पूजा संग्रह · Sanskrit · Devanagari

सिद्ध-पूजा (संस्कृत)

आचार्य पद्मनन्दि पूजाएँ दो प्रकार से की जा सकती हैं। ‘द्रव्यपूजा’ द्रव्याष्टक बोलते हुए क्रमश: द्रव्य चढ़ाते हुए करते हैं। जबकि ‘भावपूजा’ आरम्भ–परिग्रह त्यागने वाले श्रावक, मुनिगण तथा बिना सामग्री के पूजन करने के इच्छुक...

आचार्य पद्मनन्दि
पूजाएँ दो प्रकार से की जा सकती हैं। ‘द्रव्यपूजा’ द्रव्याष्टक बोलते हुए क्रमश: द्रव्य चढ़ाते हुए करते हैं। जबकि ‘भावपूजा’ आरम्भ–परिग्रह त्यागने वाले श्रावक, मुनिगण तथा बिना सामग्री के पूजन करने के इच्छुक मन के भावों से ‘भावाष्टक’ बोलकर करते हैं। सिद्धों की पूजा के दोनों ही प्रकार के अष्टक संस्कृत में भी है तथा हिन्दी भाषा में भी। हिन्दी भावाष्टक–युक्त एक संपूर्ण पूजा अलग से भी है, पूजक अपनी भावना के अनुसार कोई भी पूजन कर सकते हैं।
द्रव्याष्टक
ऊर्ध्वाधोरयुतं सबिन्दु सपरं ब्रह्म-स्वरावेष्टितम् |
वर्गापूरित-दिग्गताम्बुज-दलं तत्संधि-तत्वान्वितम् ||
अंत:पत्र-तटेष्वनाहत-युतं ह्रींकार-संवेष्टितम् |
देवं ध्यायति य: स मुक्तिसुभगो वैरीभ-कण्ठीरव: ||१||
ॐ ह्रीं श्री सिद्धचक्राधिपते सिद्धपरमेष्ठिन्! अत्र अवतर! अवतर! संवौषट्! ( इति आह्वाननम्)
ॐ ह्रीं श्री सिद्धचक्राधिपते सिद्धपरमेष्ठिन्! अत्र तिष्ठ! तिष्ठ! ठ:! ठ:! ( इति स्थापनम्)
ॐ ह्रीं श्री सिद्धचक्राधिपते सिद्धपरमेष्ठिन्! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्! ( इति सन्निधिकरणम्)
अर्थ– ऊपर और नीचे रेफ से युक्त बिन्दु–सहित हकार (र्ह्रं), जिसे घेरती हुई वर्गपूरित आठ पंखुड़ियाँ हैं (वर्गपूरित अर्थात्- पहली पंखुड़ी पर अ आ इ ई उ ऊ ए ऐ ओ औ अं अ: ऋ ऋृ लृ लृ; दूसरी पर क ख ग घ ङ; तीसरी पर च छ ज झ ञ; चौथी पर ट ठ ड ढ ण; पाँचवीं पर त थ द ध न; छठवीं पर प फ ब भ म; सातवीं पर य र ल व; तथा आठवीं पंखुड़ी पर श ष स ह हैं)। आठों पंखुड़ियों के जुड़ावों पर ‘णमो अरिहंताणं’ है| पंखुड़ियों के भीतरी किनारे ’ह्रीं’ से सहित हैं, ऐसे अक्षरात्मक सिद्ध–परमेष्ठी का जो ध्यान करता है, वह मुक्ति-सुन्दरी का पति तथा कर्मरूपी हाथी को सिंह के समान नष्ट करनेवाला होता है।
निरस्तकर्म-सम्बन्धं सूक्ष्मं नित्यं निरामयम् |
वन्देऽहं परमात्मानममूर्त्तमनुपद्रवम् ||२||
(सिद्धयंत्र की स्थापना कर वंदन करें।)
अर्थ– कर्म–बंधन से रहित अशरीरी होने के कारण ‘सूक्ष्म’, जन्म मरणादि रहित होने से ‘नित्य’, शारीरिक व मानसिक आधि–व्याधियों से रहित होने से ‘निरामय’ (निरोग), पुद्गल का संबंध न होने के कारण ‘अमूर्त’, तथा सांसारिक संबंध न होने से ‘उपद्रव–रहित’ सिद्ध परमात्मा को नमस्कार करता हूँ।
सिद्धौ निवासमनुगं परमात्म-गम्यम् |
हान्यादिभावरहितं भव-वीत-कायम् ||
रेवापगा-वर-सरो-यमुनोद्भवानाम् |
नीरैर्यजे कलशगैर्वर-सिद्धचक्रम् ||३||
ॐ ह्रीं सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने जन्म–जरा–मृत्यु–विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।१।
अर्थ– लोक के अंत-भाग में विराजमान, केवली सर्वज्ञदेव परमात्मा के जानने योग्य, हानि–वृद्धि (जन्म–मरण) आदि विकारों से रहित संसारातीत शरीरवाले सिद्धों के समूह को रेवा, गंगा, यमुना आदि स्वच्छ–सरिताओं के जल से भरे कलशों से पूजता हूँ।।
आनंद-कंद-जनकं घन-कर्म-मुक्तम् |
सम्यक्त्व-शर्म-गरिमं जननार्तिवीतम् ||
सौरभ्य-वासित-भुवं हरि-चंदनानाम् |
गन्धैर्यजे परिमलैर्वर-सिद्धचक्रम् ||४||
ॐ ह्रीं श्रीसिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने संसारताप विनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा।
अर्थ– आनंद के अंकुर को उत्पन्न करनेवाले, कर्म–मल से रहित, क्षायिक सम्यक्त्व तथा अनंत सुखधारी होने से परम गौरवशाली, जन्म-पीड़ा से रहित, निर्मल कीर्ति रूपी सुरभि के वास ऐसे सिद्ध–समूह को मलय–गिरि के मनोहर सुंगधित चंदन से पूजन करता हूँ।
सर्वावगाहन-गुणं सुसमाधि-निष्ठम् |
सिद्धं स्वरूप-निपुणं कमलं विशालम् ||
सौगन्ध्य-शालि-वनशालि-वराक्षतानाम् |
पुंजैर्यजे – शशिनिभैर्वर – सिद्धचक्रम् ||५||
ॐ ह्रीं श्रीसिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरममेष्ठिने अक्षयपद–प्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।
अर्थ– आयुकर्म के नाश से प्रकट अवगाहन–गुण के धारक, अपने अनंत गुणों में मग्न, अपने निष्कलंक स्वरूप और परमज्ञान से सम्पूर्ण जगत् में प्रसिद्ध सिद्ध–भगवान् को सुगंधित श्रेष्ठ चन्द्रमा के समान निर्मल अक्षतों के पुंज से पूजन करता हूँ।
नित्यं स्वदेह-परिमाणमनादिसंज्ञम् |
द्रव्यानपेक्षममृतं मरणाद्यतीतम् ||
मंदार-कुंद-कमलादि-वनस्पतीनाम् |
पुष्पैर्यजे शुभतमैर्वर – सिद्धचक्रम् ||६||
ॐ ह्रीं श्रीसिद्धचक्राधिपतयेसिद्धपरमेष्ठिने कामबाण विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
अर्थ– कर्मों के द्वारा होनेवाली जन्म–मरणादि अनेक अनित्य पर्यायों से रहित होने के कारण नित्य, चरमशरीर से कुछ कम अपने शरीर के परिमाण में अवस्थित, अनादि-कालीन पुद्गलादिक अन्य द्रव्यों से निरपेक्ष अपनी सिद्ध–पर्याय से अच्युत और जीवों को ध्यान करने पर अमृत के समान सुख करनेवाले मरण–शोक–रोगादिक से रहित सिद्ध–समूह की मंदार, कुंद, कमल आदि पौधों के अत्यन्त सुन्दर पुष्पों से पूजन करता हूँ।
ऊर्ध्व-स्वभाव-गमनं सुमनो-व्यपेतम् |
ब्रह्मादि-बीज-सहितं गगनावभासम् ||
क्षीरान्न-साज्य-वटकै रसपूर्णगर्भै-
र्नित्यं यजे चरुवरैर्वर – सिद्धचक्रम् ||७||
ॐ ह्रीं श्रीसिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने क्षुधारोग–विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
अर्थ– कर्म–बंध टूट जाने के कारण स्वभाव से ही ऊर्ध्वगमन करनेवाले, जो इन्द्रिय एवं मतिज्ञानावरण के क्षयोपशम से होनेवाले द्रव्यमन–भावमन से रहित, तथा अमूर्तिक हैं, निर्मल हैं, आकाश के समान जिनका ज्ञान व्यापक है, उन परमपूज्य सिद्ध–समूह को दूध, अन्न, घृतादि से बने रसपूर्ण व्यंजनों से सर्वदा पूजन करता हूँ।
आतंक-शोक-भय-रोग-मद-प्रशान्तम् |
निर्द्वन्द्व-भाव-धरणं महिमा-निवेशम् ||
कर्पूर-वर्ति-बहुभि: कनकावदातै-
र्दीपैर्यजे रुचिवरैर्वर-सिद्धचक्रम् ||८||
ॐ ह्रीं श्रीसिद्धचक्राधिपतयेसिद्धपरमेष्ठिने मोहांधकार–विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
अर्थ– संताप अथवा उदासी, शोक, भय, रोग, मान से रहित, निर्द्वन्द्वता के धारक (दुविधा से रहित), निश्चल तथा सर्वोत्तम महिमा (बड़प्पन) के घर–स्वरूप सिद्ध–समूह की मैं स्वर्ण–पात्रों में सजी कपूर की अनेक बत्तियों युक्त दीपकों से अर्चना करता हूँ।
पश्यन्समस्त-भुवनं युगपन्नितान्तम् |
त्रैकाल्य-वस्तु-विषये निविड-प्रदीपम् ||
सद्द्रव्यगन्ध-घनसार-विमिश्रितानाम् |
धूपैर्यजे परिमलैर्वर-सिद्ध-चक्रम् ||९||
ॐ ह्रीं श्रीसिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने अष्टकर्म–दहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
अर्थ–केवलज्ञान द्वारा समस्त संसार को अच्छी तरह एक साथ देखने वाले तथा भूत, भविष्यत तथा वर्तमान कालवर्ती पदार्थों को तथा उनकी पर्यायों को प्रकाशित करने में दैदीप्यमान दीपक–समान सर्वोत्तम सिद्धसमूह को मैं कपूर, चंदन, अगर आदि उत्तम तथा सुगंधित पदार्थो की सुंगधित धूप द्वारा पूजा करता हूँ।
सिद्धासुरादिपति-यक्ष-नरेन्द्रचक्रै –
ध्र्येयं शिवं सकल-भव्य-जनै:सुवन्द्यम् ||
नारंगि-पूग-कदली-फल-नारिकेलै: |
सोऽहं यजे वरफलैर्वर-सिद्ध-चक्रम् ||१०||
ॐ ह्रीं श्रीसिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने मोक्षफल–प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।
अर्थ–व्यन्तर–असुरकुमार आदि देवों के इन्द्रों के तथा यक्ष–नरपतियों के समूहों द्वारा ध्येय, कल्याणस्वरूप, समस्त भव्य–पुरुषो द्वारा वन्दनीय सिद्धों के संघ की नारंगी, सुपारी, केला तथा नारियल आदि उत्तम–फलों के द्वारा पूजन करता हूँ।
गन्धाढ्यं सुपयो मधुव्रत-गणै: संगं वरं चन्दनम् |
पुष्पौघं विमलं सदक्षत-चयं रम्यं चरुं दीपकम् ||
धूपं गन्धयुतं ददामि विविधं श्रेष्ठं फलं लब्धये |
सिद्धानां युगपत्क्रमाय विमलं सेनोत्तरं वांछितम् ||११||
ॐ ह्रीं श्रीसिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने अनर्घ्यपद–प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
अर्थ– सुगंधित निर्मल जल, जिसकी सुगंध से भौंरे आ गये हैं ऐसा चंदन, उज्जवल अक्षत, पुष्प–पुंज, मनोहर नैवेद्य, दीपक तथा सुगंधित धूप, एवं उत्तम फलों को एक साथ मिलाकर अर्घ्य बनाकर, जन्म–मरण राग–द्वेषादि दोषो से रहित निर्मल, कर्म–बंधनादि रहित, अथवा चक्रवर्ती इन्द्रादि पद से भी उत्तम अभीष्टफल पाने के लिए सिद्धों के चरणों में समर्पित करता हूँ।
ज्ञानोपयोगविमलं विशदात्मरूपम् |
सूक्ष्म-स्वभाव-परमं यदनन्तवीर्यम् ||
कर्मोंघ-कक्ष-दहनं सुख-सस्यबीजम् |
वंदे सदा निरुपमं वर-सिद्धचक्रम् ||१२||
अर्थ– कषायों के क्षय हो जाने से जिनका ज्ञानोपयोग निर्मल है, समस्त कर्ममल के नष्ट हो जाने से जिनका आत्मस्वरूप परम–निर्मल है, जो औदारिक, कार्माणादि शरीरों से रहित होने के कारण परम–सूक्ष्म हैं, वीर्य–घातक अंतराय–कर्म के नाश हो जाने से अनंतबल के धारक हैं, कर्म–समूह को जलानेवाले तथा सुखरूप धान्य को उत्पन्न करने में बीज के समान हैं, ऐसे अनुपम गुणधारी सिद्धों के समूह को मैं सर्वदा नमस्कार करता हूं।
कर्माष्टक – विनिर्मुक्तं मोक्ष – लक्ष्मी – निकेतनम् |
सम्यक्त्वादि- गुणोपेतं सिद्धचक्रं नमाम्यहम् ||१३||
ॐ ह्रीं श्रीसिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने महार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
अर्थ– आठ कर्मों से रहित मोक्ष–लक्ष्मी के मंदिर, और सम्यक्त्वादि आठ गुणों से युक्त सिद्धसमूह को मैं नमस्कार करता हूँ।
त्रैलोक्येश्वर-वन्दनीय-चरणा: प्रापु: श्रियं शाश्वतीम् |
यानाराध्य निरुद्ध-चण्ड-मनस: सन्तोऽपि तीथर्करा: ||
सत्सम्यक्त्व-विबोध-वीर्य-विशदाव्याबाधताद्यैर्गुणै-
र्युक्तांस्तानिह तोष्टवीमि सततं सिद्धान् विशुद्धोदयान् ||१४||
अर्थ– देवेन्द्र, धरणेन्द्र, चक्रवर्ती आदि से जिनके चरण पूजनीय हैं, ऐसे तीथर्कर भी जिनकी आराधना करके नित्य–लक्ष्मी को पा चुके हैं तथा जो क्षायिक सम्यक्त्व, अंनतज्ञान, अनंतवीर्य, अव्याबाध आदि अनंत गुणों से विभूषित हैं और जिनमें परम विशुद्धता का उदय हो गया है, ऐसे सिद्धों का मैं सर्वदा बारंबार स्तवन करता हूँ।
(पुष्पांजलिं छिपामि)
जयमाला
विराग सनातन शांत निरंश, निरामय निर्भय निर्मल हंस |
सुधाम विबोध-निधान विमोह, प्रसीद विशुद्ध सुसिद्ध-समूह ||
’’||अरथ– रगरहत हवतरग, हसनतन (अनद–अनधन); उदवग, दवष, करधदसरहत हनसवसतवक शतकपरपत करनवलहशत! अश, कलपनसरहत हनककरण हनरश! शररक–मनसक रगसरहत हनरमय! मरणदभयसरहत हनककरण हनरभय! हनरमल आतम! नरमल जञन कउततमधम! महरहत हनसवमह! ऐसपरम–सदधकसमह (हम पर) परसनन हइय।
विदूरित-संसृति-भाव निरंग, समामृत-पूरित देव विसंग |
अबंध कषाय-विहीन विमोह, प्रसीद विशुद्ध सुसिद्ध-समूह ||
अर्थ–हे सांसारिक भावों को दूर करनेवाले! हे अशरीरी! हे समतारूपी अमृत से परिपूर्ण देव! हे अंतरंग–बहिरंग संगरहित विसंग! हे कर्मबंधन से विनिर्मुक्त! हे कषायरहित! हे विमोह! विशुद्ध सिद्धों के समूह! (हम पर) प्रसन्न होइये।२।
निवारित-दुष्कृतकर्म-विपाश, सदामल-केवल-केलि-निवास |
भवोदधि-पारग शांत विमोह, प्रसीद विशुद्ध सुसिद्ध-समूह ||
अर्थ– हे दुष्कर्म के नाशक! हे कर्मजंजाल से रहित! हे निर्मल केवलज्ञान के क्रीड़ास्थल! संसार के पारगामी! हे परम शान्त! हे मोहमुक्त पवित्र सिद्धों के समूह (हम पर) प्रसन्न होइये।३।
अनंत-सुखामृत-सागर-धीर, कलंक-रजो-मल-भूरि-समीर |
विखण्डित-काम विराम-विमोह, प्रसीद विशुद्ध सुसिद्ध-समूह ||
अर्थ– हे अनंतसुखरूपी अमृत के समुद्र! हे धीर! कलंकरूपी धूलि को उड़ाने के लिए प्रबल वायु! हे कामविकार को खंडित करनेवाले! हे कर्मों के विरामस्थल! हे निर्मोह पवित्र सिद्धों के समूह (हम पर) प्रसन्न होइये।४।
विकार-विवर्जित तर्जित-शोक, विबोध-सुनेत्र-विलोकित-लोक |
विहार विराव विरंग विमोह, प्रसीद विशुद्ध सुसिद्ध-समूह ||
अर्थ– कर्मजन्य शुभ–अशुभ विकारों से रहित! हे शोकरहित! हे केवलज्ञान रूपी नेत्र से सम्पूर्ण लोक को देखनेवाले! कर्मादिक द्वारा हरण से रहित! शब्दरहित तथा रंग से रहित ऐसे हे मोहरहित! परम विशुद्ध सिद्धों के समूह! (हम पर) प्रसन्न होइये।५।
रजोमल-खेद-विमुक्त विगात्र, निरंतर नित्य सुखामृत-पात्र |
सुदर्शन राजित नाथ विमोह, प्रसीद विशुद्ध सुसिद्ध-समूह ||
अर्थ–दोष–आवरण तथा खेदरहित! हे अशरीरी! हे निरंतर! समय के अन्तररहित! सुखरूपी अमृत के पात्र! हे सम्यग्दर्शन या केवलदर्शन से शोभायमान हे संसार के स्वामी! हे मोहरहित परम पवित्रता युक्त सिद्धों के समूह! (हम पर) प्रसन्नता धारण कीजिए।६।
नरामर-वंदित निर्मल-भाव, अनंत मुनीश्वर पूज्य विहाव |
सदोदय विश्व महेश विमोह, प्रसीद विशुद्ध सुसिद्ध-समूह ||
अर्थ– हे मनुष्य और देवों से पूजनीय! हे समस्त दोषो से मुक्त होने के कारण निर्मल भाववाले हे अनंत मुनीश्वरों से पूज्य! हे विकाररहित! हे सर्वदा उदयस्वरूप! हे समस्त संसार के महास्वामिन्! हे विमोह! हे परमपवित्र सिद्धों के समूह! (हम पर) प्रसन्नता धारण कीजिए।७।
विदंभ वितृण विदोष विनिद्र, परापर-शंकर सार वितंद्र |
विकोप विरूप विशंक विमोह, प्रसीद विशुद्ध सुसिद्ध-समूह ||
अर्थ– हे घमंडरहित! हे तृष्णारहित! द्वेषादिक दोषरहित! हे निद्रारहित! हे स्व तथा पर की महा–अशांति के कारक अधर्म का नाश कर धर्मरूपी शांति को करनेवाले! हे आलस्यरहित! हे कोपरहित! हे रूपरहित! हे शंकारहित! हे मोहरहित विशुद्ध–सिद्धों के समूह! (हम पर) प्रसन्न होइये।८।
जरा-मरणोज्झित-वीत-विहार, विचिंतित निर्मल निरहंकार |
अचिन्त्य-चरित्र विदर्प विमोह, प्रसीद विशुद्ध सुसिद्ध-समूह ||
अर्थ– हे वृद्धावस्था तथा मरणदशा को पार करनेवाले! हे गमनरहित! चिन्तारहित! हे अज्ञानादिक आत्मीय मैल से रहित! हे अहंकाररहित! अचिंत्य चारित्र के धारक! हे दर्परहित! हे मोहरहित! परम पवित्र सिद्धों के संघ! (हम पर) प्रसन्नता धारण कीजिए।९।
विवर्ण विगंध विमान विलोभ, विमाय विकाय विशब्द विशोभ |
अनाकुल केवल सर्व विमोह, प्रसीद विशुद्ध सुसिद्ध-समूह ||
अर्थ– हे श्वेत–पीतादिक वर्णरहित! हे गंधरहित! हे छोटे–बड़े हल्के–भारी आदि परिमान से रहित! हे लोभरहित! हे मायारहित! हे शरीररहित! हे शब्दरहित! हे कृत्रिम शोभारहित! हे आकुलतारहित! सबका हित करनेवाले! मोहरहित परम पवित्र सिद्धों के समूह! (हम पर) प्रसन्नता धारण कीजिए।१०।
(घत्ता मालिनी छन्द)
असम – समयसारं चारु – चैतन्य – चिह्नम् |
पर – परणति – मुक्तं पद्मनंदीन्द्र – वन्द्यम् ||
निखिल – गुण – निकेतं सिद्ध-चक्रं विशुद्धम् |
स्मरति नमति यो वा स्तौति सोऽभ्येति मुक्तिम् ||
ॐ ह्रीं श्री सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने जयमाला पूर्णार्घ्यम निर्वपामीति स्वाहा ।
अर्थ– इसप्रकार जो मनुष्य असम (असाधारण) अर्थात् संसारी आत्माओं से भिन्न, समयसार–स्वरूप, सुन्दर निर्मल–चेतना जिनका चिह्न है, जड़– द्रव्य के परिणमन से रहित तथा पद्मनंदि देव मुनि द्वारा वंदनीय एवं समस्त गुणों के घर–रूप सिद्धमंडल को जो स्मरण करता है, नमस्कार करता है तथा उनका स्तवन करता है, वह मोक्ष को पा लेता है।
(अडिल्ल छन्द)
अविनाशी अविकार परम-रस-धाम हो |
समाधान सर्वज्ञ सहज अभिराम हो ||
शुद्ध बुद्ध अविरुद्ध अनादि अनंत हो |
जगत-शिरोमणि सिद्ध सदा जयवंत हो ||१||
अर्थ– हे भगवान्! आप अविनाशी, अविकार, अनुपम सुख के स्थान, मोक्ष स्थान में रहनेवाले, सर्वज्ञ तथा स्वाभाविक गुणों में रमण करनेवाले हो और निर्मल ज्ञानधारी आत्मिक गुणों के अनुकूल तथा अनादि और अनंत हो। हे संसार के शिरोमणि सिद्ध भगवान्! आपकी सदा जय होवे।
ध्यान अग्निकर कर्म-कलंक सबै दहे |
नित्य निरंजन देव स्वरूपी ह्वै रहे ||
ज्ञायक ज्ञेयाकार ममत्व-निवार के |
सो परमातम सिद्ध नमूँ सिर नायके ||२||
अर्थ–जिन्होंने शुक्लध्यानरूपी अग्नि से समस्त कर्मरूपी कलंक को जला दिया, जो नित्य निर्दोष देवरूप हो गये, जानने योग्य व जाननेवाले का भेद मिटाकर उन सिद्ध–परमात्मा को सिर झुकाकर नमन करता हूँ।
(दोहा)
अविचल ज्ञान-प्रकाशतैं, गुण-अनंत की खान |
ध्यान धरे सो पाइए, परम सिद्ध-भगवान् ||३||
अर्थ– जो निश्चल केवलज्ञान से प्रकाशमान है, अनंत गुणों के खान स्वरूप है, ऐसे पूज्यनीय सिद्ध भगवान् को केवल ध्यान द्वारा ही पा सकते हैं।
अविनाशी आनंदमय, गुणपूरण भगवान् |
शक्ति हिये परमात्मा, सकल पदारथ जान ||४||
अर्थ– समस्त पदार्थों को जानने के लिये अविनाशी, आनंदस्वरूप, गुणों से परिपूर्ण परमात्मा की शक्ति हृदय में धारण करो।
।।इत्याशीर्वाद: पुष्पांजलिं क्षिपामि।।
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