सिद्धक्षेत्रों की अर्घ्यावली
कविश्री द्यानतराय (१) श्री अष्टापद सिद्धक्षेत्र (हिमालय पर्वत, कैलास) जलादिक आठों द्रव्य लेय, भरि स्वर्णथार अर्घहि करेय | जिन आदि मोक्ष कैलाश-थान, मुन्यादि-पाद जजुँ जोरि पान || ॐ ह्रीं श्री कैलाशपर्वत-सिद्धक्षेत्राय अनर्...
(१) श्री अष्टापद सिद्धक्षेत्र (हिमालय पर्वत, कैलास)
जलादिक आठों द्रव्य लेय, भरि स्वर्णथार अर्घहि करेय |
जिन आदि मोक्ष कैलाश-थान, मुन्यादि-पाद जजुँ जोरि पान ||
ॐ ह्रीं श्री कैलाशपर्वत-सिद्धक्षेत्राय अनर्य् पद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
(२) सम्मेद-शिखर सिद्धक्षेत्र (झारखंड)
जल गंधाक्षत पुष्प सु नेवज लीजिये |
दीप धूप फल लेकर अर्घ सु दीजिये ||
पूजूं शिखर-सम्मेद सु-मन-वच-काय जी |
नरकादिक-दु:ख टरें अचल-पद पाय जी ||
ॐ ह्रीं श्री सम्मेदशिखर सिद्धक्षेत्राय अनर्य् पद -प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
(३) गिरनार सिद्धक्षेत्र (गुजरात)
अष्ट-द्रव्य को अर्य् संजोयो, घंटा-नाद बजार्इ |
गीत-नृत्य कर जजूं ‘जवाहर’ आनंद-हर्ष बधार्इ ||
जम्बूद्वीप भरत-आरज में, सोरठ-देश सुहार्इ |
शेषावन के निकट अचल तहँ, नेमिनाथ शिव पार्इ ||
ॐ ह्रीं श्री गिरनार- सिद्धक्षेत्राय अनर्य्रपद -प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
(४) श्री शत्रुंजय-सिद्धक्षेत्र (गुजरात)
वसु-द्रव्य मिलार्इ, थार भरार्इ, सन्मुख आर्इ नजर करूं |
तुम शिव सुखदार्इ, धर्म बढ़ार्इ, हर दु:खादिक अर्घ करूं ||
पांडव शुभ तीनं, सिद्धि लहीनं, आठ कोड़ि मुनि मुक्ति गये |
श्री शत्रुंजय पूजूं, सन्मुख हूजो, शांतिनाथ शुभ मूल नये ||
ॐ ह्रीं श्री शत्रुंजय-सिद्धक्षेत्राय अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
(५) पावागढ़-सिद्धक्षेत्र (गुजरात)
वसु-द्रव्य मिलार्इ भविजन भार्इ, धर्म सुहार्इ अर्घ करूँ |
पूजा को गाऊँ हर्ष बढ़ाऊँ, खूब नचाऊँ प्रेम भरूँ ||
पावागिरि-वंदूँ मन-आनंदूं, भवदु:ख खंदूं चितधारी |
मुनि पाँच जु कोड़ं भवदु:ख छोड़ं, शिवमग जोड़ं सुख भारी ||
ॐ ह्रीं श्री पावागढ़-सिद्धक्षेत्राय अनर्घ्यपद -प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
(६) तारंगागिरि-सिद्धक्षेत्र (गुजरात)
शुचि आठों द्रव्य मिलाय तिनको अर्घ करूं |
मन-वच-तन देहु चढ़ाय भव तर मोक्ष वरूं ||
श्री तारंगागिरि से जान, वरदत्तादि मुनी |
त्रय-अर्ध-कोटि परमान ध्याऊँ मोक्ष-धनी ||
ॐ ह्रीं श्री तारंगागिरि-सिद्धक्षेत्राय अनर्घ्यपद -प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
(७) श्री चम्पापुर सिद्धक्षेत्र (बिहार)
जल-फल वसु-द्रव्य मिलाय, ले भर हिम-थारी |
वसु-अंग धरा पर ल्याय, प्रमुदित चितधारी ||
श्री वासुपूज्य जिनराय, निर्वृति-थान प्रिया |
चंपापुर-थल सुखदाय, पूजूं हर्ष हिया ||
ॐ ह्रीं श्री चम्पापुर- सिद्धक्षेत्राय अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा |
(८) श्री पावापुरी सिद्धक्षेत्र (बिहार)
जल गंध आदि मिलाय वसुविध थार-स्वर्ण भराय के |
मन प्रमुद-भाव उपाय कर ले आय अर्घ्य बनाय के ||
वर पद्मवन भर पद्म-सरवर बहिर पावाग्राम ही |
शिवधाम सन्मति-स्वामी पायो, जजूं सो सुखदा मही ।।
ॐ ह्रीं श्री पावापुरी- सिद्धक्षेत्राय अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
(९) श्री गौतम-गणधर निर्वाण-स्थली (गुणावा-बिहार)
जल-फल आदिक द्रव्य इकट्ठे लीजिये |
कंचन-थारी माँहि अरघ शुभ कीजिये ||
ग्राम-गुणावा जाय सु मन हर्षाय के |
गौतम-स्वामी-चरण जजो मन-लायके ||
ॐ ह्रीं श्री गौतम-गणधर निर्वाण-स्थली गुणावा-सिद्धक्षेत्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
(१०) श्री सोनागिरि सिद्धक्षेत्र (मध्य प्रदेश)
वसु-द्रव्य ले भर थाल-कंचन अर्घ दे सब अरि हनूँ |
‘छोटे’ चरण जिनराज लय हो शुद्ध निज-आत्म बनूँ ||
नंगाऽनंगादि-मुनीन्द्र जहँ तें मुक्ति-लक्ष्मीपति भये |
सो परम-गिरवर जजूँ वसु-विधि होत मंगल नित नये ||
ॐ ह्रीं श्री सोनागिरि-सिद्धक्षेत्राय अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
(११) श्री नयनागिरि (रेशंदीगिरि) सिद्धक्षेत्र (मध्य प्रदेश)
शुचि अमृत-आदि समग्र, सजि वसु-द्रव्य प्रिया |
धारूं त्रिजगत-पति-अग्र, धर वर-भक्त हिया ||
ॐ ह्रीं श्री नयनागिरि-सिद्धक्षेत्राय अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
(१२) श्री द्रोणगिरि सिद्धक्षेत्र (मध्य प्रदेश)
जल सु चंदन अक्षत लीजिये, पुष्प धर नैवेद्य गनीजिये |
दीप धूप सुफल बहु साजहीं, जिन चढ़ाय सुपातक भाजहीं ||
ॐ ह्रीं श्री द्रोणगिरि- सिद्धक्षेत्राय अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा |
(१३) सिद्धवरकूट सिद्धक्षेत्र (मध्य प्रदेश)
जल चंदन अक्षत लेय, सुमन महा प्यारी |
चरु दीप धूप फल सोय, अरघ करूं भारी ||
द्वय चक्री दस काम कुमार, भव तर मोक्ष गये |
ता तें पूजूं पद-सार, मन में हरष ठये ||
ॐ ह्रीं श्री सिद्धवरकूट-सिद्धक्षेत्राय अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
(१४) चूलगिरि (बावनगजा) सिद्धक्षेत्र (मध्य प्रदेश)
सजि सौंज आठों होय ठाड़ा, हरष बाढ़ा कथन-बिन |
हे नाथ! भक्तिवश मिले जो, पुर न छूटे एक दिन ||
दशग्रीव-अंगज अनुज आदि, ऋषीश जहँ तें शिव लह्यो |
सो शैल बड़वानी-निकट, गिरि-चूल की पूजा ठहो ||
ॐ ह्रीं श्री चूलगिरि-सिद्धक्षेत्राय अनर्घ्यपद -प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
(१५) श्री मुक्तागिरि सिद्धक्षेत्र (मध्य प्रदेश)
जल-गंध आदिक द्रव्य लेके, अर्घ कर ले आवने |
लाय चरन चढ़ाओ भविजन, मोक्षफल को पावने ||
तीर्थ-मुक्तागिरि मनोहर, परम-पावन शुभ कह्यो |
कोटि साढ़े-तीन मुनिवर, जहाँ तें शिवपुर लह्यो ||
ॐ ह्रीं श्री मुक्तागिरि-सिद्धक्षेत्राय अनर्घ्यपद -प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा |
(१६) रेवातट स्थित सिद्धोदय-सिद्धक्षेत्र (नेमावर-म.प्र.)
रेवानदी के तीर पर सिद्धोदय है क्षेत्र |
इसके दर्शन-मात्र से है खुलता सम्यक् नेत्र ||
रावण-सुत अरु सिद्ध मुनि साढ़े पाँच करोड़ |
ऐसे अनुपम-क्षेत्र को पूजूँ सदा कर जोड़ ||
ॐ ह्रीं श्री रेवातट-स्थित सिद्धोदय-सिद्धक्षेत्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा |
(१७) (ऊन) पावागिरि-सिद्धक्षेत्र म.प्र.
जल-फल वसु-द्रव्य पुनीत, लेकर अर्घ करूँ |
नाचूँ गाऊँ इह भाँति, भव तर मोक्ष वरूँ ||
श्री पावागिरि से मुक्ति, मुनिवर चारि लही |
तिन इक क्रम से गिन, चैत्य पूजत सौख्य लही ||
ॐ ह्रीं श्री पावागिरि-सिद्धक्षेत्राय अनर्घ्यपद -प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा |
(१८) श्री तुंगीगिरि सिद्धक्षेत्र (महाराष्ट्र)
जल-फलादि वसु दरव सजा के, हेम-पात्र भर लाऊँ |
मन-वच-काय नमूँ तुम चरना, बार-बार सिर नाऊँ ||
राम हनू सुग्रीव आदि जे, तुंगीगिर थिर-थार्इ |
कोड़ी निन्यानवे मुक्ति गये मुनि, पूजूँ मन-वच-कार्इ ||
ॐ ह्रीं श्री तुंगीगिरि-सिद्धक्षेत्राय अनर्घ्यपद -प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
(१९) श्री कुंथलगिरि सिद्धक्षेत्र (महाराष्ट्र)
जल-फलादि वसु-दरव लेय थुति ठान के |
अर्घ धरूँ तुम पाप हरो हिय आन के |
पूजूं सिद्ध सु क्षेत्र, हिये हरषाय के |
कर मन-वच-तन शुद्ध, करम-वसु टार के ||
ॐ ह्रीं श्री कुंथलगिरि-सिद्धक्षेत्राय अनर्घ्यपद -प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
(२०) श्री गजपंथ-सिद्धक्षेत्र (महाराष्ट्र)
जल-फल आदि वसु-दरव अति-उत्तम, मणिमय-थाल भरार्इ |
नाच-नाच गुण गाय-गायके, श्री जिन-चरण चढ़ार्इ ||
बलभद्र सात वसु-कोडि मुनीश्वर, यहाँ पर करम खिपार्इ |
केवल-लहि शिवधाम पधारे, जजूँ तिन्हें सिर-नार्इ ||
ॐ ह्रीं श्री गजपंथ-सिद्धक्षेत्राय अनर्घ्यपद -प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
(२१) कोटिशिला-सिद्धक्षेत्र (उड़ीसा)
जल-फल वसु-दरव पुनीत, लेकर अर्घ करूँ |
नाचूँ गाऊँ इह भाँति, भवतर मोक्ष वरूँ ||
श्री कोटिशिला के माँहि, जशरथ-तनय कहे |
मुनि पंच-शतक शिवलीन, देश-कलिंग दहे ||
ॐ ह्रीं श्री कोटिशिला-सिद्धक्षेत्राय अनर्घ्यपद -प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा |
(२२) जम्बू-स्वामी निर्वाण-स्थली चौरासी-मथुरा सिद्धक्षेत्र (उत्तर प्रदेश)
जल-फल आदिक द्रव्य आठ हू लीजिये,
कर इकट्ठी भरि थाल अर्घ शुभ कीजिये |
मथुरा जम्बू-स्वामि मुक्ति-थल जाय के,
पूजो भवि धरि ध्यान सुयोग लगाय के ||
ॐ ह्रीं श्री जम्बूस्वामी-निर्वाण-स्थली चौरासी-मथुरा सिद्धक्षेत्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।