समुच्चय महार्घ्य
(गीता छंद) मैं देव श्री अरिहन्त पूजूँ सिद्ध पूजूँ चाव सों | आचार्य श्री उवझाय पूजूँ साधु पूजूँ भाव सों ||१|| अरिहन्त-भाष...
जैन ज्ञान, दर्शन और लेख
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(गीता छंद) मैं देव श्री अरिहन्त पूजूँ सिद्ध पूजूँ चाव सों | आचार्य श्री उवझाय पूजूँ साधु पूजूँ भाव सों ||१|| अरिहन्त-भाष...
श्री ऋषभदेवाय नम: | श्री महावीराय नम: | श्री गौतम-गणधराय नम: | श्री केवलज्ञान-लक्ष्म्यै नम: | श्री जिन-सरस्वत्यै नम:। शर...
कविश्री भूधरदास मूल संस्कृत-काव्य कवि भूपाल की रचना है। इसमें अलंकार की अनुपम-छटा छिटक रही है। भूपाल 11-12वीं शताब्दी के...
श्री रत्नाकर सूरि विरचित स्तोत्र का हिन्दी पद्यानुवाद कविश्री रामचरित उपाध्याय शुभ-केलि के आनंद के धन के मनोहर धाम हो, न...
कविश्री मंगतराय (दोहा) वंदूँ श्री अरिहंतपद, वीतराग विज्ञान | वरणूँ बारह भावना, जग-जीवन-हित जान ||१|| (विष्णुपद छंद) कहाँ...
कविश्री भूधर दासजी (अनित्य भावना) राजा राणा छत्रपति, हाथिन के असवार | मरना सबको एक दिन, अपनी-अपनी बार ||१|| (अशरण भावना)...
कविश्री जुगलकिशोर जिसने राग-द्वेष-कामादिक जीते, सब जग जान लिया | सब जीवों को मोक्षमार्ग का, निस्पृह हो उपदेश दिया || बुद...
कविश्री वृन्दावन दास (शैर की लय में तथा और रागिनियों में भी बनती है।) श्रीपति जिनवर करुणायतनं, दु:खहरन तुम्हारा बाना है...
कविश्री मनोहरलाल वर्णी ‘सहजानंद’ हूँ स्वतंत्र निश्चल निष्काम, ज्ञाता-दृष्टा आतम-राम | मैं वह हूँ जो हैं भगवान्, जो मैं ह...
भावना दिन-रात मेरी, सब सुखी संसार हो | सत्य-संयम-शील का, व्यवहार हर घर-बार हो || धर्म का परचार हो, अरु देश का उद्धार हो...
कविश्री मनोहरलाल वर्णी ‘सहजानंद’ मैं दर्शन-ज्ञान-स्वरूपी हूँ, मैं सहजानंद-स्वरूपी हूँ | हूँ ज्ञानमात्र परभाव शून्य, हूँ...
कविश्री मनोहरलाल वर्णी ’सहजानंद’ मेरे शाश्वत-शरण, सत्य-तारणतरण ब्रह्म प्यारे | तेरी भक्ति में क्षण जायें सारे || टेक|| ज...
प्रारम्भिक मंगलाचरण ओं नम: सिद्धेभ्य:! ओं जय! जय! जय! नमोऽस्तु ! नमोऽस्तु !! नमोऽस्तु !!! णमो अरिहंताणं, णमो सिद्धाणं, ण...
यहाँ से इस अवसर्पिणी-काल में भगवान् आदिनाथ जी, वासुपूज्य जी, नेमिनाथ जी एवं भगवान् महावीर स्वामी को छोड़कर शेष बीस तीर्...
झारखंड प्रांत सम्मेद-शिखर सिद्धक्षेत्र – र्इस्टर्न रेलवे के पारसनाथ स्टेशन से १४ मील (२२ कि.मी.) तथा गिरीडीह स्टेशन से प...
श्रावक कौन? जो श्रद्धावान हो, विवेकवान हो और क्रियाशील हो| श्रद्धा हो जिनेन्द्र-देव और जिनागम में, विवेक हो अपने कल्याण...
ओं नम: सिद्धेभ्य: । ओं नम: सिद्धेभ्य: । ओं नम: सिद्धेभ्य: । चिदानन्दैकरूपाय जिनाय परमात्मने । परमात्मप्रकाशाय नित्यं सिद...
रस-त्याग के अभ्यास से हम अपनी जिव्हा इंद्रिय पर नियंत्रण कर सकते हैं | रविवार को – नमक (खारे पदार्थ) सोमवार को – हरे फल...
पं. गुलाबचंद्र ‘पुष्प’ एवं ब्र. जय निशांत जैनदर्शन के अनुसार लोक-रचना अनादि-अनिधन है। इसका कोर्इ आदि अंत नहीं है, स्वयंस...
श्रावक की भूमिका में मोक्षमार्ग के अनुरूप आचरण करने के लिए ग्यारह प्रतिमा व्रतों का पालन करते हुए धर्म साधना करते है :-...
विश्व के धर्मों में ‘जैनधर्म’ प्राचीनतम धर्म है | भारत में श्रमण विचारधारा का प्रतिनिधित्व केवल जैन-विचार तथा आचार पद्ध...