श्री संभवनाथ-जिन पूजा
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“पूजत सुरपद होय अनुक्रम शिव चढ़े”
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“पूजत सुरपद होय अनुक्रम शिव चढ़े”
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“प्रथमदेव अवतारी प्यारे, तीर्थंकर गुणवान की”
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“‘द्यानत’ सेवक जानके (हो), जग तें लेहु निकार”
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“कनक-मणि-नगजड़ित झारी, द्वार धार निकार है”
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“रहे अलिप्त मुकुर जिमि छाया, जजूं चरन जय-जय जिनराया”
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“ॐ ह्रीं फाल्गुनकृष्ण-चतुर्थीदिने मोक्षमंगल-प्राप्ताय श्रीपद्मप्रभजिनेन्द्राय स्वाहा ।५।”
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“प्रासुक सुमन सुगंधित सार, गुंजत अलि मकरध्ववजहार”
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“चतुक-चंड चकचूरि, चारि चिद्चक्र गुनाकर”
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“ॐ ह्रीं फाल्गुनकृष्ण-नवम्यां गर्भमंगल-प्राप्ताय श्रीपुष्पदंतजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।१।”
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“सम्मेद तें शीतलनाथ स्वामी, गुनाकरं तासु पदं नमामी”
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“सद सुमन सुमन-समान पावन, मलय तें मधु झंकरें”
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“मीन-केतु मद-भंजनकारन, तुम पद-पद्म चढ़ार्इ”
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“अनुक्रम तें निरवान, लहे सामग्री पार्इ”
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“जल-संग घस लसि शसि-सम-शमकर, भव-आताप हरीनो।।”
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“हनि अरि-चक्रेशं, हे गुनधेशं, दयाऽमृतेशं मक्रेशं।।”
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“भव-सिन्धु पर्यो हूं नाथ, निकारो बाँह-पकर मेरी ।।”
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“(छप्पय छन्द, वीर रस, रूपकालंकार)”
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“जय-जय जिनस्वामी, त्रिभुवननामी, मल्लि विमल कल्यानकरा ।”
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“ॐ ह्रीं श्रावणकृष्ण-द्वितीयायां गर्भमंगल-मंडिताय श्रीमुनिसुव्रतनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा”
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“ॐ ह्रीं आश्विनकृष्ण-द्वितीयायां गर्भमंगल-प्राप्ताय श्रीनमिनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।१।”
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“दर्प् क मनमथ-भंजनकारन, जजूं चरन लवलाय।।”
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“जय-जयशिव-तिय-वल्लभमहेश,जयब्रह्माशिव-शंकरगनेश।”
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“शंकर: कृतशं लोके शम्भवस्त्वं भवन्सुखे”
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“अग्निज्वाला-समाक्रान्तं मनोमल-विशोधनम्”
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“परिचय : यह सुप्रसिद्ध स्तोत्र है। क्रुद्ध नृपति द्वारा आचार्य मानतुंग को बलपूर्वक पकड़वा कर 48 तालों के अंदर बंद करवा दिया गया था। उस समय धर्म की रक्षा और प्रभावना हेतु आचार्यश्री ने भगवान् आदिनाथ की इस भक्ति-स्तुति की रचना की थी, जिस से 48 ताले स्वयं टूट गये…”
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“तुही जिनेश! शंकरो जगत्त्रयी विधान तें”
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“यदीये चैतन्ये मुकुर इव भावाश्चिदचित:,”
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“अग्नि-जाल झलकंत मुख, धुनिकरत जिमि मत्त वारण”
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“तुम गुनकीर्तन माहिं कौन हम मंद विचारे”
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“इस विषापहार-स्तोत्र में भगवान् ऋषभदेव की स्तुति है। यह स्तुति गंभीर, प्रौढ़ और अनूठी उक्तियों से भरपूर है। यह ग्रन्थ कवि की चतुरार्इ से भरा हुआ है। हृदय-समुद्र को मथकर निकाला हुआ अमृत है। इसमें शब्दों का माधुर्य एवं अर्थों का गांभीर्य देखने को मिलता है। इस काव…”
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