पठन सामग्री

ग्यारह-प्रतिमा-व्रत क्रम

श्रावक की भूमिका में मोक्षमार्ग के अनुरूप आचरण करने के लिए ग्यारह प्रतिमा व्रतों का पालन करते हुए धर्म साधना करते है :- प्रथम: दर्शन प्रतिमा: धारक सातों व्यसन अतिचार सहित त्याग कर, आठों मूलगुण अतिचार रहित ग्रहण करता है |...

जैन ज्ञान MixedDevanagari

मूल पाठ

अक्षर आकार ऊपर से बदलें

श्रावक की भूमिका में मोक्षमार्ग के अनुरूप आचरण करने के लिए ग्यारह प्रतिमा व्रतों का पालन करते हुए धर्म साधना करते है :-
प्रथम: दर्शन प्रतिमा: धारक सातों व्यसन अतिचार सहित त्याग कर, आठों मूलगुण अतिचार रहित ग्रहण करता है |
दूसरी: व्रत प्रतिमा: धारक पाँच अणुव्रत,तीन गुणव्रत, चार शिक्षाव्रत इन बारह व्रतों को ग्रहण करता है|
तीसरी: सामायिक व्रत प्रतिमा: धारक प्रात:, मध्याह्न व संध्याकाल में सामायिक करता है |
चौथी: प्रोषध व्रत प्रतिमा: धारक अष्टमी, चतुर्दशी, व पर्वों के दिनों में आरंभ छोड़कर धर्म-स्थान में रहता है |
पाँचवीं: सचित्त-त्याग व्रत प्रतिमा: धारक सचित्त वस्तुओं के भोग-उपभोग का त्याग करता है |
छठी: रात्रिभुक्तित्याग व्रत प्रतिमा: धारक रात्रि भोजन और दिन में कुशील छोड़ता है |
सातवीं: ब्रहमचर्य व्रत प्रतिमा: धारक रात्रि और दिन में मैथुन-सेवन का त्याग करता है |
आठवीं: आरंभत्याग व्रत प्रतिमा: धारक आरंभ तजता है, अर्थात हिंसा-मय क्रियाओं का त्याग करता है|
नवमीं: परिग्रहत्याग व्रत प्रतिमा: धारक चौबीसों परिग्रहों का त्याग करता है |
दशवीं: अनुमतित्याग व्रत प्रतिमा: धारक पाप-कार्य के उपदेश व अनुमोदना का त्याग करता है |
ग्यारहवीं: उदि्दष्टत्याग व्रत प्रतिमा: धारक केवल ‘अपने लिए बनाए गए’ भोजनादि का त्याग करता है|
इन ग्यारह प्रतिमाओं के पश्चात बारहवीं प्रतिमा मुनिराज की होती है | मुनिराज पूर्ण रत्नत्रय का पालन करते हुए साक्षात् नर से नारायण बनकर हमेशा-हमेशा के लिए मोक्ष सुख,परमानन्द के साथ आत्मगुणों से पूर्ण हो जाते हैं |

आगे पढ़ें