श्रावक-प्रतिक्रमण
श्रावक कौन? जो श्रद्धावान हो, विवेकवान हो और क्रियाशील हो| श्रद्धा हो जिनेन्द्र-देव और जिनागम में, विवेक हो अपने कल्याण का, और क्रियाएँ हों अपने कल्याण हेतु जिनेन्द्र-देव और जिनागम में वर्णित मार्ग को आज्ञा मान कर अपनाने...
जो श्रद्धावान हो, विवेकवान हो और क्रियाशील हो| श्रद्धा हो जिनेन्द्र-देव और जिनागम में, विवेक हो अपने कल्याण का, और क्रियाएँ हों अपने कल्याण हेतु जिनेन्द्र-देव और जिनागम में वर्णित मार्ग को आज्ञा मान कर अपनाने की| ये आज्ञाएँ अहिंसा को परम-धर्म बताते हुए, गुणों के आधार से श्रावकों के तीन वर्ग बनाती हैं- पाक्षिक, नैष्ठिक, व साधक|
जिनेन्द्र आज्ञा के प्रति भक्ति की भावना से 6 आवश्यक, 7 व्यसन-त्याग, 8 मूल गुण धारण करने वाला पाक्षिक श्रावक बताया है| आगे उसे 12 व्रतों के धारण, सम्यक्त्व के 25 दोषों व अतिचारों का त्याग व 12 भावनाओं के ज्ञान व चिंतवन करने में दृढ़ निष्ठा प्रकट होती है प्रतिमा-धारण के रूप में, तो नैष्ठिक श्रावक बताया है| तथा ग्यारहवीं प्रतिमा वाला साधक श्रावक बताया गया है।
श्रावक होते हुए भी मन, वचन काय-बलों की हीनता, क्षीणता, प्रमाद, कषाय, कुज्ञान, द्रव्य,क्षेत्र, काल व भावों की विषमता आदि कारणों से सभी व्रतों, नियमों आदि के पालन में चूकें होने की संभावनाएँ भी परमेष्ठी भगवंतों के ज्ञान में झलकी हैं। और इन से हुए पापों से छुड़ाने की विधि का ज्ञान ‘प्रतिक्रमण’ रूप में देकर उन्होने सब का कल्याण किया है। धारण किए हुए व्रतों में लग गए दोषों, अतिचारों, अतिक्रमणों को ज्ञान में ले कर, प्रायश्चित्त एवं पश्चात्ताप-पूर्वक फिर से ऐसे दोष न लगें ऐसे संकल्प करना ‘प्रतिक्रमण’ है। साधु, साध्वी, क्षुल्लक, क्षुल्लिका और व्रती श्रावक, श्राविकाएँ नियम से प्रतिदिन प्रतिक्रमण कर अपने श्रावकीय-जीवन को सार्थक करते हैं | यह क्रिया ‘सामयिक’ का प्रथम-अंग है।