चैत्य-चैत्यालय निर्माण : वास्तु-विचार
पं. गुलाबचंद्र ‘पुष्प’ एवं ब्र. जय निशांत जैनदर्शन के अनुसार लोक-रचना अनादि-अनिधन है। इसका कोर्इ आदि अंत नहीं है, स्वयंसिद्ध अर्थात् अकृत्रिम है, जिसमें ९५% रचना शाश्वत (अपरिवर्तनशील) है। अधोलोक एवं ऊर्ध्वलोक की रचना में...
जैनदर्शन के अनुसार लोक-रचना अनादि-अनिधन है। इसका कोर्इ आदि अंत नहीं है, स्वयंसिद्ध अर्थात् अकृत्रिम है, जिसमें ९५% रचना शाश्वत (अपरिवर्तनशील) है। अधोलोक एवं ऊर्ध्वलोक की रचना में कोर्इ परिवर्तन नहीं होता। मध्यलोक में भी केवल जम्बू, धातकी एवं पुष्करार्ध द्वीपों के आर्यखंडों में ही काल-चक्र का विशेष परिणमन होता है, शेष-खंडों में नहीं |
प्रकृति के नियम भी शाश्वत हैं। आधुनिक विज्ञान का विकास भी प्रकृति के नियमनुसार ही हुआ है, जैसे पहिये का घूमना, चक्की का चलना, विद्युत उपकरणों की गति, घड़ी की गति आदि। जब भी विज्ञान ने प्रकृति के विरुद्ध कार्य किया, हानि उठानी पड़ी तथा विनाश का कारण बना, चाहे वह पर्यावरण पारिस्थितिक, जैविक, रासायनिक या भौतिक कोर्इ भी कार्य हो |
प्रकृति ने स्वयंसिद्ध होने के साथ-साथ मानव-शरीर के निर्माण को भी निश्चित-आकार एवं स्थान दिया है। आचार्य श्री वीरसेन स्वामी ने ‘धवला’-टीका में स्पष्ट उल्लेख किया है। नारकी ८ ताल, देव १० ताल, मनुष्य ९ ताल, एवं तिर्यंच विभिन्न-ताल वाले होते हैं। इसीप्रकार वास्तु अर्थात् निर्माण-व्यवस्था भी अनादि-अनिधन है। जैनदर्शन ने नव-देवताओं को आराध्य/पूज्य माना है, जिनमें चैत्य व चैत्यालय भी हैं। अकृत्रिम-चैत्यालयों एवं प्रतिमाओं की दिशा एवं माप-अनुपात निश्चित हैं। अकृत्रिम-चैत्यालय पूर्व एवं उत्तराभिमुख हैं, प्रतिमायें गर्भगृह में स्थापित हैं। शिखर-युक्त जिनालयों में मुख्यद्वार एवं लघुद्वार हैं, प्रतिमा की दृष्टि द्वार से बाहर निकलती है। प्रतिमाएँ समचतुरस्र-संस्थान-युक्त हैं। प्रतिष्ठा-शास्त्रों एवं वास्तु-शास्त्रों में मंदिर एवं प्रतिमा के माप का विस्तृत उल्लेख है। उसी अनुसार यदि कृत्रिम-जिनालयों की रचना की जावे, तो वह लौकिक एवं पारलौकिक विकास में सहयोगी होती है। वर्तमान में इसमें कर्इ विसंगतियाँ सामने आ रही हैं। विपरीत-निर्माण से प्रतिष्ठाकारक, प्रतिष्ठास्थल एवं समाज पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है। आचार्यों ने वास्तुग्रंथों के उल्लंघन न करने का भी स्पष्ट कथन किया है |
वर्तमान में नगरीय विकास के कारण जगह-जगह पर मंदिरों के निर्माण हो रहे हैं। मंदिर-हेतु भूखंड का चुनाव करते समय प्रवेश की दिशा का ध्यान अवश्य रखें। भूमिशोधन करके मंदिर-निर्माण करने के पूर्व प्रतिष्ठाचार्य एवं वास्तुशास्त्री से परामर्श अवश्य लें। मंदिर-निर्माण में निम्न सावधानियाँ अवश्य रखी जावें:-
१. मंदिर के परिसर में मंदिर जी के नींव क्षेत्र के साथ अन्य निवास एवं प्रसाधन (बाथरूम) आदि का निर्माण न करें। यदि इसका निर्माण करना ही पड़े, तो मंदिर भवन से हटकर अलग भूमिपर करें |
२. वेदी का निर्माण गर्भगृह में ही करें। गर्भगृह ठीक चौकोर बनायें |
३. गर्भगृह के बाहर की दोनों ओर बराबर-स्थान छोड़ें | वेदी ठोस एवं परिक्रमा-स्थान छोड़कर ही बनायें | दीवार से सटी वेदी बनाना अशुभ है। वेदी के ठीक ऊपर बीम या गार्डर नहीं होना चाहिए |
४. वेदी की ऊँचार्इ ३ फुट रखें तथा वेदी पर एक या तीन कटनी ही बनायें, दो नहीं |
५. वेदी में प्रतिमाएँ विषम-संख्या में ही विराजमान करें |
६. एक ही तल पर दो वेदियों का निर्माण न करें |
७. वेदी के पीछे खिड़की, झरोखा, अलमारी, द्वार कदापि न बनायें |
८. प्रतिमा जी को क्रय करने से पूर्व प्रतिष्ठाचार्य को अवश्य दिखायें |
९. मूलनायक-प्रतिमा, प्रतिष्ठाकारक, नगर एवं तीर्थंकर की राशि का मिलान करके ही निश्चित करें |
१०. मंदिर के मुख्य-द्वार के सामने खंभा, कुआँ, पेड़ न हो तथा वेदी के द्वार के सामने स्तंभ नहीं होना चाहिए |
११. मंदिर के निर्माण में पूर्व एवं उत्तर-खाली हो तथा दक्षिण-पश्चिम भारी रखना चाहिए |