विनयपाठ
पूजा प्रारम्भ करते समय नौ बार णमोकार मंत्र पढ़कर, विनय पाठ और मंगल पाठ बोलकर पूजा प्रारम्भ करनी चाहिए | इह विधि ठाड़े होयके, प्रथम पढ़ें यो पा...
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दैनिक पाठ, सामायिक, आलोचना, दर्शन, मंगल और विसर्जन पाठ का संग्रह
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पूजा प्रारम्भ करते समय नौ बार णमोकार मंत्र पढ़कर, विनय पाठ और मंगल पाठ बोलकर पूजा प्रारम्भ करनी चाहिए | इह विधि ठाड़े होयके, प्रथम पढ़ें यो पा...
पढ़ें →मंगल मूर्ति परम पद, पंच धरौं नित ध्यान | हरो अमंगल विश्व का, मंगलमय भगवान |१| मंगल जिनवर पद नमौं, मंगल अरिहन्त देव | मंगलकारी सिद्ध पद, सो व...
पढ़ें →कविश्री बुधजन (दोहा) तुम निरखत मुझको मिली, मेरी सम्पत्ति आज | कहाँ चक्रवर्ति-संपदा, कहाँ स्वर्ग-साम्राज ||१|| तुम वंदत जिनदेवजी, नित-नव मंगल...
पढ़ें →कविश्री रूपचंद (प्रतिदिन अवकाश न हो तो जिस कल्याणक का दिवस हो, उसका पाठ करें।) पणविवि पंच परमगुरु गुरु जिनशासनो | सकल सिद्धिदातार सुविघन विन...
पढ़ें →कवि श्री हरजसराय जय-जय भगवंते सदा, मंगल-मूल महान | वीतराग सर्वज्ञ प्रभु, नमौं जोरि जुग-पान || (ढाल मंगल की, छन्द अडिल्ल और गीता) श्री जिन! ज...
पढ़ें →कवि श्री जुगलकिशोर शास्त्रोक्त-विधि पूजा-महोत्सव सुरपती चक्री करें | हम सारिखे लघु-पुरुष कैसे यथाविधि पूजा करें || धन-क्रिया-ज्ञानरहित न जान...
पढ़ें →कविश्री जुगल किशोर सम्पूर्ण-विधि कर वीनऊँ इस परम पूजन ठाठ में | अज्ञानवश शास्त्रोक्त-विधि तें चूक कीनी पाठ में || सो होहु पूर्ण समस्त विधिव...
पढ़ें →(शांति-पाठ व विसर्जन-पाठ संस्कृत या हिंदी दोनों में से कोई भी एक पढ़ने चाहिए) (शांति-पाठ बोलते समय दोनों हाथों से पुष्प-वृष्टि करते रहें) शा...
पढ़ें →ज्ञानतोऽज्ञानतो वापि शास्त्रोक्तं न कृतं मया | तत्सर्वं पूर्णमेवास्तु त्वत्प्रसादाज्जिनेश्वर ||१|| आह्वाननं नैव जानामि नैव जानामि पूजनम् | व...
पढ़ें →(अर्थ रहित) (अर्थ सहित) (अर्थ रहित) शांतिनाथ ! मुख शशि-उनहारी, शील-गुण-व्रत, संयमधारी | लखन एकसौ-आठ विराजें, निरखत नयन-कमल-दल लाजें ||१|| अर...
पढ़ें →बिन जाने या जान के, रही टूट जो कोय | तुम प्रसाद से परम गुरु, सो सब पूरन होय || पूजन विधि जानूँ नहीं, नहिं जानूँ आह्वान | और विसर्जन भी नहीं...
पढ़ें →(दोहा) परिणामों की स्वच्छता, के निमित्त जिनबिम्ब | इसीलिए मैं निरखता, इनमें निज-प्रतिबिम्ब || पंच-प्रभू के चरण में, वंदन करूँ त्रिकाल | निर्...
पढ़ें →माघनंदि मुनि कृत श्रीमन्नता-मर-शिरस्तट-रत्न-दीप्ति, तोयाव-भासि-चरणाम्बुज-युग्ममीशम् | अर्हन्त-मुन्नत-पद-प्रदमाभिनम्य, त्वन्मूर्तिषूद्य-दभिषे...
पढ़ें →श्री अमितगति-सूरि-विरचित ‘परमात्म-द्वात्रिंशतिका’ का पद्यानुवाद कविश्री रामचरित उपाध्याय नित देव! मेरी आत्मा, धारण करे इस नेम को, मैत्री करे...
पढ़ें →कविश्री जौहरी (दोहा) वंदूं पाँचों परम-गुरु, चौबीसों जिनराज | करूँ शुद्ध आलोचना, शुद्धि-करन के काज ||१|| (सखी छन्द) सुनिये जिन! अरज हमारी, हम...
पढ़ें →कविश्री बुध महाचंद्र प्रथम : प्रतिक्रमण-कर्म काल-अनंत भ्रम्यो जग में सहये दु:ख-भारी | जन्म-मरण नित किये पाप को है अधिकारी || कोटि-भवांतर माँ...
पढ़ें →कविश्री द्यानतराय गौतमस्वामी वंदूं नामी, मरणसमाधि भला है | मैं कब पाऊँ निशदिन ध्याऊँ, गाऊँ वचन-कला है || देव-धर्म-गुरु प्रीति महा दृढ़, सप्...
पढ़ें →कविवर पं. दौलतराम (दोहा) सकल-ज्ञेय-ज्ञायक तदपि, निजानंद-रस-लीन | सो जिनेन्द्र जयवंत नित, अरि-रज-रहस-विहीन || जय वीतराग-विज्ञान पूर, जय मोह...
पढ़ें →ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्हं वं मं हं सं तं पं वंवं मंमं हंहं संसं तंतं पंपं झंझं झ्वीं झ्वीं क्ष्वीं क्ष्वीं द्रां द्रां द्रीं द्रीं द्रावय...
पढ़ें →श्रावक कौन? जो श्रद्धावान हो, विवेकवान हो और क्रियाशील हो| श्रद्धा हो जिनेन्द्र-देव और जिनागम में, विवेक हो अपने कल्याण का, और क्रियाएँ हों...
पढ़ें →ओं नम: सिद्धेभ्य: । ओं नम: सिद्धेभ्य: । ओं नम: सिद्धेभ्य: । चिदानन्दैकरूपाय जिनाय परमात्मने । परमात्मप्रकाशाय नित्यं सिद्धात्मने नम: ।। अर्...
पढ़ें →कविश्री द्यानतराय (स्नान करते समय बोलना चाहिए) मैं देव नित अरहंत चाहूँ, सिद्ध का सुमिरन करौं | सूरि-गुरु-मुनि तीन पद ये, साधुपद हिरदय धरौं |...
पढ़ें →कविश्री द्यानतराय (दोहा) बानी एक नमो सदा, एक दरब आकाश | एक धर्म अधर्म दरब, ‘पड़िवा’ शुद्धि प्रकाश ||१|| (चौपार्इ छन्द) ‘दोज’ दुभेद सिद्ध संस...
पढ़ें →भगवान शांतिनाथ से संबंधित सम्पूर्ण हिन्दी शांति पाठ, स्वच्छ और पंक्तिबद्ध रूप में।
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