दिगम्बर जैन मुनि
तत्ववेत्ताओं ने साधुओं के लिए लिखा है कि ‘मुनि’ यथाजात रूप है | जैसा जन्मजात बालक नग्नरूप होता है, वैसा नग्नरूप दिगम्बर मुद्रा का धारक है, वह अपने मन के भावों से, अपनी वाणी से, व शरीर के किसी भी अंग से तिलतुषमात्र भी परि...
मनुष्य की आदर्श स्थिति दिगम्बरत्व है | दिगम्बरत्व प्रकृति का रूप है | दिगम्बरत्व का वास्तविक मूल्य मानव-समाज में सदाचार की सृष्टि करना है | नग्नता और सदाचार का अविनाभावी संबंध है | सदाचार के अभाव में नग्नता का कोई मूल्य नहीं, क्योंकि नंगा तन और नंगा मन ही मनुष्य की आदर्श स्थिति है | आदर्श मनुष्य सर्वथा निर्दोष और विकार-शून्य होता है | इसका आशय यह है कि जिन-भावना से युक्त नग्नता ही पूज्य है |
दिगम्बर साधु प्रकृति के अनुरूप हैं; उनका किसी से द्वेष नहीं है| वे सबके हैं और सभी उनके हैं | वे प्रज्ञापुंज और तपोधन लोक-कल्याण में निरत रहते हैं तथा सर्वप्रिय, सदाचार की मूर्ति होते हैं |
वर्तमान समय में मुनिजन विचरण करते हुए दिखाई दे जाते हैं, यह हम लोगों का परम सौभाग्य है | वास्तव में यदि कहा जाय कि ये साधु ही चलते-फिरते सिद्ध हैं तो कोई
अत्युक्ति नहीं होगी | किसी ने लिखा है –
धन वैभव के जिन्हें भाये न आलय हैं,
ये चारित्र के सच्चे हिमालय हैं |
मन्दिर की मूर्तियां तो मौन रहती हैं ,
ये तो चलते-फिरते जिनालय हैं ||
ऐसे महान संतों का दर्शन अतिशय पुण्य का फल है |