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सिद्ध-पूजा

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“अहो! निखरा कांचन चैतन्य, खिले सब आठों कमल पुनीत”

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स्वयंभूस्तोत्र-भाषा

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“विद्वानों, योगियों और त्यागी-तपस्वियों के स्वामी आचार्य समंतभद्र सोत्साह मुनि जीवन व्यतीत कर रहे थे, उस समय असाता वेदनीय कर्म के प्रबल उदय से उन्हें ‘भस्मक’ नाम का महारोग हो गया। मुनिचर्या के दौरान इस रोग का शमन होना असंभव जानकर उन्होंने अपने गुरु से सल्लेखना…”

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श्री चौबीस तीर्थंकर निर्वाणक्षेत्र पूजा

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“ॐ ह्रीं श्री चतुर्विंशति-तीर्थंकर-निर्वाणक्षेत्राणि! अत्र अवतर अवतर संवौषट्! (आह्वाननम्)”

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श्री ऋषिमंडल पूजा (हिंदी)

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“ॐ ह्रीं श्री वृषभादि चौबीस तीर्थंकर, अष्ट वर्ग, अरिहंतादि पंचपद, दर्शनज्ञानचारित्र रूपरत्नत्रय, चतुर्णिकाय देव, चार प्रकार अवधिधारक श्रमण, अष्ट ऋद्धिधारी ऋषि, चौबीस देव, तीन ह्रीं, अरिहन्त-बिम्ब, दश दिग्पाल इति यंत्रसम्बन्धी परमदेव समूह ! अत्र अवतर अवतर संवौषट…”

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नवग्रह-अरिष्ट-निवारक विधान पूजन

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“ॐ ह्रीं श्री सर्वग्रहारिष्ट-निवारक-श्रीचतुर्विंशति-तीर्थंकरेभ्य: जन्म-जरा-मृत्यु- विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।१।”

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उपसर्ग-हर स्तोत्र

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“अर्थ– जिन के द्वारा संघ के कल्याणकारक यह ‘उपसर्गहर स्तोत्र’ रचा गया है, वे करुणाकर आचार्य गुरु भद्रबाहु सदा जयवन्त हों ।”

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सरस्वती-पूजा

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“भरि कंचनझारी, धार निकारी, तृषा निवारी हित चंगा”

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श्री ऋषभनाथ-जिन पूजा

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“ॐ ह्रीं फाल्गुनकृष्ण-एकादश्यां केवलज्ञान-प्राप्ताय श्रीवृषभदेवाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।४।”

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