु: शतैकाशीति-अकृ​त्रिमजिनचैत्यालयानि !
अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्! (सन्निधिकरणम्)।
(त्रिभंगी छन्द)
क्षीरोदधि नीरं, उज्ज्वल छीरं, छान सुचीरं भरि झारी |
अतिमधुर लखावन, परम सुपावन, तृषा-बुझावन गुणभारी ||
वसु कोटि सु छप्पन, लाख सताणव, सहस चार शत इक्यासी |
जिन गेह अकृत्रिम, तिहुँ जग भीतर, पूजत पद ले अविनाशी ||
ॐ ह्रीं श्री त्रैलोक्यसम्बन्ध्यष्टकोटि-षट्पंचाशल्लक्ष-सप्तनवतिसहस्र-चतु: शतैकाशीति-अकृ​त्रिमजिनचैत्यालयेभ्यो जन्म-जरा-मृत्यु-विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।१।
मलयागिर पावन, चंदन बावन, ताप बुझावन घसि लीनो |
धरि कनक-कटोरी, द्वै-करजोरी, तुम पद-ओरी चित दीनो ||
वसु कोटि सु छप्पन, लाख सताणव, सहस चार शत इक्यासी |
जिन गेह अकृत्रिम, तिहुँ जग भीतर, पूजत पद ले अविनाशी ||
ॐ ह्रीं श्री त्रैलोक्यसम्बन्ध्यष्टकोटि-षट्पंचाशल्लक्ष-सप्तनवतिसहस्र-चतु: शतैकाशीति अकृ​त्रिम जिनचैत्यालयेभ्यो संसारताप-विनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।२।
बहुभाँति अनोखे, तंदुल चोखे, लखि निरदोखे हम लीने |
धरि कंचन-थाली, तुम गुणमाली, पुंज-विशाली कर दीने ||
वसु कोटि सु छप्पन, लाख सताणव, सहस चार शत इक्यासी |
जिन गेह अकृत्रिम, तिहुँ जग भीतर, पूजत पद ले अविनाशी ||
ॐ ह्रीं श्री त्रैलोक्यसम्बन्ध्यष्टकोटि-षट्पंचाशल्लक्ष-सप्तनवतिसहस्र-चतु: शतैकाशीति अकृ​त्रिम जिनचैत्यालयेभ्यो अक्षयपद-प्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा ।३।
शुभ पुष्प सुजाति, हैं बहुभाँति, अलि-लिपटाती लेय वरं |
धरि कनक रकेबी, कर गहि लेवी, तुम पद जुग की भेट धरं ||
वसु कोटि सु छप्पन, लाख सताणव, सहस चार शत इक्यासी |
जिन गेह अकृत्रिम, तिहुँ जग भीतर, पूजत पद ले अविनाशी ||
ॐ ह्रीं श्री त्रैलोक्यसम्बन्ध्यष्टकोटि-षट्पंचाशल्लक्ष-सप्तनवतिसहस्र-चतु: शतैकाशीति अकृ​त्रिम जिनचैत्यालयेभ्यो
कामबाण-विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।४।
खुरमा जु गिंदौड़ा, बरफी पेड़ा, घेवर मोदक भरि थारी |
विधिपूर्वक कीने, घृतमय भीने, खांड में लीने सुखकारी ||
वसु कोटि सु छप्पन, लाख सताणव, सहस चार शत इक्यासी |
जिन गेह अकृत्रिम, तिहुँ जग भीतर, पूजत पद ले अविनाशी ||
ॐ ह्रीं श्री त्रैलोक्यसम्बन्ध्यष्टकोटि-षट्पंचाशल्लक्ष-सप्तनवतिसहस्र-चतु: शतैकाशीति अकृ​त्रिम जिनचैत्यालयेभ्यो क्षुधारोग-विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।५।
मिथ्यात-महातम, छाय रह्यो हम, निज भव परिणति नहिं सूझे |
इह कारण पा के, दीप सजा के, थाल धरा के हम पूजें||
वसु कोटि सु छप्पन, लाख सताणव, सहस चार शत इक्यासी |
जिन गेह अकृत्रिम, तिहुँ जग भीतर, पूजत पद ले अविनाशी ||
ॐ ह्रीं श्री त्रैलोक्यसम्बन्ध्यष्टकोटि-षट्पंचाशल्लक्ष-सप्तनवतिसहस्र-चतु: शतैकाशीति अकृ​त्रिम जिनचैत्यालयेभ्यो मोहान्धकार -विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।६।
दशगंध कुटा के, धूप बनाके, निजकर लेके धरि ज्वाला |
तसु धूम उड़ाई, दश दशि छाई, बहु महकाई अति आला ||
वसु कोटि सु छप्पन, लाख सताणव, सहस चार शत इक्यासी |
जिन गेह अकृत्रिम, तिहुँ जग भीतर, पूजत पद ले अविनाशी ||
ॐ ह्रीं श्री त्रैलोक्यसम्बन्ध्यष्टकोटि-षट्पंचाशल्लक्ष-सप्तनवतिसहस्र-चतु: शतैकाशीति अकृ​त्रिम जिनचैत्यालयेभ्यो अष्टकर्म-दहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।७।
बादाम छुहारे, श्रीफल धारे, पिस्ता प्यारे द्राख वरं |
इन आदि अनोखे, लखि निरदोखे, थाल संजोखे भेंट धरं ||
वसु कोटि सु छप्पन, लाख सताणव, सहस चार शत इक्यासी |
जिन गेह अकृत्रिम, तिहुँ जग भीतर, पूजत पद ले अविनाशी ||
ॐ ह्रीं श्री त्रैलोक्यसम्बन्ध्यष्टकोटि-षट्पंचाशल्लक्ष-सप्तनवतिसहस्र-चतु: शतैकाशीति अकृ​त्रिम जिनचैत्यालयेभ्यो मोक्षफल-प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।८।
जल चंदन तंदुल, कुसुम रु नेवज, दीप धूप फल थाल रचूं |
जयघोष कराऊँ, बीन बजाऊँ, अर्घ्य चढ़ाऊँ खूब नचूं ||
वसु कोटि सु छप्पन, लाख सताणव, सहस चार शत इक्यासी |
जिन गेह अकृत्रिम, तिहुँ जग भीतर, पूजत पद ले अविनाशी ||
ॐ ह्रीं श्री त्रैलोक्यसम्बन्ध्यष्टकोटि-षट्पंचाशल्लक्ष-सप्तनवतिसहस्र-चतु: शतैकाशीति अकृ​त्रिम जिनचैत्यालयेभ्यो अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।९।
अथ प्रत्येक अर्घ्य: (चौपाई)
अधोलोक जिन-आगम साख, सात कोड़ि अरु बहतर लाख |
श्रीजिन-भवन महाछवि देइ, ते सब पूजूं वसु-विधि लेइ ||
ॐ ह्रीं श्री अधोलोकसम्बन्धि -सप्तकोटि-द्विसप्तति-लक्षाकृ​त्रिम-श्रीजिन- चैत्यालयेभ्य: अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
(अडिल्ल छन्द)
मध्यलोक जिन मंदिर ठाठ, साढ़े चार शतक अरु आठ |
ते सब पूजूं अर्घ चढ़ाय, मन-वच-तन त्रय-जोग मिलाय ||
ॐ ह्रीं मध्यलोकसम्बन्धि-चतुशताष्टपंचाशत-श्रीजिनचैत्यालयेभ्य: अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
ऊर्ध्वलोक के माँहिं भवन जिन जानिये |
लाख चौरासी सहस सत्याणव मानिये ||
ता पे धरि तेईस जजूं सिर नाय के |
कंचन-थाल मँझार जलादिक लाय के ||
ॐ ह्रीं श्री ऊर्ध्वलोकसम्बन्धि-चतुरशीतिलक्ष-सप्तनवतिसहस्र-त्रयविंशति श्रीजिनचैत्यालयेभ्य: अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
(गीता छन्द)
वसु कोटि छप्पन लाख ऊपर, सहस सत्याणव मानिये |
शत-च्यार पे गिन ले इक्यासी, भवन-जिनवर जानिये ||
तिहुँलोक-भीतर सासते, सुर-असुर-नर पूजा करें |
तिन भवन को हम अर्घ लेके, पूजिहें जग-दु:ख हरें ||
ॐ ह्रीं श्री त्रैलोक्यसम्बन्धि- अष्टकोटि-षट्पंचाशल्लक्ष-सप्तनवतिसहस्र- चतु:शतैकाशीति अकृ​त्रिम श्रीजिनचैत्यालयेभ्य: अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
जयमाला (दोहा)
अब वरणूँ जयमालिका, सुनो भव्य चित लाय |
जिनमंदिर तिहुँलोक के, देहुँ सकल दरशाय ||१||
(पद्धरि छन्द)
जय अमल अनादि अनंत जान, अनिर्मित जु अकृत्रिम अचलमान |
जय अजय अखंड अरूपधार, षट्द्रव्य नहीं दीसे लगार ||२||
जय निराकार अविकार होय, राजत अनंत परदेश सोय |
जय शुद्ध-सुगुण अवगाहपाय, दशदिशा-महिं इहविध लखाय ||३||
यह भेद अलोकाकाश जान, तामध्य लोक-नभ तीन मान |
स्वयमेव बन्यो अविचल अनंत, अविनाशि अनादि जु कहत संत ||४||
पुरुषाकार ठाड़ो निहार, कटि-हाथ धारि द्वैपग पसार |
दच्छिन उत्तरदिशि सर्व ठौर, राजू जु सात भाख्यो निचोर ||५||
जय पूर्व अपरिदिशि घाटबाधि, सुन कथन कहूँ ताको जु साधि |
लखि श्वभ्रतले राजू जु सात, मधिलोक एक राजू रहात ||६||
फिर ब्रह्मसुरग राजू जु पाँच, भू सिद्ध एक राजू जु साँच |
दश चार ऊँच राजू गिनाय, षट्द्रव्य लये चतुकोण पाय ||७||
तसु वातवलय लपटाय तीन, इह निराधार लखियो प्रवीन |
त्रसनाडी ता-मधि जान खास, चतुकोन एक राजू जु व्यास ||८||
राजू उत्तंग चौदह प्रमान, लखि स्वयंसिद्ध रचना महान् |
ता-मध्य जीव त्रस आदि देव, निजथान पाय तिष्ठे भलेय ||९||
लखि अधोभाग में श्वभ्रथान, गिन सात कहे आगम प्रमान |
षट्थान-माँहिं नारकि बसेय, इक श्वभ्र-भाग फिर तीन भेय ||१०||
तसु अधोभाग नारकि रहाय, पुनि ऊर्ध्वभाग द्वय थानपाय |
बस रहे भवन व्यंतर जु देव, पुर हर्म्य छजे रचना स्वमेव ||११||
तिह थान गेह जिनराज-भाख, गिन सातकोटि बहत्तर जु लाख |
ते भवन नमूं मन वचन काय, गति श्वभ्र हरनहारे लखाय ||१२||
पुनि मध्यलोक गोलाअकार, लखि द्वीप-उदधि-रचना विचार |
गिन असंख्यात भाखे जु संत, लखि संभुरमन सबके जु अंत ||१३||
इक राजु व्यास में सर्व जान, मधिलोक तनों इह कथन मान |
सब मध्य द्वीप जम्बू गिनेय, त्रयदशम रुचिकवर नाम लेय ||१४||
इन तेरह में जिनधाम जान, शत-चार अठावन हैं प्रमान |
खग देव असुर नर आय आय, पद-पूज जाय सिरनाय-जाय ||१५||
जय ऊर्ध्वलोक सुर कल्पवास, तिह-थान छजे जिनभवन खास |
जय लाख चुरासी पे लखेय, जय सहस सत्याणव और ठेय ||१६||
जय बीस तीन पुनि जोड़ देय, जिनभवन अकृत्रिम जान लेय |
प्रतिभवन एक रचना कहाय, जिनबिंब एकशत आठ पाय ||१७||
शतपंच-धनुष उन्नत लसाय, पद्मासन-युत वर ध्यान लाय |
सिर तीन-छत्र शोभित विशाल, त्रय-पादपीठ मणिजटित लाल ||१८||
भामंडल की छवि कौन गाय, पुनि चँवर ढुरत चौसठि लखाय |
जय दुंदुभि-रव अद्भुत सुनाय, जय पुष्पवृष्टि गंधोदकाय ||१९||
जय तरु-अशोक शोभा भलेय, मंगल विभूति राजत अमेय |
घट-तूप छजे मणिमाल पाय, घट-धूप धूम दिग-सर्व छाय ||२०||
जय केतु पंक्ति सोहें महान्, गंधर्व देव गुन करत गान |
सुर जनम लेत लखि अवधि पाय, तिसथान प्रथम पूजन कराय ||२१||
जिनगेह-तनो वरनन अपार, हम तुच्छ बुद्धि किम लहें पार |
जय देव जिनेसुर जगत्भूप, नमि ‘नेम’ मँगें निज देहरूप ||२२||
तीनलोक में सासते, श्री जिनभवन विचार |
मन-वच-तन करि शुद्धता, पूजूं अरघ उतार ||
ॐ ह्रीं श्री त्रैलोक्यसम्बन्ध्यष्टकोटि-षट्पंचाशल्लक्ष-सप्तनवतिसहस्रचतु: शतैकाशीति अकृत्रिम जिनचैत्यालयेभ्य: जयमाला-पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
तिहुँजग भीतर श्री जिनमंदिर, बने अकृत्रिम अति सुखदाय |
नर सुर खग करि वंदनीक जे, तिनको भविजन पाठ कराय ||
धन-धान्यादिक संपति तिनके, पुत्र-पौत्र-सुख होत भलाय |
चक्रीसुर खग इन्द्र होयके, करम-नाश शिवपुर-सुख थाय ||
।। इत्याशीर्वाद: पुष्पांजलिं क्षिपेत् ।।
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