निर्वाण क्षेत्र बड़ी पूजा
(पूजन विधि निर्देश) (दोहा छन्द) वंदूं श्री भगवान् को, भाव भगति सिर नाय | पूजा श्री निर्वाण की, सिद्धक्षेत्र सुखदाय ||१|| भरत-क्षेत्र के विषैं, सिद्धक्षेत्र जो जान | तिनि को मैं वंदन करूं, भव भव होइ सहाय ||२|| (स्थापना) (...
(दोहा छन्द)
वंदूं श्री भगवान् को, भाव भगति सिर नाय |
पूजा श्री निर्वाण की, सिद्धक्षेत्र सुखदाय ||१||
भरत-क्षेत्र के विषैं, सिद्धक्षेत्र जो जान |
तिनि को मैं वंदन करूं, भव भव होइ सहाय ||२||
(स्थापना)
(अडिल्ल छन्द)
परम महा उत्कृष्ट मोक्ष मंगल सही,
आदि अनादि-संसार भानि मुक्ति लही |
तिनि के चरन अरु क्षेत्र जजूं शिवदाय ही ,
आह्वानन विधि ठानि बार त्रय गाय ही ||१||
ॐ ह्रीं श्री भरतक्षेत्र-सम्बन्धि निर्वाणक्षेत्र! अत्र अवतर अवतर संवौषट्! (आह्वाननम्)
ॐ ह्रीं श्री भरतक्षेत्र-सम्बन्धि निर्वाणक्षेत्र! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:! (स्थापनम्)
ॐ ह्रीं श्री भरतक्षेत्र-सम्बन्धि निर्वाणक्षेत्र! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् (सन्निधिकरणम्)
अष्टक (पंचमेरु पूजा की चाल में)
शीतल उज्ज्वल निर्मल नीर, पूजूं सिद्धक्षेत्र गम्भीर |
अब मैं शरण गही तुम आन, भवदधि पार उतारन जान |
लहूँ निर्वाण, पूजूं मन-वच-तन धरि ध्यान ||
ॐ ह्रीं श्री भरतक्षेत्र सम्बन्धि निर्वाणक्षेत्र! जन्म-जरा-मृत्यु-विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।१।
चंदन घिसूं कपूर मिलाय, भव-आताप तुरति मिट जाय |
अब मैं शरण गही तुम आन, भवदधि पार उतारन जान |
लहूँ निर्वाण, पूजूं मन-वच-तन धरि ध्यान ||
ॐ ह्रीं श्री भरतक्षेत्र सम्बन्धि निर्वाणक्षेत्र ! संसारताप-विनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।२।
अमल अखंडित अक्षत धोय, पूजूं सिद्धक्षेत्र सुख होय |
अब मैं शरण गही तुम आन, भवदधिपार उतारन जान |
लहूँ निर्वाण, पूजूं मन-वच-तन धरि ध्यान ||
ॐ ह्रीं श्री भरतक्षेत्र सम्बन्धि निर्वाणक्षेत्र! अक्षयपद-प्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा ।३।
पुष्प सुगंध मधुप झंकार, पूजूं सिद्धक्षेत्र मँझार |
अब मैं शरण गही तुम आन, भवदधिपार उतारन जान |
लहूँ निर्वाण, पूजूं मन-वच-तन धरि ध्यान ||
ॐ ह्रीं श्री भरतक्षेत्र सम्बन्धि निर्वाणक्षेत्र ! कामबाण-विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।४।
वर नैवेद्य मिष्ट अधिकाय, पूजूं सिद्धक्षेत्र समवाय |
अब मैं शरण गही तुम आन, भवदधि पार उतारन जान |
लहूँ निर्वाण, पूजूं मन-वच-तन धरि ध्यान ||
ॐ ह्रीं श्री भरतक्षेत्र सम्बन्धि निर्वाणक्षेत्र ! क्षुधारोग-विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।५।
दीप रतनमय-तेज सुहाय, पूजूं सिद्धक्षेत्र समवाय |
अब मैं शरण गही तुम आन, भवदधि पार उतारन जान |
लहूँ निर्वाण, पूजूं मन-वच-तन धरि ध्यान ||
ॐ ह्रीं भरतक्षेत्र सम्बन्धि निर्वाणक्षेत्र ! मोहांधकार-विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।६।
धूप सुगंध लहूँ दश अंग, पूजूं सिद्धक्षेत्र सरवंग |
अब मैं शरण गही तुम आन, भवदधि पार उतारन जान |
लहूँ निर्वाण, पूजूं मन-वच-तन धरि ध्यान ||
ॐ ह्रीं श्री भरतक्षेत्र सम्बन्धि निर्वाणक्षेत्र ! अष्टकर्म-दहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।७।
फल प्रासुक उत्तम अतिसार, सिद्धक्षेत्र वाँछित दातार |
अब मैं शरण गही तुम आन, भवदधि पार उतारन जान |
लहूँ निर्वाण, पूजूं मन-वच-तन धरि ध्यान ||
ॐ ह्रीं श्री भरतक्षेत्र सम्बन्धि निर्वाणक्षेत्र ! मोक्षफल-प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।८।
अर्घ करूं निज माफिक शक्ति, पूजूं सिद्धक्षेत्र करि भक्ति |
अब मैं शरण गही तुम आन, भवदधि पार उतारन जान |
लहूँ निर्वाण, पूजूं मन-वच-तन धरि ध्यान ||
ॐ ह्रीं श्री भरतक्षेत्र सम्बन्धि निर्वाणक्षेत्र! अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।९।
तीरथ सिद्धक्षेत्र के सबै, वाँछा मेरी पूरो अबै |
अब मैं शरण गही तुम आन, भवदधि पार उतारन जान |
लहूँ निर्वाण, पूजूं मन-वच-तन धरि ध्यान ||
ॐ ह्रीं श्री भरतक्षेत्र सम्बन्धि निर्वाणक्षेत्र! महार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।१०।
प्रत्येक निर्वाणक्षेत्र के अर्घ्य
(अडिल्ल छन्द)
श्री आदीश्वर देव गये निर्वाण जू |
श्री कैलाश शिखर के ऊपर मान जू ||
तिनि के चरण जजूं मैं मन-वच-काय से |
भवदधि उतरूं पार शरण तुम आय के ||
ॐ ह्रीं श्री कैलाशपर्वत सेती श्रीऋषभदेव-तीर्थंकर दशहजारमुनिसहित मुक्ति पधारे और वहाँ तें और मुनि मुक्ति पधारे होहिं, तिनि को अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।१।
चंपापुर तें मुक्ति गये, जिनराज जी |
वासुपूज्य महाराज करम-क्षयकार जी ||
तिनि के चरण जजूं मैं मन-वच-काय से |
भवदधि उतरूं पार शरण तुम आय के ||
ॐ ह्रीं श्री चंपापुर सेती श्रीवासुपूज्य-तीर्थंकर हजार मुनिसहित मुक्ति पधारे और वहाँ तें और मुनि मुक्ति पधारे होहिं, तिनि को अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।२।
श्री गिरनार-शिखर जग में विख्यात जी |
सिद्ध-वधू के नाथ गये नेमिनाथ जी ||
तिनि के चरण जजूं मैं मन-वच-काय से |
भवदधि उतरूं पार शरण तुम आय के ||
ॐ ह्रीं श्री गिरनार शिखर सेती श्रीनेमिनाथ-तीर्थंकर पाँच सौ छत्तीस मुनिसहित मुक्ति पधारे, तिनि को अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।३।
पावापुर सरवर के बीच महावीर जी |
सिद्ध भये हनि कर्म करें सुर-सेव जी ||
तिनि के चरण जजूं मैं मन-वच-काय से |
भवदधि उतरूं पार शरण तुम आयके ||
ॐ ह्रीं श्री पावापुर के पदम-सरोवर मध्य सेती श्रीमहावीर-तीर्थंकर छत्तीस मुनिसहित मुक्ति पधारे, तिनि को अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।४।
श्री सम्मेद-शिखर शिवपुर को द्वार जी |
बीस जिनेश्वर मुक्ति गये भवतार जी ||
तिनि के चरण जजूं मैं मन-वच-काय से |
भवदधि उतरूं पार शरण तुम आयके ||
ॐ ह्रीं श्री सम्मेद शिखर सेती श्रीबीस-तीर्थंकर मुक्ति पधारे और उस शिखर तें और मुनि मुक्ति पधारे होहिं, तिनि को अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।५।
नंगानंग कुमार दोय राजकुमार जू |
मुक्ति गये सोनागिरि जग-हितकार जू ||
साढ़े पाँच कोडि गये शिवराज जी |
पूजूं मन-वच-काय लहूँ सुखसार जी ||
तिनि के चरण जजूं मैं मन-वच-काय से |
भवदधि उतरूं पार शरण तुम आयके ||
ॐ ह्रीं श्री सोनागिरि पर्वत सेती नंगानंग कुमारादि साढ़े पांच कोड़ि मुनि मुक्ति पधारे, तिनको अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।६।
राम हनु सुग्रीव नील महानील जी |
गवय गवाक्ष इत्यादि गये शिवतीर जी ||
कोड़ि निन्यानवे मुकति तुंगीगिरि पाय जी |
तिनि के चरण जजूं मैं मन-वच-काय से |
भवदधि उतरूं पार शरण तुम आयके ||
ॐ ह्रीं श्री तुंगीगिरि पर्वत सेती श्रीरामचन्द्र-हनुमान-सुग्रीव-नील-महानील- गवय-गवाक्ष इत्यादि निन्यानवे कोड़ि मुनि मुक्ति पधारे, तिनि को अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।७।
वरदत्तादि वरंग मुनीन्द्र सुनाम जी |
सायरदत्त महान् महा गुणधाम जी ||
तारवर नगर तें मुक्ति गये सुखदाय जी |
तीन कोड़ि अरु लाख पचास सुगाय जी ||
तिनि के चरण जजूं मैं मन-वच-काय से |
भवदधि उतरूं पार शरण तुम आयके ||
ॐ ह्रीं श्री तारवरनगर सेती श्रीवरदत्तादि साढ़े तीन कोड़ि मुनि मुक्ति पधारे, तिनि को अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।८।
श्री गिरनार-शिखर जग में विख्यात है।
कोटि बहत्तर अधिकै अरु सौ सात है।।
शंभु प्रद्युम्न अनिरुद्ध मुक्ति को पाय जी।
तिनि के चरण जजूं मैं मन-वच-काय से।
भवदधि उतरूं पार शरण तुम आयके।।
ॐ ह्रीं श्री गिरनार-शिखर सेती शंभु कुमार प्रद्युम्नकुमार अनिरुध्दकुमारादि बहत्तर कोड़ि सात सौ मुनि मुक्ति पधारे, तिनि को अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।९।
रामचंद्र के सुत दोय जिनदीक्षा धरी |
लाडनरिंद आदि मुनि सब कर्मन हरी ||
पावागढ़ के शिखर ध्यान धरिके सही |
पाँच कोड़ि मुनि सहित परम पदवी लही ||
तिनि के चरण जजूं मैं मन-वच-काय से |
भवदधि उतरूं पार शरण तुम आय के ||
ॐ ह्रीं श्री पावागढ़ शिखरसेती लाडनरिंद आदि पाँच कोड़ि मुनि मुक्ति पधारे, तिनि को अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।१०।
पांडव तीन बड़े राजा तुम जानियो |
आठ कोडि मुनि चरमशरीरी मानियो ||
श्री शत्रुंजय शिखर मुक्ति वर पाय जी |
तिनि के चरण जजूं मैं मन-वच-काय से |
भवदधि उतरूं पार शरण तुम आय के ||
ॐ ह्रीं श्री शत्रुंजय शिखरसेती पांडव आदि आठ कोड़ि मुनि मुक्ति पधारे, तिनि को अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।११।
श्री गजपंथ शिखर पर्वत सुखधाम है |
मुक्ति गये बलभद्र-सात अभिराम है ||
आठ कोड़ि मुनि-सहित नमूं मन लाय के |
तिनि के चरण जजूं मैं मन-वच-काय से |
भवदधि उतरूं पार शरण तुम आय के ||
ॐ ह्रीं श्री गजपंथ शिखर सेती सात बलभद्र सहित आठ कोड़ि मुनि मुक्ति पधारे, तिनि को अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।१२।
रावण के सुत आदि पंच कोड़ि जानिये |
ऊपर लाख पचास परमसुख मानिये ||
रेवा नदी के तीर मुक्ति में जायके |
तिनि के चरण जजूं मैं मन-वच-काय से |
भवदधि उतरूं पार शरण तुम आय के ||
ॐ ह्रीं श्री रेवा नदी के तीर सेती रावण के सुत आदि साढ़े पाँच कोड़ि मुनि मुक्ति पधारे, तिनि को अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।१३।
द्वै-चक्री दश काम कुमार महाबली |
रेवा नदी के पच्छिम कूट सिद्ध है भली ||
साढ़े तीन कोड़ि मुनि शिव को पायके |
तिनि के चरण जजूं मैं मन-वच-काय से |
भवदधि उतरूं पार शरण तुम आय के ||
ॐ ह्रीं श्री रेवा नदी के पश्चिम भाग तें सिद्धवरकूट सेती चक्री दश कामदेव आदि साढ़े तीन कोड़ि मुनि मुक्ति पधारे, तिनि को अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।१४।
दक्षिण-दिशि में चूल उतंग शिखर जहाँ |
बड़वानी बड़नयर तहाँ शोभित महा ||
इन्द्रजीत अरु कुंभकरण व्रत धारि के |
मुक्ति गये वसुकर्म जीति सुखकारि के ||
तिनि के चरण जजूं मैं मन-वच-काय से |
भवदधि उतरूं पार शरण तुम आय के ||
ॐ ह्रीं श्री बड़वानी की दक्षिण दिशा में चूलगिरि शिखर सेती इन्द्रजीत कुंभकरण मुनि मुक्ति पधारे, तिनि को अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।१५।
चेलना नदी के तीर व पावाशिखर जी।
स्वर्णभद्र-मुनि चार, बड़ी है ऋद्धि जी।।
तहाँ तें परम धाम के सुख को पायके।
तिनि के चरण जजूं मैं मन-वच-काय से।
भवदधि उतरूं पार शरण तुम आय के।।
ॐ ह्रीं श्री चेलना नदी के तीर पावागिरि शिखर सेती स्वर्णभद्रादि चार मुनि मुक्ति पधारे, तिनि को अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।१६।
फल होड़ी बड़गाँव अनूप जहाँ बसे |
पच्छिम दिसि में द्रोण महा पर्वत लसे ||
गुरुदत्तादि मुनीश्वर शिव को पाय के |
तिनि के चरण जजूं मैं मन-वच-काय से |
भवदधि उतरूं पार शरण तुम आयके ||
ॐ ह्रीं श्री पफलहोड़ी बड़गांव की पश्चिम दिशा में द्रोणगिरि पर्वत सेती गुरुदत्तादि मुनि मुक्ति पधारे, तिनि को अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।१७।
व्याल-महाव्याल मुनीश्वर दोय हैं |
नागकुमार मिलाय तीन ऋषि होय हैं ||
श्री अष्टापद शिखर तें मुक्ति में जाय जी |
तिनि के चरण जजूं मैं मन-वच-काय से |
भवदधि उतरूं पार शरण तुम आयके ||
ॐ ह्रीं श्री अष्टापद सेती बाल महाबाल नागकुमार तीन मुनि मुक्ति पधारे और वहाँ तें और मुनि मुक्ति पधारे होहिं तिनि को अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।१८।
अचलापुर की दिशि ईशान महा बसे |
तहाँ मेढगिरि शिखर महा पर्वत लसे ||
तीन कोड़ि अरु लाख पचास महामुनी |
मुक्ति गये धरि ध्यान करम अरि तिन हनी ||
तिनि के चरण जजूं मैं मन-वच-काय से |
भवदधि उतरूं पार शरण तुम आयके ||
ॐ ह्रीं श्री अचलापुर की ईशान दिशा में मेंढगिरि (मुक्तागिरि) पर्वत के शिखर सेती साढ़े तीन कोड़ि मुनि मुक्ति पधारे तिनि को अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।१९।
वंशस्थल-वन पश्चिम कुंथ पहार है |
कुलभूषण देशभूषण मुनि सुखकार हैं ||
तहाँ तें शुक्ल ध्यान धरि मुक्ति में जाय जी |
तिनि के चरण जजूं मैं मन-वच-काय से |
भवदधि उतरूं पार शरण तुम आयके ||
ॐ ह्रीं श्री वंशस्थल वन की पश्चिमदिशा में कुंथलगिरि शिखर सेती कुलभूषण देशभूषण मुनि मोक्ष पधारे, तिनि को अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।२०।
जसरथ राजा के सुत पंच-शतक कहे |
देश कलिंग मँझार महामुनि ते भये ||
शुक्लध्यान तें मुक्ति-रमनि सुख पाय जी |
तिनि के चरण जजूं मैं मन-वच-काय से |
भवदधि उतरूं पार शरण तुम आयके ||
ॐ ह्रीं श्री कलिंग देश सेती जसरथ राजा के पाँच सौ पुत्र मुनि होय मुक्ति पधारे, तिनि को अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।२१।
कोटि-शिला एक दक्षिण दिशि में है सही |
निहचै सिद्धक्षेत्र है श्री जिनवर कही ||
कोटि मुनीश्वर मुक्ति गये सुख पाय जी |
तिनि के चरण जजूं मैं मन-वच-काय से |
भवदधि उतरूं पार शरण तुम आयके ||
ॐ ह्रीं श्री दक्षिण दिशि में कोटि-शिला सेती कोड़ि मुनि मुक्ति पधारे, तिनि को अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।२२।
समवसरण श्री पार्श्व जिनेश्वरदेव को |
करें सुरासुर सेव परमपद लेव को ||
रेसिंदीगिर उत्तम थान सुपाय जी |
वरदत्तादि पाँच मुनि मुक्ति सुजाय जी ||
तिनि के चरण जजूं मैं मन-वच-काय से |
भवदधि उतरूं पार शरण तुम आयके ||
ॐ ह्रीं श्री पार्श्वनाथ स्वामी के समवसरण-स्थल के निकट रेसिंदीगिर (नैनागिर) शिखर सेती वरदत्तादि पाँच मुनि मुक्ति पधारे, तिनि को अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।२३।
पोदनपुर को राज त्याग मुनि जे भये |
बाहुबलि स्वामी तहाँ तें सिद्ध भये ||
तिनि के चरण जजूं मैं मन-वच-काय से |
भवदधि उतरूं पार शरण तुम आयके ||
ॐ ह्रीं श्री पोदनपुर का राज त्याग बाहुबलि जी मुनि हो मुक्ति पधारे तिनि को अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।२४।
श्री तीर्थंकर चतुर् – बीस भगवान् हैं |
गर्भ-जन्म-तप-ज्ञान भये निरवान हैं ||
तिनि के चरण जजूं मैं मन-वच-काय से |
भवदधि उतरूं पार शरण तुम आयके ||
ॐ ह्रीं श्री पंचकल्याणकधारी चौबीस तीर्थंकर भगवाननि को अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।२५।
तीन लोक में तीरथ जे सुखदाय हैं |
तिनि प्रति वंदूं भावसहित सिर नायके ||
तिनि के चरण जजूं मैं मन-वच-काय से |
भवदधि उतरूं पार शरण तुम आयके ||
ॐ ह्रीं श्री तीन लोक में जे जे तीर्थ हैं तिनि को अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।२६।
अथ जयमाला
(पद्धरि छन्द)
श्री आदीश्वर वंदूं महान्, कैलास-शिखर तें मोक्ष जान |
चंपापुर तें श्री वासुपूज्य, तिन मुक्ति लही अति हर्ष हूज्य ||
गिरिनार नेमजी मुक्ति पाय, पावापुर तें श्री वीरराय |
सम्मेद-शिखर श्री मुक्तिद्वार, श्री बीस जिनेश्वर मोक्ष धार ||
सोनागिर साढ़े पाँच कोड़ि, तुंगीगिरि राम हनू सु जोड़ि |
निन्याणव कोड़ि मुक्ति मँझार, तिनि के हम चरण नमें त्रिकाल ||
वरदत्तादि वरंग मुनेन्द्र चंद, तहाँ सायरदत्त महान् विंद |
तारवर-नयर तें मोक्ष पाय, तिनि के चरननि हम सिर नमाय ||
शम्भू प्रद्युम्न अनिरुद्ध भाय, गिरिनार-शिखर तें मोक्ष पाय |
बहत्तर कोड़ि सौ सात जान, तिनका मैं मन वच करूँ ध्यान ||
श्रीरामचंद्र के दोऊ पूत, अरु पाँच कोड़ि मुनि-सहित हूत |
लाड नरिंद इत्यादि जान, श्री पावागढ़ तें मोक्ष थान ||
श्री अष्ट-कोड़ि मुनिराज जान, पांडव त्रय बड़ि राजा महान् |
श्री शत्रुंजय तें मुक्ति पाय, तिनि को मैं वंदूं सिर नमाय ||
गजपंथ शिखर जग में विशाल, मुनि आठ कोड़ि हूजे दयाल |
बलभद्र सात मुक्ति सु जाय, तिनि को हम मन वच शीश नाय ||
रावण के सुत अरु पाँच कोड़ि, पंचास लाख ऊपरि सु जोड़ि |
रेवातट तें तिन मुक्ति लीन, करि शुक्लध्यान तें कर्म-क्षीन ||
द्वै चक्रवर्ति दश कामदेव, आहूत कोड़ि मुनिवर सु एव |
रेवा के पच्छिम कूट जानि, तिन वरी मुक्ति वसु कर्म हानि ||
दक्षिण-दिश में गिरि चूल जानि, तहाँ इन्द्रजीत कुंभकरण मानि |
ते मुक्ति गए वसु कर्म जीत, सो सिद्धक्षेत्र वंदूं विनीत ||
पावागिर शिखर मँझार जान, तहाँ स्वर्णभद्र मुनि चार मान |
तिनि मुक्तिपुरी को गमन कीन, शिवमारग हमको सोधि दीन ||
फल होड़ी बड़गाँव सु अनूप, पश्चिम दिसि द्रोणगिरि रूप |
गुरुदत्तादिक शिवपद लहाय, तिनि को हम वंदें सीस नाय ||
व्याल महाव्याल मुनीश दोइ, श्री नागकुमार मिलि तीन होइ |
श्री अष्टापद तें मुक्ति होई, तिनि आठ कर्म-मल को सु धोइ ||
अचलापुर की दिसि में ईशान, तहाँ मेंढगिरि नामा प्रधान |
मुनि तीन कोड़ि ऊपरि सु जोई, पंचास लाख मिलि मुक्ति होइ ||
वंशस्थलवन कुंथु-पहार, कुलभूषण-देशभूषण कुमार |
भारी उपसर्ग कर्यो वितीत, तिनि मुक्ति लई अरि कर्म जीत ||
जसरथ के सुत सत पंच सार, कलिंगदेश तें मुक्ति धार |
मुनि कोटिशिला तें मुक्ति लीन, तिनको वंदन मन वचन कीन ||
वरदत्तादिक पाँचों मुनीश, तिनि मुक्ति लई नित नमूं शीश |
श्री बाहुबलि बल अधिक जान, वसु-कर्म नाशि के मोक्ष थान ||
जहँ पंचकल्याण जिनेन्द्रदेव, तिनि की हम निति माँगे सुसेव |
यह अरज गरीबन की दयाल, निर्वाण देऊ हमको सु हाल ||
ॐ ह्रीं श्री भरतक्षेत्र-सम्बन्धि-निर्वाणक्षेत्रेभ्य: जयमाला-पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
(अडिल्ल छन्द)
यह गुणमाल महान् सु भविजन गाइयो |
स्वर्ग-मुक्ति सुखदाय कंठ में लाइयो ||
या तें सब सुख होय सुजस को पायके |
भवदधि उतरूं पार शरण प्रभु आयके ||
(दोहे)
नरभव उत्तम पायके, अवसर मिलियो मोहि |
चोखा-ध्यान लगायके, सरन गही प्रभु तोहि ||१||
बालक-सम हम बुद्धि है, भक्ति थकी गुणगाय |
भूल-चूक तुम सोधियो, सुनियो सज्जन भाय ||२||
औगुन तुम मति लीजियो, गुण गह लीजो मीत |
पूजा नितप्रति कीजियो, कर जीवन सों प्रीत ||३||
संवत् अष्टादश शतक, सत्तरि एक महान् |
भादों कृष्ण जु सप्तमी, पूरण भयो सुजान ||४||
।। इति श्री बड़ी निर्वाणक्षेत्र-पूजा सम्पूर्णम् ।।
।। इत्याशीर्वाद: पुष्पांजलिं क्षिपेत् ।।