पूजा संग्रह · Mixed · Devanagari

श्री श्रेयांसनाथ-जिन पूजा

(पूजन विधि निर्देश) (छन्द रूपमाला तथा गीता) विमल-नृप विमला सुअन, श्रेयांसनाथ-जिनंद | सिंहपुर जन्मे सकल हरि, पूजि धरि आनंद || भव-बंध ध्वंसनि-हेत लखि, मैं शरन आयो येव | थापूं चरन-जुग उर-कमल में, जजन-कारन देव |१| ॐ ह्रीं श्...

(पूजन विधि निर्देश)
(छन्द रूपमाला तथा गीता)
विमल-नृप विमला सुअन, श्रेयांसनाथ-जिनंद |
सिंहपुर जन्मे सकल हरि, पूजि धरि आनंद ||
भव-बंध ध्वंसनि-हेत लखि, मैं शरन आयो येव |
थापूं चरन-जुग उर-कमल में, जजन-कारन देव |१|
ॐ ह्रीं श्री श्रेयांसनाथजिनेन्द्र! अत्र अवतरत अवतरत संवौषट्! (आह्वाननम्)
ॐ ह्रीं श्री श्रेयांसनाथजिनेन्द्र! अत्र तिष्ठत तिष्ठत ठ: ठ:! (स्थापनम्)
ॐ ह्रीं श्री श्रेयांसनाथजिनेन्द्र! अत्र मम सन्निहितो भवत भवत वषट्! सन्निधिकरणम्)
(छन्द गीता तथा हरिगीता-मात्रा २८)
कलधौत-वरन उतंग हिमगिरि पदम-द्रह तें आवर्इ |
सुर-सरित प्रासुक-उदक सों भरि-भृंग धार चढ़ावर्इ ||
श्रेयांसनाथ-जिनंद त्रिभुवन-वंद्य आनंद-कंद हैं |
दु:ख-दंद-फंद निकंद पूरनचंद जोति-अमंद हैं ||
ॐ ह्रीं श्री श्रेयांसनाथजिनेन्द्राय जन्म-जरा-मृत्यु-विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।१।
गोशीर वर करपूर कुंकुम नीर-संग घसूं सही |
भवताप भंजन हेत भवदधि सेत चरन जजूँ सही ||
श्रेयांसनाथ-जिनंद त्रिभुवन-वंद्य आनंद-कंद हैं |
दु:ख-दंद-फंद निकंद पूरनचंद जोति-अमंद हैं ||
ॐ ह्रीं श्री श्रेयांसनाथजिनेन्द्राय संसारताप-विनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।२।
सित शालि शशि-दुति शुक्ति-सुन्दर-मुक्त की उनहार हैं|
भरि थार पुंज धरंत पदतर अखयपद करतार हैं ||
श्रेयांसनाथ-जिनंद त्रिभुवन-वंद्य आनंद-कंद हैं |
दु:ख-दंद-फंद निकंद पूरनचंद जोति-अमंद हैं ||
ॐ ह्रीं श्री श्रेयांसनाथजिनेन्द्राय अक्षयपद-प्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा ।३।
सद सुमन सुमन-समान पावन, मलय तें मधु झंकरें |
पद-कमलतर धर तें तुरित सो मदन को मद खंकरें ||
श्रेयांसनाथ-जिनंद त्रिभुवन-वंद्य आनंद-कंद हैं |
दु:ख-दंद-फंद निकंद पूरनचंद जोति-अमंद हैं ||
ॐ ह्रीं श्री श्रेयांसनाथजिनेन्द्राय कामबाण- विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।४।
यह परम मोदक आदि सरस सँवारि सुन्दर चरु लियो |
तुव वेदनी मदहरन लखि, चरचूं चरन शुचि कर हियो ||
श्रेयांसनाथ-जिनंद त्रिभुवन-वंद्य आनंद-कंद हैं |
दु:ख-दंद-फंद निकंद पूरनचंद जोति-अमंद हैं ||
ॐ ह्रीं श्री श्रेयांसनाथजिनेन्द्राय क्षुधारोग-विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।५।
संशय-विमोह-विभरम तम-भंजन दिनंद-समान हो |
ता तें चरन-ढिंग दीप जोऊँ देहु अविचल-ज्ञान हो ||
श्रेयांसनाथ-जिनंद त्रिभुवन-वंद्य आनंद-कंद हैं |
दु:ख-दंद-फंद निकंद पूरनचंद जोति-अमंद हैं ||
ॐ ह्रीं श्री श्रेयांसनाथजिनेन्द्राय मोहांधकार-विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।६।
वर अगर तगर कपूर चूर सुगन्ध-भूर बनाइया |
दहि अमर-जिहवाविषै चरन-ढिंग करम-भरम जराइया ||
श्रेयांसनाथ-जिनंद त्रिभुवन-वंद्य आनंद-कंद हैं |
दु:ख-दंद-फंद निकंद पूरनचंद जोति-अमंद हैं ||
ॐ ह्रीं श्री श्रेयांसनाथजिनेन्द्राय अष्टकर्म-दहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।७।
सुरलोक अरु नरलोक के फल पक्व-मधुर सुहावने |
ले भगति-सहित जजूं चरन शिव परम-पावन पावने ||
श्रेयांसनाथ-जिनंद त्रिभुवन-वंद्य आनंद-कंद हैं |
दु:ख-दंद-फंद निकंद पूरनचंद जोति-अमंद हैं ||
ॐ ह्रीं श्री श्रेयांसनाथजिनेन्द्राय मोक्षफल-प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।८।
जल-मलय तंदुल सुमन-चरु अरु दीप धूप फलावली |
करि अरघ चरचूं चरन-जुग प्रभु मोहि तार उतावली ||
श्रेयांसनाथ-जिनंद त्रिभुवन-वंद्य आनंद-कंद हैं |
दु:ख-दंद-फंद निकंद पूरनचंद जोति-अमंद हैं ||
ॐ ह्रीं श्री श्रेयांसनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।९।
पंचकल्याणक-अर्घ्यावली (छन्द आर्या)
पुष्पोत्तर तजि आये, विमला-उर जेठ-कृष्ण-छट्टम को |
सुर-नर मंगल गाये, पूजूं मैं नासि कर्म-काठन को ||
ॐ ह्रीं ज्येष्ठकृष्ण-षष्ठ्यां गर्भमंगल-मंडिताय श्री श्रेयांसनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।१।
जनमे फागुन-कारी-एकादशि तीन-ग्यान-दृगधारी |
इक्ष्वाकु-वंशतारी, मैं पूजूं घोर-विघ्न-दु:ख टारी ||
ॐ ह्रीं फाल्गुनकृष्णैकादश्यां जन्ममंगल-मंडिताय श्री श्रेयांसनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।२।
भव-तन-भोग असारा, लख त्याग्यो धीर शुद्ध तप धारा ||
फागुन-वदि-इग्यारा, मैं पूजूं पाद अष्ट-परकारा ||
ॐ ह्रीं फाल्गुनकृष्णैकादश्यां दीक्षामंगल-मंडिताय श्री श्रेयांसनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।३।
केवलज्ञान सु जानन, माघ-वदी-पूर्णतित्थ को देवा |
चतुरानन भव-भानन, वंदूं ध्याऊँ करूं सु पद-सेवा ||
ॐ ह्रीं माघकृष्णामावस्यायां केवलज्ञान-मंडिताय श्री श्रेयांसनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।४।
गिरि-समेद तें पायो, शिव-थल तिथि-पूर्णमासि-सावन को |
कुलिशायुध गुन-गायो, मैं पूजूं आप-निकट आवन को ||
ॐ ह्रीं श्रावणशुक्ल-पूर्णिमायां मोक्षमंगल-मंडिताय श्री श्रेयांसनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।५।
जयमाला
(छन्द लोलतरंग-वर्ण ११)
शोभित तुंग शरीर सु जानो, चाप असी शुभ-लक्षन मानो |
कंचनवर्ण अनूपम सोहे, देखत रूप सुरासुर मोहे |१|
(छन्द पद्धड़ी-मात्रा १५)
जय-जय श्रेयांस जिन गुणगरिष्ठ, तुम पद-जुग दायक इष्ट-मिष्ट |
जय शिष्ट-शिरोमणि जगत्पाल, जय भवि-सरोजगन प्रात:काल |२|
जय पंचमहाव्रत-गजसवार, ले त्यागभाव दल-बल सु लार |
जय धीरज को दलपति बनाय, सत्ता-छितिमहँ रन को मचाय |३|
धरि रतन-तीन तिहुँ-शक्ति हाथ, दश-धरम कवच तप-टोप माथ |
जय शुकलध्यान कर खड्ग धार, ललकारे आठों अरि प्रचार |४|
ता में सबको पति मोह-चंड, ता को तत-छिन करि सहस-खंड |
फिर ज्ञान-दरस प्रत्यूह हान, निजगुन-गढ़ लीनो अचल-थान |५|
शुचि ज्ञान दरस सुख वीर्य सार, हुर्इ समवसरण रचना अपार |
तित भाषे तत्त्व अनेक धार, जा को सुनि भव्य हिये विचार |६|
निजरूप लह्यो आनंदकार, भ्रम दूर करन को अति-उदार |
पुनि नय-प्रमान-निच्छेप सार, दरसायो करि संशय-प्रहार |७|
ता में प्रमान जुग-भेद एव, परतच्छ-परोछ रजे स्वमेव |
ता में प्रतच्छ के भेद दोय, पहिलो है संविवहार सोय |८|
ता के जुग-भेद विराजमान, मति-श्रुति सोहें सुन्दर महान |
है परमारथ दुतियो प्रतच्छ, हैं भेद-जुगम ता माँहिं दच्छ |९|
इक एकदेश इक सर्वदेश, इकदेश उभै-विधि-सहित वेश |
वर अवधि सु मनपरजय विचार, है सकलदेश केवल अपार |१०|
चर-अचर लखत जुगपत-प्रतच्छ, निरद्वंद रहित-परपंच पच्छ |
पुनि है परोच्छ-महँ पंच-भेद, समिरति अरु प्रतिभिज्ञान वेद |११|
पुनि तरक और अनुमान मान, आगम-जुत पन अब नय बखान |
नैगम संग्रह व्यौहार गूढ़, ऋजुसूत्र शब्द अरु समभिरूढ़ |१२|
पुनि एवंभूत सु सप्त एम, नय कहे जिनेसुर गुन जु तेम |
पुनि दरब क्षेत्र अर काल भाव, निच्छेप चार-विधि इमि जनाव |१३|
इनको समस्त भाष्यो विशेष, जा समुझत भ्रम नहिं रहत लेश |
निज-ज्ञानहेत ये मूलमंत्र, तुम भाषे श्री जिनवर सु तंत्र |१४|
इत्यादि तत्त्व-उपदेश देय, हनि शेष-करम निरवान लेय |
गिरवान जजत वसु-दरब र्इस, ‘वृन्दावन’ नित-प्रति नमत शीश |१५|
(घत्ता छन्द)
श्रेयांस महेशा, सुगुन जिनेशा, वज्रधरेशा ध्यावतु हैं |
हम निश-दिन वंदें, पाप-निकंदें, ज्यों सहजानंद पावतु हैं ||
ॐ ह्रीं श्रीश्रेयांसनाथजिनेन्द्राय जयमाला-पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
(सोरठा छन्द)
जो पूजें मनलाय श्रेयनाथ पद-पद्म को |
पावें इष्ट अघाय, अनुक्रम-सों शिवतिय वरें ||
।। इत्याशीर्वाद: पुष्पांजलिं क्षिपेत् ।।
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