स्तोत्र संग्रह · Mixed · Devanagari

पंचकल्याणक-मंगलपाठ

कविश्री रूपचंद (प्रतिदिन अवकाश न हो तो जिस कल्याणक का दिवस हो, उसका पाठ करें।) पणविवि पंच परमगुरु गुरु जिनशासनो | सकल सिद्धिदातार सुविघन विनाशनो || शारद अरु गुरु गौतम सुमति-प्रकाशनो | मंगल कर चउ संघहि पाप-पणासनो || पापहि...

कविश्री रूपचंद
(प्रतिदिन अवकाश न हो तो जिस कल्याणक का दिवस हो, उसका पाठ करें।)
पणविवि पंच परमगुरु गुरु जिनशासनो |
सकल सिद्धिदातार सुविघन विनाशनो ||
शारद अरु गुरु गौतम सुमति-प्रकाशनो |
मंगल कर चउ संघहि पाप-पणासनो ||
पापहिं पणासन गुणहिं गरुआ दोष अष्टादश रहिउ |
धरि ध्यान करम विनासि केवलज्ञान अविचल जिन लहिउ ||
प्रभु पंचकल्याणक विराजित सकल सुर नर ध्यावहीं |
त्रैलोक्यनाथ सुदेव जिनवर जगत मंगल गावहीं ||१||
(गर्भ कल्याणक)
जाके गरभ-कल्याणक धनपति आइयो |
अवधिज्ञान परवान सु इंद्र पठाइयो ||
रचि नव बारह जोजन नयरि सुहावनी |
कनक-रयण-मणि-मंडित मंदिर अति बनी ||
अति बनी पौरि पगारि परिखा भवन उपवन सोहये |
नर-नारि सुन्दर चतुर भेख सु देख जन-मन मोहये ||
तहाँ जनकगृह छहमास प्रथमहिं रतन-धारा बरसियो |
पुनि रुचिकवासिनि जननि-सेवा करहिं सबविधि हरसियो ||२||
सुरकुंजर-सम कुंजर१ धवल धुरंधरो२ |
केहरि३-केशर-शोभित नख-शिख सुन्दरो ||
कमला-कलश-न्हवन४ दुइ दाम५ सुहावनी |
रवि६ ससि-मंडल७ मधुर मीन-जुग८ पावनी ||
पावनि कनक-घट-जुगम९ पूरण कमल-कलित सरोवरो१० |
कल्लोल-माला-कुलित सागर११ सिंहपीठ१२ मनोहरो ||
रमणीक अमरविमान१३ फणिपति-भवन१४ रवि छवि छाजर्इ |
रुचि रतनरासि१५ दिपंत-दहन सु तेजपुंज१६ विराजर्इ ||३||
ये सखि सोलह सुपने सूती सयन ही |
देखे माय मनोहर पच्छिम रयन ही ||
उठि प्रभात पिय पूछियो अवधि प्रकाशियो |
त्रिभुवनपति सुत होसी फल तिहँ भासियो ||
भासियो फल तिहिं चिंत दम्पति परम आनंदित भये |
छहमास परि नवमास पुनि तहँ रैन दिन सुखसों गये ||
गर्भावतार महंत महिमा सुनत सब सुख पावहीं |
भणि ‘रूपचंद’ सुदेव जिनवर जगत-मंगल गावहीं ||४||
(जन्म कल्याणक)
मति-श्रुत-अवधि-विराजित जिन जब जनमियो |
तिहुँलोक भयो छोभित सुरगन भरमियो ||
कल्पवासि-घर घंट अनाहद बज्जिया |
जोतिष-घर हरिनाद सहज गल-गज्जिया ||
गज्जिया सहजहिं संख भावन-भवन शब्द सुहावने |
विंतर-निलय पटु पटह बज्जहिं कहत महिमा क्यों बने ||
कंपित सुरासन अवधिबल जिन-जनम निहचै जानियो |
धनराज तब गजराज मायामयी निरमय आनियो ||५|||
जोजन लाख गयंद वदन सौ निरमये |
वदन वदन वसु दंत दंत सर संठये ||
सर-सर सौ-पनवीस कमलिनी छाजहीं |
कमलिनि कमलिनि कमल-पचीस विराजहीं ||
राजहीं कमलिनि कमलऽठोतर सौ मनोहर दल बने |
दल दलहिं अपछर नटहिं नवरस हाव भाव सुहावने ||
मणि कनक किंकणि वर विचित्र सु अमर मण्डप सोहये |
घन घंट चँवर धुजा पताका देखि त्रिभुवन मोहये ||६||
तिहिं करि हरि चढ़ि आयउ सुर परिवारियो |
पुरहिं प्रदच्छन दे त्रय जिन जयकारियो ||
गुपत जाय जिन-जननिहिं सुख निद्रा रची |
मायामयि सिसु राखि तौ जिन आन्यो शची ||
आन्यो सची जिनरूप निरखत नयन-तृपति न हूजिये |
तब परम हरषित-हृदय हरि ने, सहस लोचन कीजिये ||
पुनि करि प्रणाम जु प्रथम इन्द्र, उछंग धरि प्रभु लीनऊ |
ईशान इन्द्र सु चंद्र छवि सिर, छत्र प्रभु के दीनऊ ||७||
सनतकुमार माहेन्द्र चमर दुइ ढारही |
सेस सक्र जयकार सबद उच्चारही ||
उच्छव-सहित चतुर विधि सुर हरषित भये |
जोजन सहस निन्यानवे गगन उलंघि गये ||
लंघि गये सुरगिरि जहाँ पांडुक-वन विचित्र विराजहीं |
पांडुक-शिला तहँ अर्द्धचंद्र समान मणि-छवि छाजहीं ||
जोजन पचास विशाल दुगुणायाम, वसु ऊँची गनी |
वर अष्ट – मंगल कनक – कलशनि, सिंहपीठ सुहावनी ||८||
रचि मणिमंडप सोभित मध्य सिंहासनो |
थाप्यो पूरब-मुख तहँ प्रभु कमलासनो ||
बाजहिं ताल मृदंग वेणु वीणा घने |
दुंदुभि प्रमुख मधुर-धुनि अवर जु बाजने ||
बाजने बाजहिं सची सब मिलि धवल मंगल गावहीं |
पुनि करहिं नृत्य सुरांगना सब देव कौतुक धावहीं ||
भरि छीरसागर जल जु हाथहिं हाथ सुरगन ल्यावहीं |
सौधर्म अरु ईशान इन्द्र सु कलस ले प्रभु न्हावहीं ||९|||
वदन उदर अवगाह कलस-गत जानियो |
एक चार वसु जोजन मान प्रमानियो ||
सहस-अठोतर कलसा प्रभु के सिर ढरइँ |
पुनि सिंगार प्रमुख आचार सबै करइँ ||
करि प्रगट प्रभु महिमा महोच्छव आनि पुनि मातहिं दये |
धनपतिहिं सेवा राखि सुरपति आप सुरलोकहिं गये ||
जन्माभिषेक महंत-महिमा सुनत सब सुख पावहीं |
भणि ‘रूपचंद’ सुदेव जिनवर जगत मंगल गावहीं ||१०||
(तप कल्याणक)
श्रम-जल-रहित सरीर सदा सब मल-रहिउ |
छीर-वरन वर रुधिर प्रथम आकृति लहिउ ||
प्रथम सार संहनन सरूप विराजहीं |
सहज सुगंध सुलच्छन मंडित छाजहीं ||
छाजहीं अतुल बल परम प्रिय हित मधुर वचन सुहावने
दस सहज अतिशय सुभग मूरति बाललील कहावने ||
आबाल काल त्रिलोकपति मन-रुचिर उचित जु नित नये |
अमरोपनीत पुनीत अनुपम सकल भोग विभोगये ||११||
भव तन भोग विरत्त कदाचित् चित्तए |
धन जौबन पिय पुत्त कलत्त अनित्त ए ||
कोउ न सरन मरनदिन दुख चहुँगति भर्यो |
सुख दुख एकहि भोगत जिय विधि-वसि पर्यो ||
पर्यो विधि-वस आन चेतन आन जड़ जु कलेवरो |
तन असुचि परतैं होय आस्रव परिहरेतैं संवरो ||
निरजरा तपबल होय समकित बिन सदा त्रिभुवन भ्रम्यो |
दुर्लभ विवेक बिना न कबहूँ परम धरम विषै रम्यो ||१२||
ये प्रभु बारह पावन भावन भाइया |
लौकांतिक वर देव नियोगी आइया ||
कुसुमांजलि दे चरन कमल सिर नाइया |
स्वयंबुद्ध प्रभु थुतिकर तिन समुझाइया ||
समुझाय प्रभु को गये निजपुर पुनि महोच्छव हरि कियो |
रुचि रुचिर चित्र-विचित्र सिविका कर सुनंदन वन लियो ||
तहँ पंचमुट्ठी लोंच कीनों प्रथम सिद्धनि थुति करी |
मंडिय महाव्रत पंच दुद्धर सकल परिग्रह परिहरी ||१३||
मणि-मय-भाजन केश परिट्ठिय सुरपती |
छीर-समुद्र-जल खिप करि गयो अमरावती ||
तप-संयम-बल प्रभु को मनपरजय भयो |
मौन-सहित तप करत काल कछु तहँ गयो ||
गयो कुछ तहँ काल तपबल रिद्धि वसुविधि सिद्धिया |
जसु धर्मध्यानबलेन खय गय सप्त प्रकृति प्रसिद्धिया ||
खिपि सातवें गुण जतन बिन तहँ तीन प्रकृति जु बुधि बढ़िउ |
करि करण तीन प्रथम सुकलबल खिपकसेनी प्रभु चढ़िउ ||१४||
प्रकृति छतीस नवें गुणथान विनासिया |
दसवें सूच्छम लोभ प्रकृति तहँ नासिया ||
सुकल-ध्यानपद दूजो पुनि प्रभु पूरियो |
बारहवे गुण सोलह प्रकृति जु चूरियो ||
चूरियो त्रेसठ प्रकृति इह विधि घातिया-करमनि तणी |
तप कियो ध्यानपर्यन्त बारह बिधि त्रिलोक-सिरोमणी ||
नि:क्रमण-कल्याणक सुमहिमा सुनत सब सुख पावहीं |
भणि ‘रूपचंद’ सुदेव जिनवर जगत मंगल गावहीं ||१५||
(ज्ञान कल्याणक)
तेरहवें गुणथान सयोगि जिनेसुरो |
अनंत-चतुष्टय-मंडित भयो परमेसुरो ||
समवसरन तब धनपति बहुविधि निरमयो |
आगम-जुगति प्रमान गगनतल परिठयो ||
परिठयो चित्र-विचित्र मणिमय सभामंडप सोहये |
तिहि मध्य बारह बने कोठे कनक सुर-नर मोहये ||
मुनि कलपवासिनि अरजिका पुनि ज्योति-भौमि-भवन-तिया |
पुनि भवन व्यंतर नभग सुर नर पसुनि कोठे बैठिया ||१६||
मध्य प्रदेस तीन मणि-पीठ तहाँ बने |
गंध-कुटी सिंहासन कमल सुहावने ||
तीन छत्र सिर सोहत त्रिभुवन मोहए |
अंतरीच्छ कमलासन प्रभुतन सोहए ||
सोहये चौंसठ चमर ढुरत अशोकतरु तल छाजए |
पुनि दिव्य-धुनि प्रति-सबद-जुत तहँ देव दुंदुभि बाजए ||
सुरपुहुप-वृष्टि सुप्रभा-मंडल कोटि-रवि छवि छाजए |
इमि अष्ट अनुपम प्रातिहारज वर विभूति विराजए ||१७||
दुइसै जोजन मान सुभिच्छ चहूँ दिसी |
गगनगमन अरु प्राणी-वध नहिं अह-निसी ||
निरुपसर्ग निराहार सदा जगदीश ए |
आनन चार चहुँदिसि सोभित दीसए ||
दीसय असेस विसेस विद्या विभव वर ईसुरपना |
कायाविवर्जित सुद्ध फटिक समान तन प्रभु का बना ||
नहिं नयन-पलक-पतन कदाचित् केस नख सम छाजहीं |
ये घातिया-छय-जनित अतिशय दस विचित्र विराजहीं ||१८||
सकल अरथमय मागधि-भाषा जानिए |
सकल जीवगत मैत्री-भाव बखानिए ||
सकल रितुज फल-फूल-वनस्पति मन हरै |
दरपन सम मनि अवनि पवन-गति अनुसरै ||
अनुसरै परमानंद सबको नारि नर जे सेवता |
जोजन प्रमान धरा सुमार्जहिं जहाँ मारुत देवता ||
पुन करहिं मेघकुमार गंधोदक सुवृष्टि सुहावनी |
पद-कमल तर सुर खिपहिं कमल सु, धरणि-ससि-सोभा बनी ||१९||
अमल गगनतल अरु दिसि तहँ अनुहारहीं |
चतुर-निकाय देवगण जय जयकारहीं ||
धर्मचक्र चलै आगैं रवि जहँ लाजहीं |
पुनि भृंगारप्रमुख वसु मंगल राजहीं ||
राजहीं चौदह चारु अतिशय देव रचित सुहावने |
जिनराज केवलज्ञानमहिमा अवर कहत कहा बने ||
तब इन्द्र आय कियो महोच्छव सभा सोभा अति बनी |
धर्मोपदेश दियो तहाँ,उच्चरिय वानी जिनतनी ||२०||
क्षुधा तृषा अरु राग रोष असुहावने |
जन्म जरा अरु मरण त्रिदोष भयावने ||
रोग सोग भय विस्मय अरु निद्रा घनी |
खेद स्वेद मद मोह अरति चिंता गनी ||
गनिये अठारह दोष तिनकरि रहित देव निरंजनो |
नव परम केवललब्धि मंडिय सिव-रमनि-मन रंजनो ||
श्रीज्ञानकल्याणक सुमहिमा सुनत सब सुख पावहीं |
भणि ‘रूपचंद’ सुदेव जिनवर जगत-मंगल गावहीं ||२१||
(निर्वाण कल्याणक)
केवल-दृष्टि चराचर देख्यो जारिसो |
भव्यनि प्रति उपदेस्यो जिनवर तारिसो ||
भवभय भीत भविक जन सरणै आइया |
रत्नत्रय-लच्छन सिव-पंथ लगाइया ||
लगाइया पंथ जु भव्य पुनि प्रभु, तृतिय सुकल जु पूरियो |
तजि तेरवाँ गुणथान जोग, अजोगपथ पग धारियो ||
पुनि चौदहें चौथे सुकल-बल बहत्तर तेरह हती |
इमि घाति वसुविध-कर्म पहुँच्यो, समय में पंचम-गती ||२२||
लोकसिखर तनुवात-वलय महँ संठियो |
धर्मद्रव्य बिन गमन न जिहिं आगे कियो ||
मयनरहित मूषोदर अंबर जारिसो |
किमपि हीन निज-तनुतैं भयो प्रभु तारिसो ||
तारिसो पर्जय नित्य अविचल अर्थ पर्जय छन छयी |
निश्चय-नयेन अनंतगुण विवहार नय वसु गुणमयी ||
वस्तु-स्वभाव विभाव विरहित सुद्ध परिणति परिणयो |
चिद्रूप परमानंदमंदिर सिद्ध परमातम भयो ||२३||
तनु-परमाणू दामिनि-वत सब खिर गए |
रहे शेष नख-केशरूप जे परिणए ||
तब हरिप्रमुख चतुर विधि सुरगण शुभ सच्यो |
मायामयि नख-केशरहित जिन-तनु रच्यो ||
रचि अगर-चंदन प्रमुख परिमल द्रव्य जिन जयकारियो |
पदपतित अगनिकुमार मुकुटानल सुविध संस्कारियो ||
निर्वाणकल्याणक सु महिमा, सुनत सब सुख पावहीं |
भणि ‘रूपचंद’ सुदेव जिनवर जगत मंगल गावहीं ||२४||
(पंचकल्याणकों की समुच्चय भावना)
मैं मतिहीन भगतिवस भावन भाइया |
मंगल गीतप्रबंध सु जिनगुण गाइया ||
जो नर सुनहिं बखानहिं सुर धरि गावहीं |
मनवाँछित-फल सो नर निहचै पावहीं ||
पावहीं आठों सिद्धि नव-निध मन प्रतीत जो लावहीं |
भ्रमभाव छूटै सकल मन के निजस्वरूप लखावहीं ||
पुनि हरहिं पातक टरिहिं विघन सु होंहिं मंगल नित नये |
भणि ‘रूपचंद’ त्रिलोकपति जिनदेव चउ-संघहिं जये ||२५||
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