अंतराय-नाशार्थ अर्घ्य
लाभ में अंतराय के वश जीव सुख ना लहे | जो करे कष्ट-उत्पात सगरे कर्मवश विरथा रहे || नहिं जोर वा को चले इक-छिन दीन सो जग में फिरे | अरिहंत-सिद्ध सु अधर-धरिके लाभ यों कर्म को हरे || ॐ ह्रीं श्री लाभांतरायकर्मरहिताभ्यां अरिहं...
जो करे कष्ट-उत्पात सगरे कर्मवश विरथा रहे ||
नहिं जोर वा को चले इक-छिन दीन सो जग में फिरे |
अरिहंत-सिद्ध सु अधर-धरिके लाभ यों कर्म को हरे ||
ॐ ह्रीं श्री लाभांतरायकर्मरहिताभ्यां अरिहंत-सिद्धपरमेष्ठिभ्यां अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
अंतराय है कर्म प्रबल जो दान-लाभ का घातक है |
वीर्य-भोग-उपभोग सभी में, विघ्न-अनेक प्रदायक है ||
इसी कर्म के नाश-हेतु श्री, वीर-जिनेन्द्र और गणनाथ |
सदा सहायक हों हम सबके, विनती करें जोड़कर हाथ ||
(यहाँ पर पुष्प-क्षेपण कर हाथ जोडे़ं।)
(इसके बाद हर एक बही में केशर से साथिया माँडकर एक-एक कोरा पान रखें और लिखें :-