श्री ऋषभनाथ-जिन पूजा
(पूजन विधि निर्देश) (अडिल्ल) परमपूज्य वृषभेष स्वयंभू देव जू | पिता नाभि मरुदेवि करें सुर सेव जू | कनक-वरण तन-तुंग धनुष-पनशत तनो | कृपासिंधु इत आइ तिष्ठ मम दु:ख हनो |१| ॐ ह्रीं श्रीआदिनाथ जिन ! अत्र अवतरत अवतरत संवौषट्! (...
(अडिल्ल)
परमपूज्य वृषभेष स्वयंभू देव जू |
पिता नाभि मरुदेवि करें सुर सेव जू |
कनक-वरण तन-तुंग धनुष-पनशत तनो |
कृपासिंधु इत आइ तिष्ठ मम दु:ख हनो |१|
ॐ ह्रीं श्रीआदिनाथ जिन ! अत्र अवतरत अवतरत संवौषट्! (आह्वाननम्)
ॐ ह्रीं श्रीआदिनाथ जिन ! अत्र तिष्ठत तिष्ठत ठ: ठ:! (स्थापनम्)
ॐ ह्रीं श्रीआदिनाथ जिन ! अत्र मम सन्निहितो भवत भवत वषट्! (सन्निधिकरणम्)
अष्टक
हिमवनोद्भव-वारि सु धारिके, जजत हूँ गुन-बोध उचारिके |
परमभाव-सुखोदधि दीजिये, जन्म-मृत्यु-जरा क्षय कीजिये ||
ॐ ह्रीं श्री वृषभदेवजिनेन्द्राय जन्म-जरा-मृत्यु-विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।१।
मलय-चंदन दाहनिकंदनं, घसि उभै कर मैं करि वंदनं |
जजत हूँ प्रशमाश्रय दीजिये, तपत ताप-तृषा छय कीजिये ||
ॐ ह्रीं श्री वृषभदेवजिनेन्द्राय संसारताप-विनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।२।
अमल-तंदुल खंड-विवर्जितं, सित निशेष महिमामय तर्जितं |
जजत हूँ तसु पुंज धराय जी, अखय-संपति द्यो जिनराय जी ||
ॐ ह्रीं श्री वृषभदेवजिनेन्द्राय अक्षयपद-प्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा ।३।
कमल चंपक केतकि लीजिये, मदन-भंजन भेंट धरीजिये |
परमशील महा-सुखदाय हैं, समर-सूल निमूल नशाय हैं ||
ॐ ह्रीं श्री वृषभदेवजिनेन्द्राय कामबाण-विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।४।
सरस-मोदन-मोदक लीजिये, हरन-भूख जिनेश जजीजिये |
सकल आकुल अंतक-हेतु हैं, अतुल शांत-सुधारस देतु हैं ||
ॐ ह्रीं श्री वृषभदेवजिनेन्द्राय क्षुधारोग-विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।५।
निविड मोह-महातम छाइयो, स्व-पर-भेद न मोहि लखाइयो |
हरन-कारण दीपक तास के, जजत हूँ पद केवल-भास के ||
ॐ ह्रीं श्री वृषभदेवजिनेन्द्राय मोहांधकार-विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।६।
अगर चंदन आदिक लेय के, परम-पावन गंध सुखेय के |
अगनि-संग जरे मिस-धूम के, सकल-कर्म उड़े यह घूम के ||
ॐ ह्रीं श्री वृषभदेवजिनेन्द्राय अष्टकर्म-दहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।७।
सुरस पक्व मनोहर पावने, विविध ले फल पूज रचावने |
त्रिजगनाथ कृपा अब कीजिये, हमहिं मोक्ष-महाफल दीजिये ||
ॐ ह्रीं श्री वृषभदेवजिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।८।
जल-फलादि समस्त मिलायके, जजत हूँ पद मंगल-गायके |
भगत-वत्सल दीनदयालजी, करहु मोहि सुखी लखि हालजी ||
ॐ ह्रीं श्री वृषभदेवजिनेन्द्राय अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।९।
पंचकल्याणक-अर्घ्यावली
(छन्द द्रुतविलम्बित तथा सुन्दरी)
असित दोज अषाढ़ सुहावनो, गरभ-मंगल को दिन पावनो |
हरि-सची पितु-मातहिं सेवही, जजत हैं हम श्री जिनदेव ही ||
ॐ ह्रीं आषाढ़कृष्ण-द्वितीयादिने गर्भमंगल-प्राप्ताय श्री वृषभदेवाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।१।
असित चैत सु नौमि सुहाइयो, जनम-मंगल ता दिन पाइयो |
हरि महागिरि पे जजियो तबै, हम जजें पद-पंकज को अबै ||
ॐ ह्रीं चैत्रकृष्ण-नवमीदिने जन्ममगंल-प्राप्ताय श्रीवृषभदेवाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।२।
असित नौमि सु चैत धरे सही, तप विशुद्ध सबै समता गही |
निज सुधारस सों भर लाइके, हम जजें पद अर्घ चढ़ाइके ||
ॐ ह्रीं चैत्रकृष्ण-नवमीदिने दीक्षामगंल-प्राप्ताय श्रीवृषभदेवाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।3।
असित फागुन ग्यारसि सोहनो, परम-केवलज्ञान जग्यो भनो |
हरि-समूह जजें तहँ आइके, हम जजें इत मंगल-गाइके ||
ॐ ह्रीं फाल्गुनकृष्ण-एकादश्यां केवलज्ञान-प्राप्ताय श्रीवृषभदेवाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।४।
असित चौदसि माघ विराजर्इ, परम मोक्ष सुमंगल साजर्इ |
हरि-समूह जजें कैलाशजी, हम जजें अति धार हुलास जी ||
ॐ ह्रीं माघकृष्ण-चतुर्दश्यां मोक्षमंगल-प्राप्ताय श्रीवृषभदेवाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।५।
जयमाला
(छन्द घत्तानंद)
जय जय जिनचंदा, आदि-जिनंदा, हनि भवफंदा कंदा जू |
वासव-शत-वंदा धरि आनंदा, ज्ञान-अमंदा नंदा जू |१|
(छन्द मोतियादाम)
त्रिलोक-हितंकर पूरन पर्म, प्रजापति विष्णु चिदातम धर्म |
जतीसुर ब्रह्मविदाबंर बुद्ध, वृषंक अशंक क्रियाम्बुधि शुद्ध |२|
जबै गर्भागम मंगल जान, तबै हरि हर्ष हिये अति आन |
पिता-जननी पद-सेव करेय, अनेक-प्रकार उमंग भरेय |३|
जन्मे जब ही तब ही हरि आय, गिरेन्द्रविषैं किय न्हौन सुजाय |
नियोग समस्त किये तित सार, सु लाय प्रभू पुनि राज-अगार |४|
पिता कर सोंपि कियो तित नाट, अमंद अनंद समेत विराट |
सुथान पयान कियो फिर इंद, इहाँ सुर सेव करें जिनचंद |५|
कियो चिरकाल सुखाश्रित राज, प्रजा सब आनंद को तित साज |
सुलिप्त सुभोगिनि में लखि जोग, कियो हरि ने यह उत्तम योग |६|
निलंजन-नाच रच्यो तुम पास, नवों रस-पूरित भाव-विलास |
बजे मिरदंग दृमा-दृम जोर, चले पग झारि झनांझन जोर |७|
घनाघन घंट करे धुनि मिष्ट, बजे मुहचंग सुरान्वित पुष्ट |
खड़ी छिन पास छिनहि आकाश, लघु छिन दीरघ आदि विलास |८|
ततच्छन ताहि विलै अविलोय, भये भव तें भवभीत बहोय |
सुभावत भावन बारह भाय, तहाँ दिव-ब्रह्म-रिषीश्वर आय |९|
प्रबोध प्रभू सु गये निज-धाम, तबे हरि आय रची शिवकाम |
कियो कचलौंच प्रयाग-अरण्य, चतुर्थम ज्ञान लह्यो जग-धन्य |१०|
धर्यो तब योग छमास-प्रमान, दियो श्रेयांस तिन्हें इखु-दान |
भयो जब केवलज्ञान जिनेंद्र, समोसृत-ठाठ रच्यो सु धनेंद्र |११|
तहाँ वृष-तत्त्व-प्रकाशि अशेष, कियो फिर निर्भय-थान प्रवेश |
अनंत-गुनातम श्री सुखराश, तुम्हें नित भव्य नमें शिव-आश |१२|
(छन्द घत्तानंद)
यह अरज हमारी सुन त्रिपुरारी, जन्म-जरा-मृतु दूर करो |
शिव-संपति दीजे ढील न कीजे, निज लख लीजे कृपा धरो |१३|
ॐ ह्रीं श्रीवृषभदेवजिनेन्द्राय जयमाला-पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
(छन्द आर्या)
जो ऋषभेश्वर पूजे, मन-वच-तन भाव शुद्ध कर प्रानी |
सो पावे निश्चै सों, भुक्ति औ’ मुक्ति सार सुख थानी |१४|
।। इत्याशीर्वाद: पुष्पांजलिं क्षिपेत्।।