जैन ज्ञान · Mixed · Devanagari

जैन-धर्म-दर्शन की सामान्य प्रवृतियाँ

विश्व के धर्मों में ‘जैनधर्म’ प्राचीनतम धर्म है | भारत में श्रमण विचारधारा का प्रतिनिधित्व केवल जैन-विचार तथा आचार पद्धति करती रही है| प्रस्तुत हैं जैन धर्म और दर्शन की कतिपय सामान्य प्रवृतियाँ- मनुष्य एक चिन्तनशील प्राण...

विश्व के धर्मों में ‘जैनधर्म’ प्राचीनतम धर्म है | भारत में श्रमण विचारधारा का प्रतिनिधित्व केवल जैन-विचार तथा आचार पद्धति करती रही है| प्रस्तुत हैं जैन धर्म और दर्शन की कतिपय सामान्य प्रवृतियाँ-
मनुष्य एक चिन्तनशील प्राणी है | आदिमकाल से ही वह अपनी सहज जिज्ञासा प्रवृति के कारण विश्व के रहस्य को समझने का प्रयत्न करता आ रहा है | इन रहस्यों को सुलझाने के लिए वह एक अलौकिक, नित्य एवं पूर्ण दिव्य सर्वशक्तिमान सत्ता पर विश्वास भी करता है, इसी सत्ता को वह ईश्वर नाम से पुकारता है | ईश्वर क्या है? ईश्वर का स्वरूप और गुण क्या है? इस पर सतत चिन्तन होता रहा है | धार्मिक व्यक्तियों के लिए तो ईश्वर स्वयं-सिद्ध सत्ता है |
जैन-दर्शन में अन्य दर्शनों की अपेक्षा ईश्वर का स्वरूप कुछ विलक्षण है | यहाँ किसी पुरुष विशेष का नाम ईश्वर नहीं, वरन् जैन दर्शन की दृष्टि से अरिहंत (अर्हन्त, अरुहन्त) और सिद्ध अवस्था को प्राप्त प्रत्येक जीव ‘ईश्वर’ कहलाता है |
जैन दर्शन में ईश्वर एक नहीं वरन् अनन्त ईश्वर हैं | संचित कर्मों को नाश करके अभी तक जितने जीव मुक्त हो चुके हैं ओर जो आगे भी मुक्त होंगे वे सब ईश्वर पद के वाच्य हैं | ज्ञानावरणादि चार घातिया कर्मों का क्षय करके यह जीव अरिहन्त बन जाता है, इसे सर्वज्ञ, जिन, जीवनमुक्त और केवली भी कहते हैं |
अरिहन्त: अरि अर्थात् शत्रु, एवं उसके हनन अथवा नाश करने वाले को अरिहन्त संज्ञा प्राप्त होती है | आत्मा का परम अरि (शत्रु) आठों कर्मों के राजा मोह को कहा गया है | मोह- कर्म पर विजय पाने वाला जीव अरिहंत कहलाता है।
अर्हन्त : अर्थात अतिशयपूज्य | तीर्थंकर भगवान के गर्भ, जन्म, दीक्षा, केवलज्ञान एवं निर्वाण इन पांच कल्याणकों के समय देवताओं द्वारा पूजा और प्रभावना की जाती है | इस प्रकार देवताओं, असुरों एवं मानवों द्वारा की जाने वाली पूजा के उत्कृष्टतम पात्र होने के कारण वे अर्हन्त कहे जाते हैं |
अरुहन्त : अरु का अर्थ होता है जन्म | अत: रागद्वेष रूपी शत्रुओं का नाश हो जाने से दग्धबीजवत् जिनका भावी जन्म सन्तति अर्थात् पुनर्जन्म समाप्त हो गया है; अरुहन्त कहते हैं | जैनागम में अर्हन्त, अरिहन्त और अरुहन्त ये तीन पाठान्तर मिलते हैं |
सिद्ध : जिन्होंने सभी सिद्धियां प्राप्त करली है, उन्हें सिद्ध कहते हैं | जो ज्ञानावरणादि समस्त कर्मों से मुक्त होकर ऊर्ध्वगमन स्वभाव से लोक के अग्रभाग सिद्धालय में विराजमान हैं, जिनके आत्मप्रदेश चरमशरीर से कुछ कम अवगाहना वाले पुरुषाकार रूप में अवस्थित हैं, जो लोक व अलोक के मात्र ज्ञाता-दृष्टा हैं, आठ मूलगुणों एवं अनन्त उतरगुणों से शोभित हैं |
आचार्य विद्यानन्द मुनि ने आप्त मीमांसा में लिखा है कि – कोई भी पुरुष ( सदा से) कर्मों से रहित नहीं है क्योंकि बिना किसी उपाय के उसका सिद्ध होना किसी भी प्रकार नहीं बनता है |
जैनधर्म की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि विश्व का प्रत्येक धर्म किसी-न-किसी व्यक्ति
विशेष के नाम जुड़ा है, जैसे- विष्णुजी वैष्णव धर्म, शिवजी शैवधर्म, मुहम्मद इस्लाम धर्म, ईसामसीह इसाई धर्म, बुद्ध बौद्ध धर्म आदि| परन्तु जैन धर्म में व्यक्ति विशेष का नाम नहीं, वरन् जिन्होंने इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर आत्मीय शक्ति को जगाते हुए केवलज्ञान प्राप्त किया और वस्तु तत्व का उपदेश प्राणिमात्र को दिया, उन ही का मार्ग ‘जैनधर्म’ कहलाया |
जैनागम के अनुसार जैनधर्म अनादि है, फिर भी इस युग की अपेक्षा जैन तीर्थ (धर्म) के प्रवर्तक भगवान ऋषभदेव हैं | चौबीस तीर्थंकरों में ऋषभदेव प्रथम तीर्थंकर हैं | कतिपय मनीषियों का कहना है कि भगवान महावीर जैन धर्म के संस्थापक हैं; उनकी यह भ्रामक धारणा है |
मानव जीवन के लिए धर्म और दर्शन आवश्यक ही नहीं अपितु अनिवार्य है | जब मानव चिंतन-सागर में निमग्न होता है तब दर्शन की, और जब उस चिंतन को अपने जीवन में उपयोग करता है तब धर्म की उत्पति होती है | मानव जीवन की विभिन्न समस्याओं के समाधान हेतु धर्म और दर्शन का जन्म हुआ | धर्म और दर्शन परस्पर सापेक्ष हैं, एक दुसरे के पूरक हैं | चिंतकों ने धर्म में भावना, बुद्धि और क्रिया ये तीन तत्व माने हैं | भावना से श्रद्धा, बुद्धि से ज्ञान और क्रिया से आचार अपेक्षित है | जैन दर्शन में इसी को सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यकचारित्र कहा जाता है |
जैनदर्शन ने कर्म को केवल क्रिया रूप नहीं माना बल्कि उसे द्रव्य रूप स्वीकार किया है | आचार की भूमिका पर कर्मवाद की उत्पति हुई है | कर्मवाद का अर्थ है- कार्यकारणवाद | प्रत्येक कार्य का कोई-न-कोई कारण होता है और प्रत्येक कारण किसी-न-किसी कार्य को उत्पन्न करता है | कार्य और कारण का यह पारस्परिक संबंध ही विश्व की विविधता और विचित्रता का आधार है | इस प्रकार वर्तमान का निर्माण भूत के आधार पर और भविष्य निर्माण वर्तमान के आधार पर होता है |
अहिंसा का सूक्ष्म विशलेषण प्राणी मात्र पर करुणा दृष्टि रखना, यह भारतीय दर्शन की महत्वपूर्ण विशेषता है | अनेकान्त सिद्धांत एवं स्याद्वाद शैली के माध्यम से विविधता में एकता को प्रतिपादित करने वाले जैन दर्शन का लक्ष्य है कि प्राणियों के आचार में अहिंसा, विचारों में अनेकान्त, वाणी में स्याद्वाद, समाज में अपरिग्रहवाद की भावना उद्भूत हो |
जैन दर्शन के अनुसार जीव अपनी नियति का निर्माता स्वयं है | स्वयं के कर्मों के कारण वह बंधन में पड़ता है और स्वय के प्रयत्नों से ही उन से मुक्ति प्राप्त करता है | जीव जिस शरीर में निवास करता है उसका सह-विस्तारी बन जाता है, ठीक वैसे ही जैसे कि दीपक का प्रकाश जिस कमरे में रखा है वह उसका सहविस्तारी बन जाता है | स्वभाव से जीव में अनन्तचतुष्टय (अनन्तज्ञान, अनन्त दर्शन, अनन्त सुख और अनन्त वीर्य) निहित है | प्रश्न स्वभावत: उत्पन्न होता है कि यदि जीव स्वभाव से शुद्ध अनन्त चतुष्टय का स्वामी है तब वह बंधन में कैसे पड़ता है ?
मिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञान और मिथ्याचारित्र ये तीन जीव के बंधन में कारण हैं | तीर्थंकरों और उनके बताए गए तत्वों में श्रद्धा न रखना ही मिथ्यादर्शन है | तत्वों के यथार्थ स्वरूप का ज्ञान न होना मिथ्याज्ञान है | राग-द्वेष से युक्त लिप्त भाव से कार्य करना मिथ्याचारित्र है | कर्म केवल मानसिक और शारीरिक क्रियाएं नहीं हैं, वे वस्तुगत सत्ताएं हैं | जीव की प्रत्येक मानसिक एवं शारीरिक क्रिया के साथ ऐसी क्रिया कितनी भी सूक्ष्म क्यों न हो, जीव में परिवर्तन होता है |
स्याद्वाद समन्वयवाद का मार्ग प्रस्तुत करता है| यह नित्य व्यवहार की वस्तु है| इसके बिना लोक व्यवहार चल नहीं सकता | जितना भी व्यवहार होता है वह सब आपेक्षिक होता है | अनेक विरोधी तत्वों का यथार्थ निरूपण होने पर सब अपने-अपने दृष्टिकोणों के साथ अन्य दृष्टिकोणों का भी समन्वय करें यही स्याद्वाद है |
स्याद्वाद जैन धर्म का वह अभेद्य किला है| उसके अंदर वादी-प्रतिवादियों के मायामयी गोले प्रवेश नहीं कर सकते | स्याद्वाद जैनदर्शन व जैन-तत्व-ज्ञान की नींव है | स्याद्वाद सिद्धांत वैज्ञानिक और युक्ति सम्मत है | कहा भी है-
हठ छोड़ समन्वय अपनाओ, समझो वक्ता का अभिप्राय |
रह सकते कैसे कहो वहां, कलह ईर्ष्या और कषाय ||
ग्यारह-प्रतिमा-व्रत क्रम →

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