विषापहार स्तोत्र (हिंदी अनुवाद)
मिलती हुई पंक्ति
“…ठ बैठा । इससे धर्म की अपूर्व-प्रभावना हुर्इ। श्रद्धा और मनोयोग-पूर्वक इसके पाठ से सुख-शांति मिलती है और सारे मनोरथ पूर्ण होते हैं।”
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मिलती हुई पंक्ति
“…ठ बैठा । इससे धर्म की अपूर्व-प्रभावना हुर्इ। श्रद्धा और मनोयोग-पूर्वक इसके पाठ से सुख-शांति मिलती है और सारे मनोरथ पूर्ण होते हैं।”
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“(इसके आदि या अंत में ‘आलोचना-पाठ’ बोलकर फिर तीसरे सामायिक भाव-कर्म का पाठ करना चाहिए।)”
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“मैनासुन्दरि कियो पाठ यह, पर्व-अठाइनि में,”
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“श्री सिद्धचक्र का पाठ करो, दिन आठ,”
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“पाठ करे चालीस दिन, नित चालीस ही बार ।”
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“नित चालीसहिं बार, पाठ करे चालीस दिन ।”
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“नित चालीसहिं बार, पाठ करे चालीस दिन ।”
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“नित चालीसहिं बार, पाठ करे चालीस दिन ।”
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“नर सुर खग करि वंदनीक जे, तिनको भविजन पाठ कराय”
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“(अभिषेक, पूजन-विधान के बाद इन जाप्यों को जपना चाहिए। फिर शांतिपाठ, विसर्जन करें।)”
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“दीपमालिका के दिन प्रात:काल उठकर सामायिक, स्तुतिपाठ कर, शौच-स्नानादि से निवृत्त हो श्री जैनमंदिर में पूजन करनी चाहिए और निर्वाणकल्याणक (पृष्ठ 53), निर्वाणक्षेत्र-पूजा (पृष्ठ 312, 321), निर्वाणकांड (पृष्ठ 396), महावीराष्टक (पृष्ठ 577) बोलकर निर्वाणलड्डू चढ़ाना च…”
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“श्रीसिद्धांत-सुपाठका:, मुनिवरा रत्नत्रयाराधका:”
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“कियो ललित-थुति-पाठ हिये सब समझ सकै नवि”
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“इन दिनों में पूजन पाठ तथा सिद्धचक्र विधान करने का महान् फल है।”
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“हर एक श्रावक नीचे लिखे दिनों में कल्याणक पाठ सहित पूजन और स्वाध्याय जरूर करें”
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“जैनागम में अर्हन्त, अरिहन्त और अरुहन्त ये तीन पाठान्तर मिलते हैं”
विवरण खोलें →आचार्य उमास्वामी (उमास्वाति)
आचार्य उमास्वामी (उमास्वाति) विरचित तत्त्वार्थसूत्र के दस अध्यायों का पूर्ण, अनुभागबद्ध और खोजयोग्य संस्कृत पाठ।
विवरण खोलें →आचार्य अमृतचन्द्र
आचार्य अमृतचन्द्र विरचित पुरुषार्थसिद्ध्युपाय (जिनप्रवचनरहस्यकोष) के 226 श्लोकों का पूर्ण, अनुभागबद्ध और खोजयोग्य मूल संस्कृत पाठ।
विवरण खोलें →मंगल मूर्ति परम पद, पंच धरौं नित ध्यान | हरो अमंगल विश्व का, मंगलमय भगवान |१| मंगल जिनवर पद नमौं, मंगल अरिहन्त देव | मंगलकारी सिद्ध पद, सो वन्दौं स्वय...
विवरण खोलें →कविश्री बुधजन (दोहा) तुम निरखत मुझको मिली, मेरी सम्पत्ति आज | कहाँ चक्रवर्ति-संपदा, कहाँ स्वर्ग-साम्राज ||१|| तुम वंदत जिनदेवजी, नित-नव मंगल होय | विघ...
विवरण खोलें →कवि श्री जुगलकिशोर शास्त्रोक्त-विधि पूजा-महोत्सव सुरपती चक्री करें | हम सारिखे लघु-पुरुष कैसे यथाविधि पूजा करें || धन-क्रिया-ज्ञानरहित न जानें रीति-पू...
विवरण खोलें →ज्ञानतोऽज्ञानतो वापि शास्त्रोक्तं न कृतं मया | तत्सर्वं पूर्णमेवास्तु त्वत्प्रसादाज्जिनेश्वर ||१|| आह्वाननं नैव जानामि नैव जानामि पूजनम् | विसर्जनं न...
विवरण खोलें →(अर्थ रहित) (अर्थ सहित) (अर्थ रहित) शांतिनाथ ! मुख शशि-उनहारी, शील-गुण-व्रत, संयमधारी | लखन एकसौ-आठ विराजें, निरखत नयन-कमल-दल लाजें ||१|| अर्थ- हे शां...
विवरण खोलें →बिन जाने या जान के, रही टूट जो कोय | तुम प्रसाद से परम गुरु, सो सब पूरन होय || पूजन विधि जानूँ नहीं, नहिं जानूँ आह्वान | और विसर्जन भी नहीं, क्षमा करो...
विवरण खोलें →(दोहा) परिणामों की स्वच्छता, के निमित्त जिनबिम्ब | इसीलिए मैं निरखता, इनमें निज-प्रतिबिम्ब || पंच-प्रभू के चरण में, वंदन करूँ त्रिकाल | निर्मल-जल से क...
विवरण खोलें →श्री अमितगति-सूरि-विरचित ‘परमात्म-द्वात्रिंशतिका’ का पद्यानुवाद कविश्री रामचरित उपाध्याय नित देव! मेरी आत्मा, धारण करे इस नेम को, मैत्री करे सब प्राणि...
विवरण खोलें →कविश्री जौहरी (दोहा) वंदूं पाँचों परम-गुरु, चौबीसों जिनराज | करूँ शुद्ध आलोचना, शुद्धि-करन के काज ||१|| (सखी छन्द) सुनिये जिन! अरज हमारी, हम दोष किये...
विवरण खोलें →कविश्री द्यानतराय गौतमस्वामी वंदूं नामी, मरणसमाधि भला है | मैं कब पाऊँ निशदिन ध्याऊँ, गाऊँ वचन-कला है || देव-धर्म-गुरु प्रीति महा दृढ़, सप्त-व्यसन नहि...
विवरण खोलें →कविवर पं. दौलतराम (दोहा) सकल-ज्ञेय-ज्ञायक तदपि, निजानंद-रस-लीन | सो जिनेन्द्र जयवंत नित, अरि-रज-रहस-विहीन || जय वीतराग-विज्ञान पूर, जय मोह, तिमिर को ह...
विवरण खोलें →ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्हं वं मं हं सं तं पं वंवं मंमं हंहं संसं तंतं पंपं झंझं झ्वीं झ्वीं क्ष्वीं क्ष्वीं द्रां द्रां द्रीं द्रीं द्रावय-द्रावय नम...
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