JainSudha संग्रह

जैन ज्ञान

दिगम्बर जैन परम्परा, तत्त्वज्ञान, आचार और अध्ययन के स्रोत-संदर्भित हिन्दी लेख

31 सामग्री

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समुच्चय महार्घ्य

(गीता छंद) मैं देव श्री अरिहन्त पूजूँ सिद्ध पूजूँ चाव सों | आचार्य श्री उवझाय पूजूँ साधु पूजूँ भाव सों ||१|| अरिहन्त-भाषित बैन पूजूँ द्वादशा...

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शुभ + लाभ

श्री ऋषभदेवाय नम: | श्री महावीराय नम: | श्री गौतम-गणधराय नम: | श्री केवलज्ञान-लक्ष्म्यै नम: | श्री जिन-सरस्वत्यै नम:। शरशभ मतकरतक कषण अमवसयव...

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भूपाल चतुर्विंशतिका (हिन्दी)

कविश्री भूधरदास मूल संस्कृत-काव्य कवि भूपाल की रचना है। इसमें अलंकार की अनुपम-छटा छिटक रही है। भूपाल 11-12वीं शताब्दी के उच्चकोटि के कवि हैं...

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रत्नाकर पंचविंशतिका

श्री रत्नाकर सूरि विरचित स्तोत्र का हिन्दी पद्यानुवाद कविश्री रामचरित उपाध्याय शुभ-केलि के आनंद के धन के मनोहर धाम हो, नरनाथ से सुरनाथ से पू...

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बारह भावना : वंदूँ श्री अरिहंतपद…

कविश्री मंगतराय (दोहा) वंदूँ श्री अरिहंतपद, वीतराग विज्ञान | वरणूँ बारह भावना, जग-जीवन-हित जान ||१|| (विष्णुपद छंद) कहाँ गये चक्री जिन जीता...

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बारह भावना

कविश्री भूधर दासजी (अनित्य भावना) राजा राणा छत्रपति, हाथिन के असवार | मरना सबको एक दिन, अपनी-अपनी बार ||१|| (अशरण भावना) दल-बल देवी-देवता, म...

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मेरी-भावना

कविश्री जुगलकिशोर जिसने राग-द्वेष-कामादिक जीते, सब जग जान लिया | सब जीवों को मोक्षमार्ग का, निस्पृह हो उपदेश दिया || बुद्ध-वीर-जिन-हरि-हर-ब्...

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दु:खहरण-विनती

कविश्री वृन्दावन दास (शैर की लय में तथा और रागिनियों में भी बनती है।) श्रीपति जिनवर करुणायतनं, दु:खहरन तुम्हारा बाना है | मत मेरी बार अबार क...

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आत्म-कीर्तन

कविश्री मनोहरलाल वर्णी ‘सहजानंद’ हूँ स्वतंत्र निश्चल निष्काम, ज्ञाता-दृष्टा आतम-राम | मैं वह हूँ जो हैं भगवान्, जो मैं हूँ वह हैं भगवान् | अ...

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इष्ट-प्रार्थना

भावना दिन-रात मेरी, सब सुखी संसार हो | सत्य-संयम-शील का, व्यवहार हर घर-बार हो || धर्म का परचार हो, अरु देश का उद्धार हो | और ये उजड़ा हुआ, भ...

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आत्म-रमण

कविश्री मनोहरलाल वर्णी ‘सहजानंद’ मैं दर्शन-ज्ञान-स्वरूपी हूँ, मैं सहजानंद-स्वरूपी हूँ | हूँ ज्ञानमात्र परभाव शून्य, हूँ सहज-ज्ञानघन स्वयंपूर...

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शास्त्र-स्वाध्याय विधि

प्रारम्भिक मंगलाचरण ओं नम: सिद्धेभ्य:! ओं जय! जय! जय! नमोऽस्तु ! नमोऽस्तु !! नमोऽस्तु !!! णमो अरिहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आइरियाणं | णमो उव...

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तीर्थराज सम्मेदशिखर वंदना-क्रम

यहाँ से इस अवसर्पिणी-काल में भगवान् आदिनाथ जी, वासुपूज्य जी, नेमिनाथ जी एवं भगवान् महावीर स्वामी को छोड़कर शेष बीस तीर्थंकर मोक्ष पधारे हैं...

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भारतवर्ष के प्रमुख जैन तीर्थ-क्षेत्र

झारखंड प्रांत सम्मेद-शिखर सिद्धक्षेत्र – र्इस्टर्न रेलवे के पारसनाथ स्टेशन से १४ मील (२२ कि.मी.) तथा गिरीडीह स्टेशन से पहाड़ की तलहटी मधुवन...

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रस त्याग विचार

रस-त्याग के अभ्यास से हम अपनी जिव्हा इंद्रिय पर नियंत्रण कर सकते हैं | रविवार को – नमक (खारे पदार्थ) सोमवार को – हरे फल, सब्जियां मंगलवार को...

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चैत्य-चैत्यालय निर्माण : वास्तु-विचार

पं. गुलाबचंद्र ‘पुष्प’ एवं ब्र. जय निशांत जैनदर्शन के अनुसार लोक-रचना अनादि-अनिधन है। इसका कोर्इ आदि अंत नहीं है, स्वयंसिद्ध अर्थात् अकृत्रि...

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ग्यारह-प्रतिमा-व्रत क्रम

श्रावक की भूमिका में मोक्षमार्ग के अनुरूप आचरण करने के लिए ग्यारह प्रतिमा व्रतों का पालन करते हुए धर्म साधना करते है :- प्रथम: दर्शन प्रतिमा...

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जैन-धर्म-दर्शन की सामान्य प्रवृतियाँ

विश्व के धर्मों में ‘जैनधर्म’ प्राचीनतम धर्म है | भारत में श्रमण विचारधारा का प्रतिनिधित्व केवल जैन-विचार तथा आचार पद्धति करती रही है| प्रस्...

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