पूजा संग्रह · Mixed · Devanagari

श्री कुंथुनाथ-जिन पूजा

(पूजन विधि निर्देश) (छन्द माधवी तथा किरीट-वर्ण 14 मात्रा) अज-अंक अजै-पद राजे निशंक, हरे भव-शंक निशंकित-दाता। मदमत्त-मतंग के माथे गँथे मतवाले, तिन्हें हने ज्यों अरिहाता। गजनागपुरै लियो जन्म जिन्हौं, रवि के प्रभु नंदन श्री...

(पूजन विधि निर्देश)
(छन्द माधवी तथा किरीट-वर्ण 14 मात्रा)
अज-अंक अजै-पद राजे निशंक, हरे भव-शंक निशंकित-दाता।
मदमत्त-मतंग के माथे गँथे मतवाले, तिन्हें हने ज्यों अरिहाता।
गजनागपुरै लियो जन्म जिन्हौं, रवि के प्रभु नंदन श्रीमति-माता।
सह-कुंथु सुकुंथुनि के प्रतिपालक, थापूं तिन्हें जुत-भक्ति विख्याता।
ॐ ह्रीं श्री कुंथुनाथजिनेन्द्र ! अत्र अवतरत अवतरत संवौषट्! (आह्वाननम्)
ॐ ह्रीं श्री कुंथुनाथजिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठत तिष्ठत ठ: ठ:! (स्थापनम्)
ॐ ह्रीं श्री कुंथुनाथजिनेन्द्र ! अत्र मम सन्निहितो भवत भवत वषट्! (सन्निधिकरणम्)
(चाल-लावनी मरहठी की, लाला मनसुखरायजी कृत)
कुंथु सुन अरज दास-केरी, नाथ सुन अरज दास-केरी ।
भव-सिन्धु पर्यो हूं नाथ, निकारो बाँह-पकर मेरी ।।
प्रभु सुन अरज दासकेरी, नाथ सुन अरज दास-केरी ।
जगजाल-पर्यो हूं वेगि निकारो, बाँह पकर मेरी ।।
सुर-सरिता को उज्ज्वल-जल भरि, कनक-भृंग भेरी ।
मिथ्या-तृषा निवारन-कारन, धरूं धार नेरी ।।
ॐ ह्रीं श्रीकुंथुनाथजिनेन्द्राय जन्म-जरा-मृत्यु-विनाशाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।१।
बावन-चंदन कदलीनंदन, घसिकर गुन टेरी।
तपत मोह-नाशन के कारन, धरूं चरन नेरी।।
कुंथु सुन अरज दास-केरी, नाथ सुन अरज दास-केरी।
भव-सिन्धु पर्यो हूं नाथ, निकारो बाँह-पकर मेरी।।
ॐ ह्रीं श्रीकुंथुनाथजिनेन्द्राय भवताप-विनाशाय चदनं निर्वपामीति स्वाहा ।२।
मुक्ताफल-सम उज्ज्वल अक्षत, सहित मलय लेरी।
पुंज धरूं तुम चरनन आगे, अखय-सुपद देरी।।
कुंथु सुन अरज दास-केरी, नाथ सुन अरज दास-केरी।
भव-सिन्धु पर्यो हूं नाथ, निकारो बाँह-पकर मेरी।।
ॐ ह्रीं श्रीकुंथुनाथजिनेन्द्राय अक्षयपद-प्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा ।३।
कमल केतकी बेला दौना, सुमन सुमन-सेरी।
समर-शूल निरमूल-हेतु प्रभु, भेंट करों तेरी।।
कुंथु सुन अरज दास-केरी, नाथ सुन अरज दास-केरी।
भव-सिन्धु पर्यो हूं नाथ, निकारो बाँह-पकर मेरी।।
ॐ ह्रीं श्रीकुंथुनाथजिनेन्द्राय कामबाण-विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।४।
घेवर बावर मोदन मोदक, मृदु उत्तम पेरी।
ता सों चरन जजों करुनानिधि, हरो छुधा मेरी।।
कुंथु सुन अरज दास-केरी, नाथ सुन अरज दास-केरी।
भव-सिन्धु पर्यो हूं नाथ, निकारो बाँह-पकर मेरी।।
ॐ ह्रीं श्रीकुंथुनाथजिनेन्द्राय क्षुधारोग-विनाशाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।५।
कंचन-दीपमई वर-दीपक, ललित-जोति घेरी।
सो ले चरन-जजों भ्रम-तम रवि, निज-सुबोध देरी।
कुंथु सुन अरज दास-केरी, नाथ सुन अरज दास-केरी।
भव-सिन्धु पर्यो हूं नाथ, निकारो बाँह-पकर मेरी।।
ॐ ह्रीं श्रीकुंथुनाथजिनेन्द्राय मोहांधकार-विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।६।
देवदारु हरि अगर तगर करि चूर अगनि-खेरी।
अष्ट-करम ततकाल जरे ज्यों, धूम धनंजेरी।।
कुंथु सुन अरज दास-केरी, नाथ सुन अरज दास-केरी।
भव-सिन्धु पर्यो हूं नाथ, निकारो बाँह-पकर मेरी।।
ॐ ह्रीं श्रीकुंथुनाथजिनेन्द्राय अष्टकर्म-दहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।७।
लोंग-लायची पिस्ता केला, कमरख शुचि लेरी।
मोक्ष-महाफल चाखन-कारन, जजूं सुकरि ढेरी।
कुंथु सुन अरज दास-केरी, नाथ सुन अरज दास-केरी।
भव-सिन्धु पर्यो हूं नाथ, निकारो बाँह-पकर मेरी।।
ॐ ह्रीं श्रीकुंथुनाथजिनेन्द्राय मोक्षफल-प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।८।
जल चंदन तंदुल प्रसून चरु, दीप धूप लेरी।
फल-जुत जजन करूं मनसुख धरि, हरो जगत्-फेरी।।
कुंथु सुन अरज दास-केरी, नाथ सुन अरज दास-केरी।
भव-सिन्धु पर्यो हूं नाथ, निकारो बाँह-पकर मेरी।।
ॐ ह्रीं श्रीकुंथुनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।९।
पंचकल्याणक-अर्घ्यावली
(छन्द मोतियादाम वर्ण 12)
सु सावन की दशमी-कलि जान, तज्यो सरवारथ-सिद्ध-विमान।
भयो गरभागम-मंगल सार, जजें हम श्रीपद अष्ट-प्रकार।।
ॐ ह्रीं श्रावणकृष्ण-दशम्यां गर्भमंगल-मंडिताय श्रीकुंथुनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।१।
महा बैशाख सु एकम-शुद्ध, भयो तब जनम तिज्ञान-समृद्ध।
कियो हरि मंगल-मंदिर शीस, जजें हम अत्र तुम्हें नुत-शीश।।
ॐ ह्रीं बैशाखशुक्ल-प्रतिपदायां जन्ममंगल-प्राप्ताय श्रीकुंथुनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।२।
तज्यो षट्-खंड-विभौ जिनचंद, विमोहित-चित्त चितार सुछंद।
धरे तप एकम-शुद्ध-विशाख, सुमग्न भये निज-आनंद चाख।।
ॐ ह्रीं बैशाखशुक्ल-प्रतिपदायां तपोमंगल-प्राप्ताय श्रीकुंथुनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।३।
सुदी-तिय-चैत सु चेतन शक्त, चहूँ अरि छय करि ता दिन व्यक्त।
भई समवसृत भाखि सुधर्म, जजूं पद ज्यों पद पाइय-पर्म।।
ॐ ह्रीं चैत्रशुक्ल-तृतीयायां केवलज्ञान-प्राप्ताय श्रीकुंथुनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।४।
सुदी-बैशाख सु एकम नाम, लियो तिहि द्यौस अभय-शिवधाम।
जजे हरि हर्षित मंगल गाय, समर्चत हूं तुहि मन-वच-काय।।
ॐ ह्रीं बैशाखशुक्ल-प्रतिपदायां मोक्षमंगल-प्राप्ताय श्रीकुंथुनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।५।
जयमाला
(अडिल्ल छन्द-मात्रा २१)
षट्-खंडन के शत्रु राज-पद में हने ।
धरि दीक्षा षट्-खंडन पाप तिन्हें दने ।।
त्यागि सुदरशन-चक्र धरम-चक्री भये ।
करम-चक्र-चकचूर सिद्ध दिढ़-गढ़ लये ।१।
ऐसे कुंथु-जिनेश तने पद-पद्म को ।
गुन-अनंत-भंडार महासुख-सद्म को ।।
पूजूं अरघ चढ़ाय पूरणानंद हो ।
चिदानंद अभिनंद इन्द्रगन-वंद हो ।२।
(पद्धरी छन्द-मात्रा १६)
जय जय जय जय श्रीकुंथुदेव, तुम ही ब्रह्मा-हरि-त्रिंबुकेव ।
जय बुद्धि-विदांबर विष्णु ईश, जय रमाकांत शिवलोक शीश ।३।
जय दया-धुरंधर सृष्टिपाल, जय-जय जग-बंधु सुगुन-माल ।
सरवारथ-सिद्ध-विमान छार, उपजे गजपुर में गुन-अपार ।४।
सुर-राज कियो गिर न्हौन जाय, आनंद-सहित जुत-भगति भाय ।
पुनि पिता सौंपिकर मुदित-अंग, हरि तांडव-निरत कियो अभंग ।५।
पुनि स्वर्ग गयो तुम इत दयाल, वय पाय मनोहर प्रजापाल ।
षट्खंड-विभौ भोग्यो समस्त, फिर त्याग जोग धार्यो निरस्त ।६।
तब घाति-घात केवल उपाय, उपदेश दियो सब-हित जिनाय ।
जाके जानत भ्रम-तम विलाय, सम्यग्दर्शन निर्मल लहाय ।७।
तुम धन्य देव किरपा-निधान, अज्ञान-क्षमा-तमहरन भान ।
जय स्वच्छ गुनाकर शुक्त सुक्त, जय स्वच्छ सुखामृत भुक्ति मुक्त ।८।
जय भौ-भय-भंजन कृत्यकृत्य, मैं तुमरो हूं निज भृत्य-भृत्य ।
प्रभु अशरन-शरन अधार धार, मम विघ्न-तूलगिरि जार-जार ।९।
जय कुनय-यामिनी सूर-सूर, जय मनवाँछित-सुख पूर-पूर ।
मम करमबंध दिढ़ चूर-चूर, निज-सम आनंद दे भूर-भूर ।१०।
अथवा जब लों शिव लहूं नाहिं, तब लों ये तो नित ही लहाहिं ।
भव-भव श्रावक-कुल-जनम-सार, भव-भव सतमति संतसंग धार ।११।
भव-भव निज-आतम-तत्त्वज्ञान, भव-भव तप-संयम-शील दान ।
भव-भव अनुभव नित चिदानंद, भव-भव तुम-आगम हे जिनंद ।१२।
भव-भव समाधिजुत-मरन सार, भव-भव व्रत चाहूं अनागार ।
यह मो को हे करुणानिधान, सब जोग मिला आगम-प्रमान ।१३।
जब लों शिव-सम्पति लहूं नाहिं, तब लों मैं इनको नित लहाँहि ।
यह अरज हिये अवधारि नाथ, भव-संकट हरि कीजे सनाथ ।१४।
(छन्द घत्तानन्द-मात्रा ३१)
जय दीनदयाला, वर-गुनमाला, विरद-विशाला सुख-आला ।।
मैं पूजूं ध्याऊं शीश नमाऊं, देहु अचल-पद की चाला ।१५।
ॐ ह्रीं श्रीकुंथुनाथजिनेन्द्राय जयमाला-पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।
(छन्द रोड़क मात्रा-२४)
कुंथु-जिनेसुर पाद-पद्म, जो प्रानी ध्यावें।
अलि-सम-कर अनुराग, सहज सो निज-निधि पावें।।
जो बाँचें-सरधहें, करें अनुमोदन पूजा।
‘वृंदावन’ तिंह पुरुष सदृश, सुखिया नहिं दूजा।।
।। इत्याशीर्वाद: परिपुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् ।।
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