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समस्त जैन अर्घ्यावली — महार्घ्य, शांतिपाठ एवं विसर्जन

अनुमति प्राप्त

देव-शास्त्र-गुरु, चौबीस तीर्थंकर, सिद्ध, क्षेत्र, भावना और विशेष अर्घों सहित 50 अनुभागों का एक सुव्यवस्थित, खोजयोग्य पाठ; प्रत्येक अर्घ को अलग से मेरी लाइब्रेरी में सहेजा जा सकता है।

अर्घ्य संग्रह HindiDevanagari
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01. देव-शास्त्र-गुरु का अर्घ्य

जल परम उज्ज्वल गन्ध अक्षत, पुष्प चरु दीपक धरूँ |
वर धूप निर्मल फल विविध, बहु जनम के पातक हरूँ ||
इह भाँति अर्घ चढ़ाय नित भवि, करत शिव पंकति मचूँ |
अरिहंत श्रुत सिद्धांत गुरु निर्ग्रंथ नित पूजा रचूँ ||
वसुविधि अर्घ संजोय के, अति उछाह मन कीन |
जा सों पूजूं परम पद, देव शास्त्र गुरु तीन ||

ॐ ह्रीं श्री देव-शास्त्र-गुरुभ्यो अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

02. विद्यमान बीस तीर्थंकरों का अर्घ्य

जल फल आठों द्रव्य, अरघ कर प्रीति धरी है |
गणधर इन्द्रन हू तैं, थुति पूरी न करी है ||
‘द्यानत’ सेवक जान के (हो) जग तें लेहु निकार |
सीमंधर जिन आदि दे, बीस विदेह-मँझार |
श्री जिनराज हो, भवतारण-तरण जहाज,श्री महाराज हो ||

ॐ ह्रीं श्री विद्यमान-विंशति-तीर्थंकरेभ्यो अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

03. कृत्रिम-अकृत्रिम चैत्यालयों का अर्घ्य

कृत्याकृत्रिम-चारु-चैत्य-निलयान् नित्यं त्रिलोकीगतान् |
वंदे भावन-व्यंतर-द्युतिवरान् स्वर्गामरावासगान् ||
सद्गंधाक्षत-पुष्पदामचरुकै: सद्दीपधूपै: फलै: |
नीराद्यैश्च यजे प्रणम्य शिरसा दुष्कर्मणां शांतये ||

ॐ ह्रीं श्री त्रिलोकसंबंधि कृत्रिमाकृत्रिम-चैत्यालयस्थ-जिनबिम्बेभ्योऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

04. सिद्धपरमेष्ठी का अर्घ्य (संस्कृत)

गन्धाढ्यं सुपयो मधुव्रत-गणै: संगं वरं चन्दनम् |
पुष्पौघं विमलं सदक्षत-चयं रम्यं चरुं दीपकम् ||
धूपं गंधयुतं ददामि विविधं श्रेष्ठं फलं लब्धये |
सिद्धानां युगपत्क्रमाय विमलं सेनोत्तरं वाँछितम् ||

ॐ ह्रीं श्री सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

05. सिद्धपरमेष्ठी का अर्घ्य (भाषा)

जल फल वसु वृंदा अरघ अमंदा, जजत अनंदा के कंदा |
मेटो भवफंदा सब दु:खदंदा, ‘हीराचंदा’ तुम वंदा ||
त्रिभुवन के स्वामी त्रिभुवन नामी, अंतरयामी अभिरामी |
शिवपुर विश्रामी निजनिधि पामी, सिद्ध जजामी शिरनामी ||

ॐ ह्रीं श्रीअनाहतपराक्रमाय सर्वकर्मविनिर्मुक्ताय सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं
निर्वपामीति स्वाहा।

06. समुच्चय-चौबीसी का अर्घ्य

जल फल आठों शुचिसार, ताको अर्घ करूं |
तुमको अरपूं भवतार, भव तरि मोक्ष वरूं ||
चौबीसों श्रीजिनचंद, आनंदकंद सही |
पद जजत हरत भवफंद, पावत मोक्ष मही ||

ॐ ह्रीं श्री वृषभादि-वीरांत-चतुर्विंशति-तीर्थंकरेभ्योऽनर्य् पद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

07. श्री आदिनाथ-जिनेन्द्र

शुचि निर्मल नीरं गंध सुअक्षत, पुष्प चरू ले मन हरषाय |
दीप धूप फल अर्घ सु लेकर, नाचत ताल मृदंग बजाय ||
श्री आदिनाथ के चरण कमल पर, बलि-बलि जाऊँ मन-वच-काय |
हो करुणानिधि भव दु:ख मेटो, या तें मैं पूजूं प्रभु पाय ||

ॐ ह्रीं श्री आदिनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

08. श्री अजितनाथ-जिनेन्द्र

जल फल सब सज्जै बाजत बज्जै, गुन-गन रज्जै मन भज्जै |
तुअ पद जुग मज्जै सज्जन जज्जै, ते भव-भज्जै निज कज्जै ||
श्री अजित-जिनेशं नुतनाकेशं, चक्रधरेशं खग्गेशं |
मनवाँछितदाता त्रिभुवनत्राता, पूजूं ख्याता जग्गेशं ||

ॐ ह्रीं श्री अजितनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

09. श्री संभवनाथ-जिनेन्द्र

जल चंदन तंदुल प्रसून चरु, दीप फल अर्घ किया |
तुमको अरपूं भाव भगतिधर, जै जै जै शिव रमनि पिया ||
संभव जिन के चरन चरचतें, सब आकुलता मिट जावे |
निजि निधि ज्ञान दरश सुख वीरज, निराबाध भविजन पावे ||

ॐ ह्रीं श्री संभवनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

10. श्री अभिनंदननाथ-जिनेन्द्र

अष्ट-द्रव्य संवारि सुन्दर, सुजस गाय रसाल ही |
नचत रचत जजूं चरन जुग, नाय-नाय सुभाल ही ||
कलुष ताप निकंद श्रीअभिनंद, अनुपम चंद हैं |
पद वंद वृंद जजे प्रभू, भव-दंद फंद निकंद हैं ||

ॐ ह्रीं श्री अभिनंदनजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

11. श्री सुमतिनाथ-जिनेन्द्र

जल चंदन तंदुल प्रसून चरु, दीप धूप फल सकल मिलाय |
नाचि राचि शिरनाय समर्चूं, जय-जय जय-जय जय जिनराय ||
हरि-हर वंदित पाप-निकंदित, सुमतिनाथ त्रिभुवन के राय |
तुम पद पद्म सद्म-शिवदायक, जजत मुदितमन उदित सुभाय ||

ॐ ह्रीं श्री सुमतिनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

12. श्री पद्मप्रभ-जिनेन्द्र

जल-फल आदि मिलाय गाय गुन, भगति-भाव उमगाय |
जजूं तुमहिं शिवतिय वर जिनवर, आवागमन मिटाय |
पूजूं भाव सों, श्रीपदमनाथ-पद सार, पूजूं भाव सों |

ॐ ह्रीं श्री पद्मप्रभजिनेन्द्राय अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

13. श्री सुपार्श्वनाथ जिनेन्द्र

आठों दरब साजि गुनगाय, नाचत राचत भगति बढ़ाय ||
दयानिधि हो, जय जगबंधु दयानिधि हो ||
तुम पद पूजूं मन-वच-काय, देव सुपारस शिवपुर राय |
दयानिधि हो, जय जगबंधु दयानिधि हो ||

ॐ ह्रीं श्री सुपार्श्वनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

14. श्री चंद्रप्रभ-जिनेन्द्र

सजि आठों द्रव्य पुनीत, आठों अंग नमूं |
पूजूं अष्टम जिन मीत, अष्टम अवनि गमूँ ||
श्री चंद्रनाथ दुतिचंद, चरनन चंद लसें |
मन-वच-तन जजत अमंद, आतम जोति जसे ||

ॐ ह्रीं श्री चंद्रप्रभस्वामिने अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

15. श्री पुष्पदंत-जिनेन्द्र

जल फल सकल मिलाय मनोहर, मन-वच-तन हुलसाय ||
तुम-पद पूजूं प्रीति लायके, जय जय त्रिभुवनराय ||
मेरी अरज सुनीजे, पुष्पदंत जिनराय, मेरी अरज सुनीजे ||

ॐ ह्रीं श्री पुष्पदन्त-जिनेन्द्राय अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

16. श्री शीतलनाथ-जिनेन्द्र

शुभ श्रीफलादि वसु प्रासुक द्रव्य साजे |
नाचे रचे मचत बज्जत सज्ज बाजे ||
रागादि-दोष मल मर्द्न हेतु येवा,
चर्चूं पदाब्ज तव शीतलनाथ देवा |

ॐ ह्रीं श्री शीतलनाथ-जिनेन्द्राय अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

17. श्री श्रेयांसनाथ-जिनेन्द्र

जल मलय तंदुल सुमन चरु अरु दीप धूप फलावली |
करि अरघ चरचूं चरन जुग प्रभु मोहि तार उतावली ||
श्रेयांसनाथ जिनंद त्रिभुवन वंद आनंदकंद हैं |
दु:खदंद-फंद निकंद पूरनचंद जोति-अमंद हैं ||

ॐ ह्रीं श्री श्रेयांसनाथ-जिनेन्द्राय अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

18. श्री वासुपूज्य-जिनेन्द्र

जल-फल दरब मिलाय गाय गुन, आठों अंग नमार्इ |
शिव पदराज हेत हे श्रीपति! निकट धरूं यह लार्इ ||
वासुपूज्य वसुपूज-तनुज-पद, वासव सेवत आर्इ |
बाल-ब्रह्मचारी लखि जिनको, शिव-तिय सनमुख धार्इ ||

ॐ ह्रीं श्री वासुपूज्य-जिनेन्द्राय अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

19. श्री विमलनाथ-जिनेन्द्र

आठों दरब संवार, मन-सुखदायक पावने |
जजूं अरघ भर-थार, विमल विमल शिवतिय रमण ||

ॐ ह्रीं श्री विमलनाथ-जिनेन्द्राय अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

20. श्री अनंतनाथ-जिनेन्द्र

शुचि नीर चंदन शालिशंदन, सुमन चरु दीवा धरूं |
अरु धूप फल जुत अरघ करि, कर-जोर-जुग विनति करूं |
जग-पूज परम-पुनीत मीत, अनंत संत सुहावनो |
शिव कंत वंत मंहत ध्याऊँ, भ्रंत वंत नशावनो ||

ॐ ह्रीं श्री अनंतनाथ-जिनेन्द्राय अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

21. श्री धर्मनाथ-जिनेन्द्र

आठों दरब साज शुचि चितहर, हरषि हरषि गुनगार्इ |
बाजत दृम-दृम दृम मृदंग गत, नाचत ता-थेर्इ थार्इ ||
परमधरम-शम-रमन धरम-जिन, अशरन शरन निहारी |
पूजूं पाय गाय गुन सुन्दर, नाचूं दे दे तारी |

ॐ ह्रीं श्री धर्मनाथ-जिनेन्द्राय अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा |

22. श्री शांतिनाथ-जिनेन्द्र

जल फलादि वसु द्रव्य संवारे, अर्घ चढ़ाये मंगल गाय |
‘बखत-रतन’ के तुम ही साहिब, दीज्यो शिवपुर राज कराय ||
शांतिनाथ पंचम चक्रेश्वर, द्वादश मदन तनो पद पाय |
तिन के चरण कमल के पूजे, रोग शोक दु:ख दारिद जाय ||

ॐ ह्रीं श्री शांतिनाथ-जिनेन्द्राय अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

23. श्री कुंथुनाथ-जिनेन्द्र

जल चंदन तंदुल प्रसून चरु, दीप धूप लेरी |
फल-जुत जजन करूं मन-सुख धरि, हरो जगत् फेरी ||
कुंथु सुन अरज दास केरी, नाथ सुन अरज दास-केरी |
भव-सिन्धु पर्यो हो नाथ, निकारो बाँह-पकर मेरी ||

ॐ ह्रीं श्री कुंथुनाथ-जिनेन्द्राय अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

24. श्री अरहनाथ-जिनेन्द्र

शुचि स्वच्छ पटीरं, गंध-गहीरं, तंदुल-शीरं पुष्प चरुँ |
वर दीपं धूपं, आनंद रूपं, ले फल भूपं अर्घ करूँ |
प्रभु दीनदयालं, अरिकुल कालं, विरद विशालं सुकुमालम् |
हनि मम जंजालं, हे जगपालं, अर-गुनमालं वरभालम् |

ॐ ह्रीं श्री अरहनाथ-जिनेन्द्राय अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

25. श्री मल्लिनाथ-जिनेन्द्र

जल-फल अरघ मिलाय गाय गुन, पूजूं भगति बढ़ार्इ |
शिवपद-राज हेत हे श्रीधर, शरन गही मैं आर्इ |
राग-दोष-मद-मोह हरन को, तुम ही हो वरवीरा |
या तें शरन गही जगपति जी, वेगि हरो भवपीरा |

ॐ ह्रीं श्री मल्लिनाथ-जिनेन्द्राय अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

26. श्री मुनिसुव्रत-जिनेन्द्र

जल गंध आदि मिलाय आठों, दरब अरघ सजूं वरूं |
पूजूं चरन रज भगति जुत, जा तें जगत् सागर तरूं ||
शिव-साथ करत सनाथ सुव्रतनाथ, मुनि गुनमाल हैं |
तसु चरन आनंद भरन तारन, तरन विरद विशाल हैं ||

ॐ ह्रीं श्री मुनिसुव्रत-जिनेन्द्राय अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।।

27. श्री नमिनाथ-जिनेन्द्र

जल-फलादि मिलाय मनोहरं, अरघ धारत ही भवभय हरं।।
जजत हूँ नमि के गुण गाय के, जुग-पदांबुज प्रीति लगाय के।।

ॐ ह्रीं श्री नमिनाथ-जिनेन्द्राय अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

28. श्री नेमिनाथ-जिनेन्द्र

जल-फल आदि साजि शुचि लीने, आठों दरब मिलाय |
अष्टम छिति के राज करन को, जजूं अंग-वसु नाय ||
दाता मोक्ष के, श्री नेमिनाथ जिनराय, दाता मोक्ष के ||

ॐ ह्रीं श्री नेमिनाथ-जिनेन्द्राय अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

29. श्री पार्श्वनाथ-जिनेन्द्र

नीर गन्ध अक्षतान् पुष्प चारु लीजिये |
दीप धूप श्रीफलादि अर्घ तें जजीजिये ||
पार्श्वनाथ देव सेव आपकी करूँ सदा |
दीजिये निवास मोक्ष भूलिये नहीं कदा ||

ॐ ह्रीं श्री पार्श्वनाथ-जिनेन्द्राय अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

30. श्री महावीर-जिनेन्द्र

जल फल वसु सजि हिम थार, तन मन मोद धरूं |
गुण गाऊँ भव दधितार, पूजत पाप हरूं ||
श्री वीर महा-अतिवीर, सन्मति नायक हो |
जय वर्द्धमान गुणधीर, सन्मति दायक हो ||

ॐ ह्रीं श्री महावीर-जिनेन्द्राय अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

31. सोलहकारण-भावना का अर्घ्य

जल फल आठों दरब चढ़ाय, ‘द्यानत’ वरत करूं मन लाय |
परमगुरु हो, जय जय नाथ परमगुरु हो ||
दरशविशुद्धि भावना भाय, सोलह तीर्थंकर-पद-दाय |
परमगुरु हो, जय जय नाथ परमगुरु हो ||

ॐ ह्रीं श्री दर्शनविशुद्ध्यादि षोडशकारणेभ्योऽनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

32. पंचमेरु-जिनालयों का अर्घ्य

आठ दरबमय अरघ बनाय, ‘द्यानत’ पूजूं श्रीजिनराय |
महासुख होय, देखे नाथ परमसुख होय ||
पाँचों मेरु असी जिनधाम, सब प्रतिमाजी को करूं प्रणाम |
महासुख होय, देखे नाथ परमसुख होय ||

ॐ ह्रीं श्री सुदर्शन-विजय-अचल-मन्दर-विद्युन्मालि-पंचमेरु-सम्बन्धि अशीति जिन-चैत्यालयस्थ-जिनबिम्बेभ्यो अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

33. नंदीश्वरद्वीप-जिनालयों का अर्घ्य

यह अरघ कियो निज-हेत, तुमको अर्पतु हूँ |
‘द्यानत’ कीज्यो शिव-खेत, भूमि समर्पतु हूँ ||
नंदीश्वर श्रीजिनधाम बावन पूज करूं |
वसु दिन प्रतिमा अभिराम, आनंद भाव धरूं ||
नंदीश्वरद्वीप महान्, चारों दिशि सोहें |
बावन जिनमंदिर जान, सुर-नर मन मोहें ||

ॐ ह्रीं श्रीनंदीश्वरद्वीपे द्विपञ्चाशज्जिनालयस्थ जिनप्रतिमाभ्यो अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

34. दशलक्षण-धर्म-अर्घ्य

आठों दरब सम्हार, ‘द्यानत’ अधिक उछाह सों |
भव-आताप निवार, दस-लच्छन पूजूं सदा ||

ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमादि-दशलक्षणधर्माय अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

35. श्री सम्यक् रत्नत्रय-अर्घ्य

आठ दरब निरधार, उत्तम सों उत्तम लिये |
जनम-रोग निरवार, सम्यक् रत्नत्रय भजूँ ||

ॐ ह्रीं श्री सम्यक् रत्नत्रयाय अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

36. सप्तर्षि-अर्घ्य

जल गंध अक्षत पुष्प चरुवर, दीप धूप सु लावना |
फल ललित आठों द्रव्य-मिश्रित, अर्घ कीजे पावना ||
मन्वादि चारण-ऋद्धि-धारक, मुनिन की पूजा करूँ |
ता किये पातक हरें सारे, सकल आनंद विस्तरूँ ||

ॐ ह्रीं श्री श्रीमन्वादि सप्तर्षिभ्यो अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

37. श्री चौबीस-तीर्थंकर निर्वाणक्षेत्र अर्घ्य

जल गंध अक्षत फूल चरु फल, दीप धूपायन धरूं |
‘द्यानत’ करो निरभय जगत् सों, जोड़ि कर विनती करूं ||
सम्मेदगढ़ गिरनार चंपा, पावापुरि कैलास को |
पूजूं सदा चौबीस जिन, निर्वाणभूमि-निवास को ||

ॐ ह्रीं श्री चतुर्विंशति-तीर्थंकर-निर्वाणक्षेत्रेभ्यो अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

38. पाँच बालयति अर्घ्य

सजि वसु-विधि द्रव्य मनोज्ञ, अरघ बनावत हैं |
वसु-कर्म अनादि-संयोग, ताहि नशावत हैं ||
श्री वासुपूज्य मल्लि नेमि, पारस वीर अती |
नमूँ मन-वच-तन धरि प्रेम, पाँचों बालयती ||

ॐ ह्रीं श्री वासुपूज्य-मल्लिनाथ-नेमिनाथ-पार्श्वनाथ-महावीरस्वामी पंचबालयति-तीर्थंकरेभ्यो अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

39. नव-ग्रह-अरिष्ट-निवारक अर्घ्य

जल गंध सुमन अखंड तंदुल, चरु सुदीप सुधूपकं |
फल आदि प्रासुक द्रव्य मिश्रित, अर्घ देय अनूपकं ||
रवि सोम भूमिज सौम्य गुरु कवि, शनि तमोसुत केतवे |
पूजिये चौबीस जिन, ग्रहारिष्ट-नाशन हेतवे ||

ॐ ह्रीं श्री सर्वग्रहारिष्ट-निवारक-श्रीचतुर्विंशति-तीर्थंकरेभ्य: अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

40. श्री ऋषि-मंडल अर्घ्य

जल-फलादिक द्रव्य लेकर अर्घ सुन्दर कर लिया |
संसार रोग निवार भगवन् वारि तुम पद में दिया ||
जहाँ सुभग ऋषिमंडल विराजे पूजि मन-वच-तन सदा |
तिस मनोवाँछित मिलत सब सुख स्वप्न में दु:ख नहिं कदा ||

ॐ ह्रीं श्री सर्वोपद्रव-विनाशन-समर्थाय, रोग-शोक-सर्वसंकट-हराय सर्वशान्ति-पुष्टि कराय श्रीवृषभादिचौबीस-तीर्थंकर, अष्टवर्ग, अरहंतादि-पंचपद, दर्शन ज्ञान-चारित्र, चतुर्णिकाय-देव, चार प्रकार अवधिधारक-श्रमण, अष्ट-ऋद्धि-युक्त ऋषि, चौबीस देवी, तीन ह्रीं, अर्हंत-बिम्ब, दसदिग्पाल इति यन्त्र-सम्बन्धि-देव-देवी सेविताय परमदेवाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

41. सरस्वती-माता का अर्घ्य

जल चंदन अक्षत, फूल चरू अरु, दीप धूप अति फल लावे |
पूजा को ठानत, जो तुहि जानत, सो नर ‘द्यानत’ सुख पावे ||
तीर्थंकर की धुनि, गणधर ने सुनि, अंग रचे चुनि ज्ञानमर्इ |
सो जिनवर-वानी, शिवसुखदानी, त्रिभुवन-मानी पूज्य भर्इ ||

ॐ ह्रीं श्री जिन-मुखोद्भूत-सरस्वतीदेव्यै अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

42. श्री बाहुबली-स्वामी का अर्घ्य

आठ दरब कर से फैलायो, अर्घ बनाय तुम्हें हि चढ़ायो |
मेरो आवागमन मिटाव, दाता मोक्ष के |
श्री बाहुबली जिनराज दाता मोक्ष के ||

ॐ ह्रीं श्री बाहुबली स्वामिने अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

43. तीस चौबीसी का अर्घ

द्रव्य आठो, जू लीना हैं, अर्घ कर में नवीना हैं।
पुजतां पाप छीना हैं, भानुमल जोड़ किना हैं॥
दीप अढ़ाई सरस राजै, क्षेत्र दस ताँ विषै छाजै।
सातशत बीस जिनराजे, पुजतां पाप सब भाजै॥
ॐ ह्रीं पञ्चभरत-पंचैरावत-सम्बन्धी-दशक्षेत्रान्तर्गत-भूत-भविष्यत्-वर्तमान-सम्बन्धी-तीस-चौबीसी के सात सौ बीस जिनेंद्रेभ्यो-अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा

44. निर्वाण क्षेत्र जी अर्घ

जल गंध अक्षत पुष्प चरु फल, दीप धुपायन धरौ।
धानत करो निरभय जगत सो, जोर कर विनती करौ॥
सम्मेदगढ गिरनार चंपा पावापुर कैलाश को।
पूजो सदा चौबीस जिन, निर्वाण भूमि निवास को॥
ॐ ह्रीं श्री-चतुर्विंशति-तीर्थंकर-निर्वाण-क्षेत्रेभ्यो अर्घ निर्वपामीति स्वाहा

45. श्री सम्मेद शिखर जी अर्घ

जल गंधाक्षत फुल सु नेवज लीजिये।
दीप धुप फल अर्घ सु लेकर चढ़ाइए॥
पूजो शिखर सम्मेद सु मन वच काय जू।
नरकादि दुःख टरै अचल पद पाय जू॥
ॐ ह्रीं श्री-सम्मेद-शिखर-सिद्धक्षेत्र-पर्वते बीस-तीर्थंकर-आदि-असंख्यात-मुनि-मुक्ति-प्राप्ताय अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा

46. सरस्वती (जिनवाणी) जी अर्घ

जलचन्दन अक्षत, फूल चरु, चत, दीप धूप अति फल लावै।
पूजा को ठानत, जो तुम जानत, सो नर द्यानत सुखपावै।।
तीर्थंकर की ध्वनि, गनधर ने सुनि, अंग रचे चुनि ज्ञानमई।
सो जिनवर वानी, शिवसुखदानी, त्रिभुवन मानी पूज्य भई।।
ॐ ह्रीं श्री जिनमुखोद्भव-सरस्वतीदेव्यै अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा

47. आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज का अर्घ

श्री विद्यासागर के चरणों में झुका रहा अपना माथा।
जिनके जीवन की हर चर्यावन पडी स्वयं ही नवगाथा।।
जैनागम का वह सुधा कलश जो बिखराते हैं गली-गली।
जिनके दर्शन को पाकर के खिलती मुरझायी हृदय कली।।
भावो की निर्मल सरिता में, अवगाहन करने आया हू |
मेरा सारा दुःख दर्द हरो, यह अर्घ भेटने लाया हू ||
हे तपो मूर्ति, हे आराधक, हे योगीश्वर, हे महासंत |
हे अरुण कामना देख सके, युग युग तक आगामी बसंत ||
ॐ ह्रीं श्री १०८ आचार्य विद्यासागरमुनीन्द्राय अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा |

48. महार्घ्य

मैं देव श्री अरिहन्त पूजूँ सिद्ध पूजूँ चाव सों |
आचार्य श्री उवझाय पूजूँ साधु पूजूँ भाव सों ||१||
अरिहन्त-भाषित बैन पूजूँ द्वादशांग रचे गनी|
पूजूँ दिगम्बर-गुरुचरण शिव-हेतु सब आशा हनी ||२||
सर्वज्ञ-भाषित धर्म-दशविधि दया-मय पूजूँ सदा |
जजुँ भावना-षोडश रत्नत्रय जा बिना शिव नहिं कदा ||३||
त्रैलौक्य के कृत्रिम-अकृत्रिम चैत्य-चैत्यालय जजूँ |
पनमेरु नंदीश्वर-जिनालय खचर-सुर-पूजित भजूँ ||४||
कैलास श्री सम्मेद श्री गिरनार गिरि पूजूँ सदा |
चम्पापुरी पावापुरी पुनि और तीरथ सर्वदा ||५||
चौबीस श्री जिनराज पूजूँ बीस क्षेत्र विदेह के |
नामावली इक-सहस-वसु जपि होंय पति शिवगेह के ||६||
(दोहा)
जल गंधाक्षत पुष्प चरु, दीप धूप फल लाय |
सर्व पूज्य-पद पूजहूँ, बहुविधि-भक्ति बढ़ाय ||७||
ॐ ह्रीं भावपूजा भाववंदना त्रिकालपूजा त्रिकालवंदना करें करावें भावना भावें श्रीअरिहंतजी सिद्धजी आचार्यजी उपाध्यायजी सर्वसाधुजी पंच-परमेष्ठिभ्यो नम:,प्रथमानुयोग-करणानुयोग-चरणानुयोग-द्रव्यानुयोगेभ्यो नम:, दर्शनविशुद्ध्यादि-षोडशकारणेभ्यो नम:, उत्तमक्षमादि- दशलाक्षणिकधर्माय नम:, सम्यग्दर्शन- सम्यग्ज्ञान-सम्यक्चारित्रेभ्यो नम:,जल के विषै, थल के विषै, आकाश के विषै, गुफा के विषै, पहाड़ के विषै, नगर-नगरी विषै उर्ध्वलोक- मध्यलोक- पाताललोक विषै विराजमान कृत्रिम-अकृत्रिम जिन-चैत्यालय-जिनबिम्बेभ्यो नम:,विदेहक्षेत्रे विहरमान बीस-तीर्थकरेभ्यो नम:, पाँच भरत पाँच ऐरावत दशक्षेत्र-सम्बन्धि तीस चौबीसी के सातसौ बीस जिनराजेभ्यो नम:, नन्दीश्वरद्वीप-सम्बन्धी बावन- जिनचैत्यालयस्थ- जिनबिम्बेभ्यो नम:,पंचमेरुसम्बन्धि-अस्सी-जिनचैत्यालयस्थ जिनबिम्बेभ्यो नम:, सम्मेदशिखर कैलाश चंपापुर पावापुर गिरनार सोनागिर मथुरा तारंगा आदि सिद्धक्षेत्रेभ्यो नम:,जैनबद्री मूडबिद्री देवगढ़ चन्देरी पपौरा हस्तिनापुर अयोध्या राजगृही चमत्कारजी श्रीमहावीरजी पद्मपुरी तिजारा बड़ागांव आदि अतिशयक्षेत्रेभ्यो नम:, श्री चारणऋद्धिधारी सप्तपरमषिऋभ्यो नम:,ओं ह्रीं श्रीमंतं भगवन्तं कृपावन्तं श्रीवृषभादि महावीरपर्यन्तं चतुर्विंशति-तीर्थंकरं-परमदेवं आद्यानां आद्ये जम्बूद्वीपे भरतक्षेत्रे आर्यखंडे उत्तमे नगरे मासानामुत्तमे मासेउत्तमे पक्षे उत्तमे तिथौ उत्तमे वासरे मुनि-आर्यिकानां श्रावक-श्राविकाणां सकल-कर्म क्षयार्थं अनर्घ्यपद-प्राप्तये जलधारा सहित महार्घ्यं सम्पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

49. शांतिपाठ

शांतिनाथ मुख शशि उनहारी, शीलगुणव्रत संयमधारी।
लखन एक सौ आठ विराजे, निरखत नयन कमल दल लाजै।।
पंचम चक्रवर्ती पदधारी, सोलम तीर्थंकर सुखकारी।
इन्द्र नरेन्द्र पूज्य जिननायक, नमो शांतिहित शांति विधायक।।
दिव्य विटप पहुपन की वरषा, दुंदुभि आसन वाणी सरसा।
छत्र चमर भामंडल भारी, ये तुव प्रातिहार्य मनहारी।।
शांति जिनेश शांति सुखदाई, जगत पूज्य पूजों सिरनाई।
परम शांति दीजे हम सबको, पढ़ैं तिन्हे पुनि चार संघ को।।
पूजें जिन्हें मुकुटहार किरीट लाके, इन्द्रादिदेव अरु पूज्यपदाब्ज जाके।
सो शांतिनाथ वर वंश-जगत्प्रदीप, मेरे लिए करहु शांति सदा अनूप।।
(निम्न श्लोक को पढ़कर जल छोड़ना चाहिए)
संपूजकों को प्रतिपालकों को, यतीनकों को यतिनायकों को।
राजा प्रजा राष्ट्र सुदेश को ले, कीजे सुखी हे जिन शांति को दे।।
होवे सारी प्रजा को सुख, बलयुत हो धर्मधारी नरेशा।
होवे वरषा समय पे, तिलभर न रहे व्याधियों का अन्देशा।।
होवे चोरी न जारी, सुसमय वरते, हो न दुष्काल भारीं।
सारे ही देश धारैं, जिनवर वृषको जो सदा सौख्यकारी।।
(निम्न श्लोक को पढ़कर चंदन छोड़ना चाहिए)
घाति कर्म जिन नाश करि, पायो केवलराज।
शांति करो ते जगत में, वृषभादिक जिनराज।।
शास्त्रों का हो पठन सुखदा लाभ सत्संगति का।
सद्‍वृत्तों का सुजस कहके, दोष ढाँकूँ सभी का।।
बोलूँ प्यारे वचन हितके, आपका रूप ध्याऊँ।
तौलौ सेऊँ चरण जिनके, मोक्ष जौ लौं न पाऊँ।।
तब पद मेरे हिय में, मम हिय तेरे पुनीत चरणों में।
तब लौं लीन रहौ प्रभु, जब लौ पाया न मुक्ति पद मैंने।।
अक्षर पद मात्रा से दूषित जो कुछ कहा गया मुझसे।
क्षमा करो प्रभु सो सब करुणा करिपुनि छुड़ाहु भवदुःख से।।
हे जगबन्धु जिनेश्वर, पाऊँ तब चरण शरण बलिहारी।
मरणसमाधि सुदुर्लभ, कर्मों का क्षय सुबोध सुखकारी।
(पुष्पांजलि क्षेपण)
(यहाँ नौ बार णमोकार मंत्र का जाप करें)

50. विसर्जन

बिन जाने वा जान के, रही टूट जो कोय।
तुम प्रसाद तें परम गुरु, सो सब पूरन होय।।
पूजन विधि जानूँ नहीं, नहिं जानूँ आह्वान।
और विसर्जन हूँ नहीं, क्षमा करो भगवान।।
मंत्रहीन धनहीन हूँ, क्रियाहीन जिनदेव।
क्षमा करहु राखहु मुझे, देहु चरण की सेव।।
आये जो जो देवगण, पूजे भक्ति प्रमान|
ते अब जावहु कृपाकर अपने अपने थान||
(निम्न श्लोक को पढ़कर विसर्जन करना चाहिए)
श्री जिनवर की आशिका, लीजे शीश चढ़ाय|
भव-भव के पातक कटे, दुःख दूर हो जाए||
(यहाँ नौ बार णमोकार मंत्र का जाप करें)

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रचनाकार / लेखक
परंपरागत दिगम्बर जैन पूजा-पाठ
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