आरती : शब्दार्थ और संक्षिप्त व्याख्या
आरती शब्द का अर्थ :निरंजन, मनोरथ, कामना, इच्छा, विनती | इष्ट-मूर्ति के समक्ष, श्रद्धाभाव पूर्वक, दीपज्योति आदि का विधिवत चक्रायण-विधि से आवर्त लेना “आरती उतारना” कहलाता है | वह स्तोत्र जो आरती के समय पढ़ा गया अथवा पाठ कि...
इष्ट-मूर्ति के समक्ष, श्रद्धाभाव पूर्वक, दीपज्योति आदि का विधिवत चक्रायण-विधि से आवर्त लेना “आरती उतारना” कहलाता है | वह स्तोत्र जो आरती के समय पढ़ा गया अथवा पाठ किया गया है, “आरती” कहलाती है | किसी मूर्ति या विग्रह पर, प्रज्ज्वलित दीप को, किसी विधि विशेष से घुमाने का क्रम अपनाया जाता है |
इस विधान में चरणों की ओर चार बार, नाभि की दो बार, मुख-मण्डल की ओर एक बार तथा सर्वांग में सात बार दीपज्योति को घुमाया जाता है |
ज्योति प्रज्ज्वलन में घृत-दीपक या कपूर का उपयोग किया जाता है | दीप-बातियों की संख्या एक से लेकर कर्इ सौ तक हो सकती है | देवार्चन के अतिरिक्त, गुरु-पूजन एवं विवाह आदि में भी आरती-विधान का उपक्रम रहता है |
आरती-पूजा-विधान, मानस-उपासना की एक विधि है जो आचार्यों द्वारा समर्थित रही है | यह आरती-भाव, स्वामी और सेवक दोनों के एक्य पर भी विशेष बल देता है | आरती छंद में रागमय शब्दों की योजना गायक को भाव-विभोर एवं विशेष आनंदित करती है, जिनवाणी में अंकित ‘इहि विधि मंगल आरति कीजे….’ प्रमुख पंच परमेष्ठी आरती पद हैं |