स्तोत्र संग्रह · Prakrit · Devanagari

जाप्य-मंत्र-सूची

35 अक्षरों का मंत्र :- णमो अरिहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आइरियाणं णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं || 16 अक्षरों का मंत्र :- अरिहंत सिद्ध आइरिय उवज्झाय साहू 6 अक्षरों के मंत्र :- (1) अरहंत सिद्ध (2) अरहंत सि सा (3) ओं न...

35 अक्षरों का मंत्र :-
णमो अरिहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आइरियाणं
णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं ||
16 अक्षरों का मंत्र :-
अरिहंत सिद्ध आइरिय उवज्झाय साहू
6 अक्षरों के मंत्र :-
(1) अरहंत सिद्ध (2) अरहंत सि सा
(3) ओं नम: सिद्धेभ्य: (4) नमोऽर्हत्सिद्धेभ्य:
5 अक्षरों का मंत्र :-
अ सि आ उ सा
4 अक्षरों के मंत्र :
(1) अरहंत (2) अ-सि-साहू
2 अक्षरों के मंत्र :-
(1) सिद्ध (2) ओं ह्रीं
1 अक्षर का मंत्र
ओं (ओम्) (यह ध्वनि पाँचों परमेष्ठी नामों के पहले अक्षर मिलाने पर बनती है | यथा अरिहंत का पहिला अक्षर ‘अ’, अशरीरी (सिद्ध) का ‘अ’, आचार्य का ‘आ’, उपाध्याय का ‘उ’, तथा मुनि (साधु) का ‘म्’, इस प्रकार अ+अ+आ+उ+म् = ओं |
(यह ‘ओ3म्’ इसप्रकार भी लिखा पाया जाता है, जो कि जैन परम्परा सम्मत नहीं है।)
रत्नत्रय-जाप्य का मंत्र :-
ओं ह्रीं श्री सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्रेभ्यो नम: |
दशलक्षण का जाप्य मंत्र :-
ओं ह्रीं अर्हन्मुखकमल-समुद्गताय उत्तमक्षमा-धर्माङ्गाय नम: |
अथवा
ओं ह्रीं उत्तम-क्षमा- धर्माङ्गाय नम: |
इसी प्रकार ‘उत्तम-मार्दव’ आदि धर्मों के मंत्र जानना चाहिए ।
षोडशकारण-जाप्य-मंत्र :-
ओं ह्रीं श्री दर्शनविशुद्धि-आदि-षोडशकारणेभ्यो नम: |
नंदीश्वर-व्रत (आष्टाह्निक व्रत) का जाप्य-मंत्र :-
(1) ओं ह्रीं नंदीश्वरसंज्ञाय नम: |
(2) ओं ह्रीं अष्टमहाविभूतिसंज्ञाय नम: |
(3) ओं ह्रीं त्रिलोकसारसंज्ञाय नम: |
(4) ओं ह्रीं चतुर्मुखसंज्ञाय नम: |
(5) ओं ह्रीं पंच-महालक्षण-संज्ञाय नम: |
(6) ओं ह्रीं स्वर्गसोपान-संज्ञाय नम:|
(7) ओं ह्रीं श्री सिद्धचक्राय नम: |
(8) ओं ह्रीं इन्द्रध्वज-संज्ञाय नम: |
पुष्पांजलि-व्रत-जाप्य-मंत्र :-
ओं ह्रीं पंचमेरु-सम्बन्धि-अशीति-जिनालयेभ्यो नम: |
रोहिणी-व्रत-जाप्य-मंत्र :
ओं ह्रीं श्री वासुपूज्य-जिनेन्द्राय नम: |
ऋषि-मंडल-जाप्य-मंत्र :-
ओं ह्रां ह्रीं ह्रुं ह्रूं ह्रें ह्रैं ह्रौं ह्र: अ सि आ उ सा सम्यग्दर्शन- ज्ञान-चारित्रेभ्यो ह्रीं नम: |
सिद्धचक्र-विधान का जाप्य मंत्र :-
ओं ह्रीं अर्हं अ-सि-आ-उ-सा नम: स्वाहा |
त्रैलोक्यमंडल-विधान का जाप्य-मंत्र :-
ओं ह्रीं श्रीं अर्हं अनाहत-विद्याधिपाय त्रैलोक्यनाथाय नम: सर्व शांतिं कुरु-कुरु स्वाहा |
लघु शांति-मंत्र :-
ओं ह्रीं अर्हं अ-सि-आ-उ-सा सर्वशांतिं कुरु-कुरु स्वाहा |
वेदी-प्रतिष्ठा, कलशारोहण, बिम्ब-स्थापन जैसे अवसरों का मंत्र:-
ओं ह्रीं श्रीं क्लीं अर्हं अ सि आ उ सा अनाहतविद्यायै
अरिहंताणं ह्रीं सर्वशान्तिं कुरु-कुरु स्वाहा |
रविव्रत-जाप्य-मंत्र :-
ओं ह्रीं नमो भगवते चिन्तामणि-पार्श्वनाथाय सप्तफण-मंडिताय मम ऋद्धिं सिद्धिं वृद्धिं सौख्यं कुरु-कुरु स्वाहा ।
रविव्रत-लघु-जाप्य-मंत्र :-
ओं ह्रीं अर्हं श्री चिन्तामणि पार्श्वनाथाय नम: ।
मनोरथ सिद्धिदायक-मंत्र :-
ओं ह्रीं श्रीं अर्हं नम: ।
ऐश्वर्यदायक-मंत्र :
ओं ह्रीं अ सि आ उ सा नम: स्वाहा ।
(सूर्योदय के समय पूर्व-दिशा में मुख करके प्रतिदिन 108 बार शुद्ध-भाव से जपें ।)
सर्वसिद्धिदायक-मंत्र :-
ओं ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं श्री वृषभनाथ तीर्थंकराय नम:।
(समस्त कार्यो की सिद्धि-हेतु प्रतिदिन श्रद्धापूर्वक 108 बार जपना चाहिये ।)
सर्वग्रह शांति-मंत्र :-
ओं ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्र: अ सि आ उ सा सर्व शांतिं कुरु कुरु स्वाहा | (प्रात:काल जाप करें।)
रोग-निवारक-मंत्र :-
ओं ह्रीं सकल रोगहराय श्री सन्मतिदेवाय नम: |
शांतिकारक-मंत्र :-
ओं ह्रीं परमशांति विधायक श्री शांतिनाथाय नम: |
अथवा
ओं ह्रीं श्री अनंतानंत परमसिद्धेभ्यो नम: |
नवग्रह-शांति के लिए जाप्य-मंत्र :-
सूर्य के लिए :- ओं णमो सिद्धाणं | (10 हजार)
चंद्र के लिए :- ओं णमो अरिहंताण | (10 हजार)
मंगल के लिए :– ओं णमो सिद्धाणं | (10 हजार)
बुध के लिए :- ओं णमो उवज्झायाण | (10 हजार)
गुरु बृहस्पति :– ओं णमो आइरियाणं | (10 हजार)
शुक्र के लिए :– ओं णमो अरिहंताणं | (10 हजार)
शनि के लिए :– ओं णमो लोए सव्व साहूणं | (10 हजार)
केतु के लिए :– ओं णमो सिद्धाणं | (10 हजार)
राहू के लिए :– ओं णमो अरिहंताणं, ओं णमो सिद्धाणं, ओं णमो आइरियाणं, ओं णमो उवज्झायाणं, ओं णमो लोए सव्व साहूणं | (10 हजार)
पापभक्षिणी-विद्यारूप मंत्र :-
ओं अर्हन्मुख कमलवासिनी पापात्म-क्षयंकरि, श्रुतज्ञान-ज्वाला-सहस्र प्रज्ज्वलिते सरस्वति! मम पापं हन हन, दह दह, क्षां क्षीं क्षूं क्षौं क्ष: क्षीरवर-धवले अमृत-संभवे वं वं हूं हूं स्वाहा |
(इस मंत्र के जप के प्रभाव से साधक का चित्त प्रसत्रता धारण करता है, पाप नष्ट हो जाते हैं, और आत्मा में पवित्र-भावनाओं का संचार होता है।)
महामृत्युंजय-मंत्र :-
ओं ह्रां णमो अरिहंताणं, ओं ह्रीं णमो सिद्धाणं,ओं ह्रूं णमो आइरियाणं, ओं ह्रौं णमो उवज्झायाणं, ओं ह्र: णमो लोए सव्वसाहूणं, मम सर्व-ग्रहारिष्टान् निवारय निवारय अपमृत्युं घातय घातय सर्वशांतिं कुरु कुरु स्वाहा |
(विधि : दीप जलाकर धूप देते हुए नैष्ठिक रहकर इस मंत्र का स्वयं जाप करें या अन्य द्वारा करावें। यदि अन्य व्यक्ति जाप करे तो ‘मम’ के स्थान पर उस व्यक्ति का नाम जोड़ लें जिसके लिए जाप करना है।) इस मंत्र का सवा लाख जाप करने से ग्रह-बाधा दूर हो जाती है। इस मंत्र के कम से कम 31 हजार जाप करना चाहिये। जाप के अनंतर दशांश आहुति देकर हवन भी करें।)
शांतिमंत्र जाप्य-विधि
जहाँ 1 है वहाँ णमो अरिहंताणं, जहाँ 2 है वहाँ णमो सिद्धाणं, जहाँ 3 है, वहाँ णमो आइरियाणं, जहाँ 4 है, वहाँ णमो उवज्झायाणं, जहाँ 5 है, वहाँ णमो लोए सव्वसाहूणं पढ़ना चाहिए। प्रतिदिन कम से कम 21 बार जाप्य अवश्य कर लेना चाहिए। यह जाप परम मांगलिक और शांति का देनेवाला है। मंत्र-जाप को करते समय स्वच्छता का विशेष-ध्यान रखना चाहिये ।
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