पूजा संग्रह · Mixed · Devanagari

श्री सुपार्श्वनाथ-जिन पूजा

(पूजन विधि निर्देश) (छन्द हरिगीता तथा गीता) जय-जय जिनिंद गनिंद इन्द, नरिंद गुन-चिंतन करें | तन हरी-हर मन-सम हरत मन,लखत उर-आनंद भरें | नृप-सुपरतिष्ठ वरिष्ठ इष्ट, महिष्ठ शिष्ट पृथी-प्रिया | तिन नंद के पद-वंद वृंद, अमंद थाप...

(पूजन विधि निर्देश)
(छन्द हरिगीता तथा गीता)
जय-जय जिनिंद गनिंद इन्द, नरिंद गुन-चिंतन करें |
तन हरी-हर मन-सम हरत मन,लखत उर-आनंद भरें |
नृप-सुपरतिष्ठ वरिष्ठ इष्ट, महिष्ठ शिष्ट पृथी-प्रिया |
तिन नंद के पद-वंद वृंद, अमंद थापत जुत-क्रिया ||
ॐ ह्रीं श्रीसुपार्श्वनाथजिनेन्द्र ! अत्र अवतरत अवतरत संवौषट्! (आह्वाननम्)
ॐ ह्रीं श्रीसुपार्श्वनाथजिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठत तिष्ठत ठ: ठ:! (स्थापनम्)
ॐ ह्रीं श्रीसुपार्श्वनाथजिनेन्द्र ! अत्र मम सन्निहितो भवत भवत वषट्! (सन्निधिकरणम्)
(चाल द्यानतराय जी कृत सोलहकारण भाषाष्टक की)
उज्ज्वल-जल शुचि-गंध मिलाय, कंचनझारी भरकर लाय।
दयानिधि हो, जय जगबंधु दयानिधि हो।।
तुम पद पूजूं मन-वच-काय, देव सुपारस शिवपुर-राय।
दयानिधि हो, जय जगबंधु दयानिधि हो।।
ॐ ह्रीं श्रीसुपार्श्वनाथजिनेन्द्राय जन्म-जरा-मृत्यु-विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।१।
मलयागिर-चंदन घसि सार, लीनो भव-तप-भंजनहार |
दयानिधि हो, जय जगबंधु दयानिधि हो ||
तुम पद पूजूं मन-वच-काय, देव सुपारस शिवपुर-राय |
दयानिधि हो, जय जगबंधु दयानिधि हो ||
ॐ ह्रीं श्रीसुपार्श्वनाथजिनेन्द्राय संसारताप-विनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।२।
देवजीर सुखदास अखंड, उज्ज्वल जल-छालित सित मंड |
दयानिधि हो, जय जगबंधु दयानिधि हो ||
तुम पद पूजूं मन-वच-काय, देव सुपारस शिवपुर-राय |
दयानिधि हो, जय जगबंधु दयानिधि हो ||
ॐ ह्रीं श्रीसुपार्श्वनाथजिनेन्द्राय अक्षयपद-प्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा ।३।
प्रासुक सुमन सुगंधित सार, गुंजत अलि मकरध्ववजहार |
दयानिधि हो, जय जगबंधु दयानिधि हो ||
तुम पद पूजूं मन-वच-काय, देव सुपारस शिवपुर-राय |
दयानिधि हो, जय जगबंधु दयानिधि हो ||
ॐ ह्रीं श्रीसुपार्श्वनाथजिनेन्द्राय कामबाण- विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।४।
छुधाहरण नेवज वर लाय, हरूं वेदनी तुम्हें चढ़ाय |
दयानिधि हो, जय जगबंधु दयानिधि हो ||
तुम पद पूजूं मन-वच-काय, देव सुपारस शिवपुर-राय |
दयानिधि हो, जय जगबंधु दयानिधि हो ||
ॐ ह्रीं श्रीसुपार्श्वनाथजिनेन्द्राय क्षुधारोग-विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।५।
ज्वलित-दीप भरकरि नवनीत, तुम-ढिंग धारत हूं जगमीत |
दयानिधि हो, जय जगबंधु दयानिधि हो |
ॐ ह्रीं श्रीसुपार्श्वनाथजिनेन्द्राय मोहांधकार-विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।६।
दशविधि-गन्ध हुताशन-माँहिं, खेवत क्रूर-करम जरि जाहिं |
दयानिधि हो, जय जगबंधु दयानिधि हो ||
तुम पद पूजूं मन-वच-काय, देव सुपारस शिवपुर-राय |
दयानिधि हो, जय जगबंधु दयानिधि हो ||
ॐ ह्रीं श्रीसुपार्श्वनाथजिनेन्द्राय अष्टकर्म-दहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।७।
श्रीफल केला आदि अनूप, ले तुम अग्र धरूं शिवभूप |
दयानिधि हो, जय जगबंधु दयानिधि हो ||
तुम पद पूजूं मन-वच-काय, देव सुपारस शिवपुर-राय |
दयानिधि हो, जय जगबंधु दयानिधि हो ||
ॐ ह्रीं श्रीसुपार्श्वनाथजिनेन्द्राय मोक्षफल-प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।८।
आठों दरब साजि गुनगाय, नाचत राचत भगति बढ़ाय |
दयानिधि हो, जय जगबंधु दयानिधि हो ||
तुम पद पूजूं मन-वच-काय, देव सुपारस शिवपुर-राय |
दयानिधि हो, जय जगबंधु दयानिधि हो ||
ॐ ह्रीं श्रीसुपार्श्वनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।९।
पंचकल्याणक-अर्घ्यावली
(छन्द द्रुतविलम्बित तथा सुन्दरी, वर्ण १२)
सुकल-भादव-छट्ठ सुजानिये, गरभमंगल ता दिन मानिये |
करत सेव शची रचि मात की, अरघ लेय जजूं वसु-भाँत की ||
ॐ ह्रीं भाद्रपदशुक्ल-षष्ठिदिने गर्भमंगल-प्राप्ताय श्रीसुपार्श्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।१।
सुकल-जेठ-दुवादशि जन्मये, सकल-जीव सु आनंद तन्मये |
त्रिदश-राज जजें गिरिराज जी, हम जजें पद मंगल साज जी ||
ॐ ह्रीं ज्येष्ठशुक्ल-द्वादश्यां जन्ममंगल-प्राप्ताय श्रीसुपार्श्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।२।
जनम के तिथि श्रीधर ने धरी, तप समस्त प्रमादन को हरी |
नृप महेन्द्र दियो पय भाव सों, हम जजें इत श्रीपद चाव सों ||
ॐ ह्रींज्येष्ठशुक्ल-द्वादश्यां तपोमंगल-प्राप्ताय श्रीसुपार्श्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।३।
भ्रमर-फागुन-छट्ठ सुहावनो, परम-केवलज्ञान लहावनो |
समवसर्न-विषै वृष भाखियो, हम जजें पद आनंद चाखियो ||
ॐ ह्रींफाल्गुनकृष्ण-षष्ठिदिने केवलज्ञान-प्राप्ताय श्रीसुपार्श्वनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।४।
असित-फागुन-सातम पावनो, सकल-कर्म कियो छय भावनो |
गिरिसमेद-थकी शिव जातु हैं, जजत ही सब विघ्न विलातु हैं ||
ॐ ह्रींफाल्गुनकृष्ण-सप्तमीदिने मोक्षमंगल-प्राप्ताय श्रीसुपार्श्वनाथजिनेन्द्राय अर्ध्यं निर्व.स्वाहा ।५।
जयमाला
(दोहा)
तुंग अंग धनु दोय-सौ, शोभा सागरचंद |
मिथ्या-तपहर सुगुन-कर, जय सुपास सुख-कंद |1|
(छन्द कामिनीमोहन १० मात्रा)
जयति जिनराज शिवराज हित-हेत हो |
परम-वैराग आनंद भरि देत हो ||
गर्भ के पूर्व षट्मास धनदेव ने |
नगर निरमापि वाराणसी सेवने |२|
गगन सों रतन की धार बहु वरषहीं |
कोड़ि त्रै-अर्द्ध त्रैवार सब हरषहीं ||
तात के सदन गुन-वदन रचना रची |
मातु की सर्वविधी करत सेवा शची |३|
भयो जब जनम तब इन्द्र-आसन चल्यो |
होय चकित तुरित अवधि तें लखि भल्यो ||
सप्त-पग जाय सिर-नाय वंदन करी |
चलन उमग्यो तबै मानि धनि धनि घरी |४|
सात-विधि सैन गज वृषभ रथ बाज ले |
गन्धरव नृत्यकारी सबै साज ले ||
गलित-मद-गंड ऐरावतो साजियो |
लच्छ-जोजन सुतन वदन सत राजियो |५|
वदन वसु-दंत प्रति-दंत सरवर भरे |
तासु-मधि शतक पनबीस कमलिनि खरे ||
कमलिनी मध्य पनवीस फूले कमल |
कमल प्रतिकमल-मँह एक-सौ-आठ दल |६|
सर्वदल कोड़-शत-वीस परमान जू |
तासु-पर अपछरा नचहिं जुत-मान जू ||
तततता तततता विततता ता थर्इ |
धृगतता धृगतता धृगतता मय लर्इ |७|
धरत पग सनन नन सनन नन गगन में |
नूपुरें झनन नन झनन नन पगन में ||
नचन इत्यादि कर्इ भाँति सों मगन में |
केर्इ तित बजत बाजे मधुर पगन में |८|
केर्इ दृम दृम सुदृम दृम मृदंगनि धुनें |
केर्इ झल्लरि झनन झंझनन झंझनें ||
केर्इ संसाग्रते सारंगि संसाग्र सुर |
केर्इ बीना पटह बंसि बाजें मधुर |९|
केर्इ तनननन तनननन तानें पुरें |
शुद्ध-उच्चारि सुर केर्इ पाठे फुरें ||
केइ झुकि-झुकि फिरे चक्र-सी भामनी |
धृगगतां धृगगतां पर्म-शोभा बनी |१०|
केर्इ छिन-निकट छिन-दूर छिन-थूल लघु |
धरत वैक्रियक-परभाव सों तन-सुभगु ||
केर्इ करताल-करताल तल में धुनें |
तत-वितत-घन-सुषिरि जात बाजें मुनै |११|
इन्द्र आदिक सकल-साज संग धारि के |
आय पुर तीन-फेरी करी प्यार तें ||
सचिय तब जाय परसूत-थल मोद में |
मातु करि नींद लीनों तुम्हें गोद में |१२|
आन गिरवान नाथहिं दियो हाथ में |
छत्र अर चमर वर हरि करत माथ में ||
चढ़े गजराज जिनराज-गुन जापियो |
जाय गिरिराज पांडुकशिला थापियो |१३|
लेय पंचम-उदधि-उदक कर-कर सुरनि |
सुरन कलशनि भरे सहित चर्चित पुरनि ||
सहस अरु आठ सिर कलश ढारे जबै |
अघघ घघ घघघ घघ भभभ भभ भौ तबै |१४|
धधध धध धधध धध धुनि मधुर होत है |
भव्यजन-हंस के हरस उद्योत है ||
भयो इमि न्हौन तब सकल गुन रंग में |
पोंछि श्रृंगार कीनो शची अंग में |१५|
आनि पितु-सदन शिशु सौंपि हरि-थल गयो |
बाल वय-तरुन लहि राजसुख भोगियो ||
भोग तज जोग गहि, चार-अरि को हने |
धारि केवल-परम धरम दुइ-विधि भने |१६|
नाशि अरि शेष शिवथान-वासी भये |
ज्ञान-दृग-शर्म-वीरज अनंते लये ||
दीन-जन की करुण-वानि सुन लीजिये |
धरम के नंद को पार अब कीजिये |१७|
(घत्ता)
जय करुनाधारी, शिवहितकारी, तारनतरन जिहाजा हो |
सेवक नित वंदे, मन-आंनदे, भव-भय-मेटनकाजा हो |१८|
ॐ ह्रीं श्रीसुपार्श्वनाथजिनेन्द्राय जयमाला-पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।
(दोहा)
श्रीपार्श्व पद-जुगल जो, जजे पढ़े यह पाठ |
अनुमोदे सो चतुर नर, पावें आनंद ठाठ ||
।। इत्याशीर्वाद: पुष्पांजलिं क्षिपेत् ।।
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