श्री पंच-परमेष्ठी पूजा
मिलती हुई पंक्ति
“सम्यक् पूजा-फल पाने को, अब निज स्वभाव में आऊँगा”
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209 परिणाम “पूजा” के लिए
मिलती हुई पंक्ति
“सम्यक् पूजा-फल पाने को, अब निज स्वभाव में आऊँगा”
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“अब हम उनकी पूजा करते, और निज का रूप निहारा है”
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“मंत्री नृप चाँदनगाँव आय, दर्शन करि पूजा विधि बनाय”
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“पूजा करूँ पातक मिटें, वे सुखद समता-भक्ति दें”
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“मैं उनकी पूजा करुँ बनूँ अनुगामी”
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“पूजा करि निज धन्य लख्यो बहु चाव सों”
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“(दस धर्म-अंग पूजा)”
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“मन्वादि चारण-ऋद्धि-धारक, मुनिन की पूजा करूँ”
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“सिद्धभूमि निश-दीस, मन वच तन पूजा करूं”
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“पूजा श्री निर्वाण की, सिद्धक्षेत्र सुखदाय”
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“ऋषिमंडल-पूजा रचूं, बुधि बल द्यो अभिराम”
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“उनने भी यह पूजा, कर आनंद लह्यो”
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“भव्य विघ्न-उपशांति को, ग्रहपूजा चितधार”
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“राहुकेतु मेरवाग्रे या, जिनपूजाविधायक:।।”
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“निज तुष्टि हेतु उनकी पूजा मैं करूँ पूर्णविधि से रुचिधर”
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“इस यंत्र की जे पूजा करंत, सुर नर सुख लह हों मुकतिकंत”
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“मैं अष्टद्रव्य से पूजा का, शुभ अर्घ्य बना कर लाया हूँ”
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“पूजा को ठानत, जो तुम जानत, सो नर ‘द्यानत’ सुखपावे”
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“अर्थ– मुकुट-कुंडल-हार-रत्न आदि को धारण करने वाले इन्द्र आदि देव जिनके चरण-कमलों की पूजा करते हैं, उत्तम-कुल में उत्पन्न, संसार को प्रकाशित करनेवाले ऐसे तीर्थंकर शांतिनाथ मुझे अनुपम-शांति प्रदान करें ।५।”
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“पूजा विसर्जन मैं करूँ, सदा करो कल्याण”
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“होती प्रभात में प्रभु पूजा, सन्ध्या को दीप जले दूजा”
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“सरस्वती की पूजा करने, श्री जिनमंदिर आये हम”
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“महामंत्र की नित्य पूजा रचाऊँ”
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“अथ पौर्वाह्रिक देववंदनायां पूर्वाचार्यानुक्रमेण सकलकर्मक्षयार्थं भावपूजा-”
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“आरती-पूजा-विधान, मानस-उपासना की एक विधि है जो आचार्यों द्वारा समर्थित रही है”
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“भाव-पूजा-वन्दना-स्तव-समेतं श्रीपंचमहागुरुभक्तिपुरस्सरं कायोत्सर्गं करोम्यहम्।”
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“(पूरी पूजा नहीं की हो तो अर्घ्य चढ़ाएं)”
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“जो बाँचें-सरधहें, करें अनुमोदन पूजा।”
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“पद-अखय-दायक मुकति-नायक, जानि पद-पूजा करूं।।”
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“तीर्थकृत्केवलीशान: पूजार्ह: स्नातकोऽमल:”
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