मंगलाष्टक स्तुति
आचार्यश्री आनंदसागर ‘मौनप्रिय’ (ध्वनि : आचार्यश्री आनंदसागर ‘मौनप्रिय’) (गीता छन्द) श्री पंचपरमेष्ठी वंदन अरिहन्त हैं भगवन्त पूजित इन्द्र, श्री सिद्धीश्वरा | आचार्य जिनशासन-प्रभावक, पूज्य पाठक ऋषिवरा || सिद्धांत पाठनलीन...
(ध्वनि : आचार्यश्री आनंदसागर ‘मौनप्रिय’)
(गीता छन्द)
श्री पंचपरमेष्ठी वंदन
अरिहन्त हैं भगवन्त पूजित इन्द्र, श्री सिद्धीश्वरा |
आचार्य जिनशासन-प्रभावक, पूज्य पाठक ऋषिवरा ||
सिद्धांत पाठनलीन मुनिवर, रत्नत्रय आराधका |
परमेष्ठी पंच प्रतिदिवस, होवें सदा मंगलकरा ||
श्रीमान् सुर असुरेन्द्र मुकुट मणि प्रभा उद्योतिका |
नख इन्दु भास्वत पद कमल, प्रवचन समुद्र शशिकरा ||
अरिहन्त सिद्ध सुसूरि पाठक, साधु सकल जिनेश्वरा |
स्तुत्य योगी जन सुहित, गुरु पंच हों मंगलकरा ||१||
सम्यक्त्व दृग सज्ज्ञान चारित, अमलरत्न वसुंधरा |
मुक्तिश्री शुभ नगर नाथ, जिनेन्द्र मुक्तिप्रद वरा ||
सद्धर्म सूक्ति सुधा अखिल जिनबिम्ब आलय सुखकरा |
त्रयविध चतुर्विध धर्म, हम सबको हो नित मंगलकरा ||२||
त्रयलोक में विख्यात जिनपति, नाभिसुतादि सर्व जिनवरा |
श्रीमान् भरतेश्वरादिक, बारह सकल चक्रीश्वरा ||
विष्णु प्रतिविष्णु सकल, बलभद्र आदिक नर वरा |
त्रेसठ शलाका वरपुरुष, हम सभी को मंगलकरा ||३||
सर्वोषधि ऋद्धि धरें जो, तप करें सम्यक् सदा |
अष्टांग विपुल निमित्तज्ञाता, चतुर वाँछा नही कदा ||
शुभ ज्ञान पंच सुबलत्रय धारी मुनीश्वर भयहरा |
बुद्धि क्रिया तप विक्रियौषधि सहित ऋषिवर हितकरा ||४||
ज्योतिषी व्यन्तर भवनवासी, अमरगृह चैत्यालया |
मेरू कुलाचल जम्बुवृक्ष औ’, शाल्मलि इक्ष्वाकरा ||
वक्षार विजयारध सुपर्वत, कुण्डलादि गिरिवरा |
पर्वत सुनंदीश्वर मनुसोत्तर, बिम्ब आलय हितकरा ||५||
कैलास पर्वत वृषभ की, श्री वीर की पावापुरी |
चम्पापुरी वासुपूज्य जिन की, बीस जिन सम्मेदगिरी ||
गिरनार पर्वत नेमिनाथ की, शोभती मुक्ति स्थली |
चौबीस जिन के मुक्तिस्थल, होवें सदा मंगलमयी ||६||
गर्भावतरण समय प्रभु का, जो हुआ उत्सव महा |
जन्माभिषेक समय प्रभु का, जो किया उत्सव अहा ||
परिनिष्क्रमण कैवल्यप्राप्ति, में हुआ उत्सव अहा |
कैवल्यपुर प्रवेश उत्सव, आनंद मंगल नित करा ||७||
सद्धर्म के सुप्रभाव से, जिन चक्रवर्ती बलधरा |
भोगीन्द्र कृष्णादिक महा नर, जन्म लेते इस धरा ||
सद्धर्महीन मनुज नरक में, दु:ख सहते ही रहें |
स्वर्गादि सुख रमणीय पदमय, धर्म जग जन हित करे ||८||
माहात्म्य : उपसंहार
यह मंगलाष्टक सम्पत्ति, सौभाग्यदायी जिनेन्द्र का |
तीर्थर्करों के पंच कल्याणक, महोत्सव में सदा ||
प्रत्यूष बेला में जो पढ़ते, और सुनते हैं नरा |
वे सुजन चउ पुरुषार्थ शोभित, सुलभ हो मुक्तिवरा ||