श्री पार्श्वनाथ-जिन पूजा(‘पुष्पेन्दु’)
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“हे पार्श्वनाथ! हे अश्वसेन-सुत! करुणासागर तीर्थंकर”
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“हे पार्श्वनाथ! हे अश्वसेन-सुत! करुणासागर तीर्थंकर”
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“जहाँ चतुरनिकार्इ देव, आवें जिनशासन”
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“अहो! निखरा कांचन चैतन्य, खिले सब आठों कमल पुनीत”
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“तिहि मकरध्वज-नाशक जिन को, पूजें पुष्प चढ़ा के”
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“जमबसवमनआतम-जञन कर, आतम रप नखरह”
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“जहाँ चतुरनिकार्इ देव, आवें जिनशासन”
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“दु:खद सहा उपसर्ग भयानक, सुनकर मानव घबराये”
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“धर लिया स्वयं वामन-सरूप, चल दिये विप्र बनकर अनूप”
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“सोलह-कारण भाय तीर्थंकर जे भये”
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“तीर्थंकरों के न्हवन-जल तें, भये तीरथ शर्मदा”
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“घर तें निकारे तन विदारे, बैर जो न तहाँ धरे”
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“संशय-विभ्रम-मोह-बिन, अष्ट-अंग गुनकार”
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“तीर्थंकर जाको धरे, सम्यक्चारित सार”
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“विद्वानों, योगियों और त्यागी-तपस्वियों के स्वामी आचार्य समंतभद्र सोत्साह मुनि जीवन व्यतीत कर रहे थे, उस समय असाता वेदनीय कर्म के प्रबल उदय से उन्हें ‘भस्मक’ नाम का महारोग हो गया। मुनिचर्या के दौरान इस रोग का शमन होना असंभव जानकर उन्होंने अपने गुरु से सल्लेखना…”
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“ये पाँचों महाव्रत सु खरे हैं, सब तीर्थंकर इनको करे हैं”
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“ॐ ह्रीं श्री चतुर्विंशति-तीर्थंकर-निर्वाणक्षेत्राणि! अत्र अवतर अवतर संवौषट्! (आह्वाननम्)”
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“ॐ ह्रीं श्री पंचबालयति-तीर्थंकरा: अत्र अवतर अवतर संवौषट्! (आह्वाननम्)”
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“पुष्प सुगंध मधुप झंकार, पूजूं सिद्धक्षेत्र मँझार”
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“ॐ ह्रीं श्री वृषभादि चौबीस तीर्थंकर, अष्ट वर्ग, अरिहंतादि पंचपद, दर्शनज्ञानचारित्र रूपरत्नत्रय, चतुर्णिकाय देव, चार प्रकार अवधिधारक श्रमण, अष्ट ऋद्धिधारी ऋषि, चौबीस देव, तीन ह्रीं, अरिहन्त-बिम्ब, दश दिग्पाल इति यंत्रसम्बन्धी परमदेव समूह ! अत्र अवतर अवतर संवौषट…”
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“ॐ ह्रीं श्री सर्वग्रहारिष्ट-निवारक-श्रीचतुर्विंशति-तीर्थंकरेभ्य: जन्म-जरा-मृत्यु- विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।१।”
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“अर्थ– जिन के द्वारा संघ के कल्याणकारक यह ‘उपसर्गहर स्तोत्र’ रचा गया है, वे करुणाकर आचार्य गुरु भद्रबाहु सदा जयवन्त हों ।”
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“त्रैलोक्यगुरु तीर्थंकर-प्रभु को, श्रद्धायुत मैं नमन करूँ”
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“वर धूप बनाकर, अगनि-माँहि धर, दुष्टकर्म तत्काल जला”
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“ध्यानस्थ आप के ऊपर प्रभु, फण मंडप बनकर छाया था”
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“भरि कंचनझारी, धार निकारी, तृषा निवारी हित चंगा”
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“शांतिकरं गणशांतिमभीप्सु:, षोडशतीर्थंकरं प्रणमामि”
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“पुष्प सुगंधित मकरंद मंडित, भाँति भाँति के लाऊँ”
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“स्वच्छ-गुणांबुधि-रत्न नमस्ते, सत्त्व-हितंकर यत्न नमस्ते”
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“ॐ ह्रीं फाल्गुनकृष्ण-एकादश्यां केवलज्ञान-प्राप्ताय श्रीवृषभदेवाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।४।”
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“भव-भाव-निखर्जित शिवपद-सर्जित, आनंदभर्जित दंदल-को”
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