सिद्ध-पूजा : भावाष्टक तथा द्रव्याष्टक
(पूजन विधि निर्देश) निज-मनोमणि-भाजन-भारया, समरसैक-सुधारस-धारया | सकल-बोध-कला-रमणीयकं, सहज-सिद्धमहं परिपूजये || मोहि तृषा दु:ख देत, सो तुमने जीती प्रभू | जल से पूजूँ मैं तोय, मेरो रोग निवारियो || ॐ ह्रीं श्रीसिद्धचक्राधिप...
निज-मनोमणि-भाजन-भारया, समरसैक-सुधारस-धारया |
सकल-बोध-कला-रमणीयकं, सहज-सिद्धमहं परिपूजये ||
मोहि तृषा दु:ख देत, सो तुमने जीती प्रभू |
जल से पूजूँ मैं तोय, मेरो रोग निवारियो ||
ॐ ह्रीं श्रीसिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने जन्म-जरा-मृत्यु-विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।१।
सहज-कर्म-कलंक-विनाशनैरमल-भाव-सुवासित-चन्दनै: |
अनुपमान-गुणावलि-नायकं सहज-सिद्धमहं परिपूजये ||
हम भव-आतप माँहिं, तुम न्यारे संसार से |
कीज्यो शीतल छाँह, चंदन से पूजा करूँ ||
ॐ ह्रीं श्रीसिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने संसारताप विनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा।२।
सहज-भाव-सुनिर्मल-तंदुलै:, सकल-दोष-विशाल-विशोधनै: |
अनुपरोध-सुबोध-निधानकं, सहज-सिद्धमहं परिपूजये ||
हम-अवगुण समुदाय, तुम अक्षयगुण के भरे |
पूजूँ अक्षत ल्याय, दोष-नाश गुण कीजियो ||
ॐ ह्रीं श्रीसिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने अक्षयपद-प्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।३।
समयसार-सुपुष्प-सुमालया, सहज-कर्म-करेण विशोधया |
परम-योग-बलेन वशीकृतं, सहज-सिद्धमहं परिपूजये ||
काम-अग्नि है मोहि, निश्चय शील-स्वभाव तुम |
फूल चढ़ाऊँ मैं तोय, मेरो रोग निवारियो ||
ॐ ह्रीं श्रीसिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने कामबाण-विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।४।
अकृत-बोध-सुदिव्य-नैवेद्यकै:, विहित-जात-जरा-मरणांतकै: |
निरवधि-प्रचुरात्म-गुणालयं, सहज-सिद्धमहं परिपूजये ||
मोहि क्षुधा दु:ख देत, ध्यान-खड्ग करि तुम हती |
मेरी बाधा चूर, नेवज से पूजा करूँ ||
ॐ ह्रीं श्रीसिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने क्षुधारोग-विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीतिस्वाहा।५।
सहज-रत्नरुचि-प्रतिदीपकै:, रुचि-विभूति तम: प्रविनाशनै: |
निरवधि-स्वविकाश-प्रकाशनै:, सहज-सिद्धमहं परिपूजये ||
मोह-तिमिर हम पास, तुम पै चेतन-ज्योति है |
पूजौं दीप-प्रकाश, मेरो तम निरवारियो ||
ॐ ह्रीं श्रीसिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने मोहांधकार-विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।६।
निज-गुणाक्षय-रूप-सुधूपनै:, स्वगुण-घाति-मल-प्रविनाशनै: |
विशद बोध-सुदीर्घ-सुखात्मकं, सहज-सिद्धमहं परिपूजये ||
अष्टकर्म-वन-जाल, मुक्ति-स्वामी सुख करो |
खेऊँ धूप रसाल, अष्ट-कर्म निरवारियो ||
ॐ ह्रीं श्रीसिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने अष्टकर्म-विध्वंसनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।७।
परम-भाव-फलावलि-सम्पदा, सहजभाव-कुभाव-विशोधया |
निजगुण-स्फुरणात्म-निरंजन, सहज-सिद्धमहं परिपूजये ||
अन्तराय-दु:ख टाल, तुम अनंत-थिरता लही |
पूजूँ फल दरशाय, विघ्न टाल शिवफल करो ||
ॐ ह्रीं श्रीसिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने मोक्षफल-प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।८।
नेत्रोन्मीलि-विकास-भावनिवहैरत्यन्त-बोधाय वै |
वार्गन्धाक्षत-पुष्प-दाम-चरुकै: सद्दीपधूपै: फलै: ||
यश्चिन्तामणि-शुद्ध-भाव-परमं ज्ञानात्मकैरर्चयेत्,
सिद्धं स्वादुमगाध-बोधमचलं सञ्चर्चयामो वयम् ||
हममें आठ ही दोष, जजहुँ अर्घ ले सिद्ध जी |
दीजे वसु-गुण मोय, कर जोड़े सेवक खड़ा ||
ॐ ह्रीं श्री सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।९।
जयमाला
विराग सनातन शांत निरंश, निरामय निर्भय निर्मल हंस |
सुधाम विबोध-निधान विमोह, प्रसीद विशुद्ध सुसिद्ध-समूह ||
अर्थ- रागरहित हे वीतराग, हे सनातन (अनादि-अनिधन); उद्वेग, द्वेष, क्रोधादि से रहित होने से वास्तविक शांति को प्राप्त करनेवाले हे शांत! अंश कल्पना से रहित होने के कारण हे निरंश! शारीरिक-मानसिक रोगों से रहित हे निरामय! मरणादि भयों से रहित होने के कारण हे निर्भय! हे निर्मल आत्मा! निर्मल ज्ञान के उत्तमधाम! मोहरहित होने से विमोह! ऐसे परम-सिद्धों के समूह (हम पर) प्रसन्न होइये।
विदूरित-संसृति-भाव निरंग, समामृत-पूरित देव विसंग |
अबंध कषाय-विहीन विमोह, प्रसीद विशुद्ध सुसिद्ध-समूह ||
अर्थ- हे सांसारिक भावों को दूर करनेवाले! हे अशरीरी! हे समतारूपी अमृत से परिपूर्ण देव! हे अंतरंग-बहिरंग संगरहित विसंग! हे कर्मबंधन से विनिर्मुक्त! हे कषायरहित! हे विमोह! विशुद्ध सिद्धों के समूह! (हम पर) प्रसन्न होइये।२।
निवारित-दुष्कृतकर्म-विपाश, सदामल-केवल-केलि-निवास |
भवोदधि-पारग शांत विमोह, प्रसीद विशुद्ध सुसिद्ध-समूह ||
अर्थ– हे दुष्कर्म के नाशक! हे कर्मजंजाल से रहित! हे निर्मल केवलज्ञान के क्रीड़ास्थल! संसार के पारगामी! हे परम शान्त! हे मोहमुक्त पवित्र सिद्धों के समूह (हम पर) प्रसन्न होइये।३।
अनंत-सुखामृत-सागर-धीर, कलंक-रजो-मल-भूरि-समीर |
विखण्डित-काम विराम-विमोह, प्रसीद विशुद्ध सुसिद्ध-समूह ||
अर्थ- हे अनंतसुखरूपी अमृत के समुद्र! हे धीर! कलंकरूपी धूलि को उड़ाने के लिए प्रबल वायु! हे कामविकार को खंडित करनेवाले! हे कर्मों के विरामस्थल! हे निर्मोह पवित्र सिद्धों के समूह (हम पर) प्रसन्न होइये।४।
विकार-विवर्जित तर्जित-शोक, विबोध-सुनेत्र-विलोकित-लोक |
विहार विराव विरंग विमोह, प्रसीद विशुद्ध सुसिद्ध-समूह ||
अर्थ– कर्मजन्य शुभ-अशुभ विकारों से रहित! हे शोकरहित! हे केवलज्ञान रूपी नेत्र से सम्पूर्ण
लोक को देखनेवाले! कर्मादिक द्वारा हरण से रहित! शब्दरहित तथा रंग से रहित ऐसे हे मोह-रहित! परम विशुद्ध सिद्धों के समूह! (हम पर) प्रसन्न होइये।५।
रजोमल-खेद-विमुक्त विगात्र, निरंतर नित्य सुखामृत-पात्र |
सुदर्शन राजित नाथ विमोह, प्रसीद विशुद्ध सुसिद्ध-समूह ||
अर्थ- दोष-आवरण तथा खेदरहित! हे अशरीरी! हे निरंतर! समय के अन्तररहित! सुखरूपी
अमृत के पात्र! हे सम्यग्दर्शन या केवलदर्शन से शोभायमान हे संसार के स्वामी! हे मोह- रहित परम पवित्रता युक्त सिद्धों के समूह! (हम पर) प्रसन्नता धारण कीजिए।६।
नरामर-वंदित निर्मल-भाव, अनंत मुनीश्वर पूज्य विहाव |
सदोदय विश्व महेश विमोह, प्रसीद विशुद्ध सुसिद्ध-समूह ||
अर्थ- हे मनुष्य और देवों से पूजनीय! हे समस्त दोषो से मुक्त होने के कारण निर्मल भाव वाले हे अनंत मुनीश्वरों से पूज्य! हे विकाररहित! हे सर्वदा उदयस्वरूप! हे समस्त संसार के महास्वामिन्! हे विमोह! हे परमपवित्र सिद्धों के समूह! (हम पर) प्रसन्नता धारण कीजिए।७।
विदंभ वितृष्ण विदोष विनिद्र, परापर-शंकर सार वितंद्र |
विकोप विरूप विशंक विमोह, प्रसीद विशुद्ध सुसिद्ध-समूह ||
अर्थ– हे घमंडरहित! हे तृष्णारहित! द्वेषादिक दोषरहित! हे निद्रारहित! हे स्व तथा पर की महा-अशांति के कारक अधर्म का नाश कर धर्मरूपी शांति करनेवाले! हे आलस्यरहित! हे कोप- रहित! हे रूपरहित! हे शंकारहित! मोहरहित विशुद्ध-सिद्धों के समूह! (हम पर) प्रसन्न होइये।८।
जरा-मरणोज्झित-वीत-विहार, विचिंतित निर्मल निरहंकार |
अचिन्त्य-चरित्र विदर्प विमोह, प्रसीद विशुद्ध सुसिद्ध-समूह ||
अर्थ- हे वृद्धता तथा मरणदशा को पार करनेवाले! हे गमनरहित! चिन्तारहित! हे अज्ञानादिक आत्मीय मैल से रहित! हे अहंकाररहित! अचिंत्य चारित्र के धारक! हे दर्परहित! हे मोहरहित! परम पवित्र सिद्धों के संघ! (हम पर) प्रसन्नता धारण कीजिए।९।
विवर्ण विगंध विमान विलोभ, विमाय विकाय विशब्द विशोभ |
अनाकुल केवल सर्व विमोह, प्रसीद विशुद्ध सुसिद्ध-समूह ||
अर्थ- हे श्वेत-पीतादिक वर्णरहित! हे गंधरहित! हे छोटे-बड़े हल्के-भारी आदि परिमान से रहित! हे लोभरहित! हे मायारहित! हे शरीररहित! हे शब्दरहित! हे कृत्रिम शोभारहित! हे आकुलतारहित! सबका हित करनेवाले! मोहरहित परम पवित्र सिद्धों के समूह! (हम पर) प्रसन्नता धारण कीजिए।१०।
(घत्ता मालिनी छन्द)
असम – समयसारं चारु – चैतन्य – चिह्नम् |
पर – परिणति – मुक्तं पद्मनंदीन्द्र – वन्द्यम् ||
निखिल – गुण – निकेतं सिद्ध-चक्रं विशुद्धम् |
स्मरति नमति यो वा स्तौति सोऽभ्येति मुक्तिम् ||
ॐ ह्रीं श्री सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
अर्थ– इस प्रकार जो मनुष्य असम (असाधारण) अर्थात् संसारी आत्माओं से भिन्न, समयसार-स्वरूप, सुन्दर निर्मल-चेतना जिनका चिह्न है, जड़- द्रव्य के परिणमन से रहित तथा पद्मनंदि देव मुनि द्वारा वंदनीय एवं समस्त गुणों के घर-रूप सिद्धमंडल को जो स्मरण करता है, नमस्कार करता है तथा उनका स्तवन करता है, वह मोक्ष को पा लेता है।
(अडिल्ल छन्द)
अविनाशी अविकार परम-रस-धाम हो |
समाधान सर्वज्ञ सहज अभिराम हो ||
शुद्ध बुद्ध अविरुद्ध अनादि अनंत हो |
जगत-शिरोमणि सिद्ध सदा जयवंत हो ||१||
अर्थ- हे भगवान्! आप अविनाशी, अविकार, अनुपम सुख के स्थान, मोक्षस्थान में रहने वाले, सर्वज्ञ तथा स्वाभाविक गुणों में रमण करनेवाले हो और निर्मल ज्ञानधारी, आत्मिक गुणों के अनुकूल तथा अनादि और अनंत हो। हे संसार के शिरोमणि सिद्ध भगवान्! आपकी सदा जय होवे।
ध्यान अग्निकर कर्म-कलंक सबै दहे |
नित्य निरंजन देव स्वरूपी ह्वै रहे ||
ज्ञायक ज्ञेयाकार ममत्व-निवार के |
सो परमातम सिद्ध नमूँ सिर नायके ||२||
अर्थ- जिन्होंने शुक्लध्यानरूपी अग्नि से समस्त कर्मरूपी कलंक को जला दिया, जो नित्य निर्दोष देवरूप हो गये, जानने योग्य व जाननेवाले का भेद मिटाकर उन सिद्ध-परमात्मा को सिर झुकाकर नमन करता हूँ।
(दोहा)
अविचल ज्ञान-प्रकाशतैं, गुण-अनंत की खान |
ध्यान धरे सो पाइए, परम सिद्ध-भगवान् ||३||
अर्थ- जो निश्चल केवलज्ञान से प्रकाशमान है, अनंत गुणों के खान स्वरूप है, ऐसे पूज्यनीय सिद्ध भगवान् को केवल ध्यान द्वारा ही पा सकते हैं।
अविनाशी आनंदमय, गुणपूरण भगवान् |
शक्ति हिये परमात्मा, सकल पदारथ जान ||४||
अर्थ- समस्त पदार्थों को जानने के लिये अविनाशी, आनंदस्वरूप, गुणों से परिपूर्ण परमात्मा की शक्ति हृदय में धारण करो।
।।इत्याशीर्वाद: पुष्पांजलिं क्षिपेत्।।