श्री अरहनाथ-जिन पूजा
(पूजन विधि निर्देश) (छप्पय छन्द, वीर रस, रूपकालंकार) तप-तुरंग-असवार, धार तारन-विवेक कर। ध्यान-शुकल असि-धार, शुद्ध-सुविचार सुबखतर। भावन सेना, धर्म दशों...
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(पूजन विधि निर्देश) (छप्पय छन्द, वीर रस, रूपकालंकार) तप-तुरंग-असवार, धार तारन-विवेक कर। ध्यान-शुकल असि-धार, शुद्ध-सुविचार सुबखतर। भावन सेना, धर्म दशों...
पढ़ें →(पूजन विधि निर्देश) (छन्द रोड़क) अपराजित-तें आय, नाथ मिथलापुर जाये। कुंभराय के नंद, प्रभावति-मात बताये।। कनक-वरन तन तुंग, धनुष-पच्चीस विराजे। सो प्रभु...
पढ़ें →(पूजन विधि निर्देश) (छंद : रोड़क) श्री नमिनाथ-जिनेन्द्र नमूं विजयारथ-नंदन। विख्यादेवी-मातु सहज सब पाप-निकंदन।। अपराजित तजि जये मिथिलापुर वर आनंदन। तिन...
पढ़ें →(पूजन विधि निर्देश) (छन्द लक्ष्मी तथा अर्द्धलक्ष्मीधरा) जैतिजै जैतिजै जैतिजै नेम की, धर्म-औतार दातार श्यौचैन की। श्री शिवानंद भौफंद-निकंद, ध्यावें जिन...
पढ़ें →(पूजन विधि निर्देश) प्रानत-देवलोक तें आये, वामा दे-उर जगदाधार। अश्वसेन सुत नुत हरिहर हरि, अंक हरित तन सुखदातार।। जरत नाग जुग बोधि दियो जिहिं, भुवनेसुर...
पढ़ें →(कवि श्री रवीन्द्रजी) (पूजन विधि निर्देश) देव-शास्त्र-गुरुवर अहो! मम स्वरूप दर्शाय | किया परम उपकार मैं, नमन करूँ हर्षाय || जब मैं आता आप ढिंग, निज स्...
पढ़ें →कविश्री वृन्दावनदास (पूजन विधि निर्देश) (मत्त-गयंद छन्द) श्रीमत वीर हरें भव-पीर, भरें सुख-सीर अनाकुलतार्इ | केहरि-अंक अरीकर-दंक, नयें हरि-पंकति-मौलि स...
पढ़ें →कवि श्री वृन्दावनदास (पूजन विधि निर्देश) (छन्द चौबोला) ऋषभ अजित संभव अभिनंदन, सुमति पदम सुपार्श्व जिनराय | चंद पुहुप शीतल श्रेयांस-जिन, वासुपूज्य पूजि...
पढ़ें →श्री वृषभो न: स्वस्ति, स्वस्ति श्री अजित:| श्री संभव: स्वस्ति, स्वस्ति श्री अभिनंदन:| श्री सुमति: स्वस्ति, स्वस्ति श्री पद्मप्रभ:| श्री सुपार्श्वः स्व...
पढ़ें →(इस विधान में परम–ऋषियों (परमेष्ठियों) में प्रकट आत्मा की चौंसठ (64) ऋद्धियों का स्मरण कर पुष्प–क्षेपण किया गया है। ऋद्धि का अर्थ आत्मा की वह शक्ति है...
पढ़ें →द्रव्य आठों जु लीना है, अर्घ्य कर में नवीना है। पूजतां पाप छीना है, ‘भानुमल’ जोर कीना है।। द्वीप अढ़ार्इ सरस राजै, क्षेत्र दश ता-विषै छाजें। सात शत बी...
पढ़ें →(पूर्ण-पूजन हेतु पृष्ठ 384 देखें) गौतमादिक सर्वे एकदश गणधरा | वीर जिन के मुनि सहस चौदह वरा || नीर गंधाक्षतं पुष्प चरु दीपकं | धूप फल अर्घ्य ले हम जजें...
पढ़ें →लाभ में अंतराय के वश जीव सुख ना लहे | जो करे कष्ट-उत्पात सगरे कर्मवश विरथा रहे || नहिं जोर वा को चले इक-छिन दीन सो जग में फिरे | अरिहंत-सिद्ध सु अधर-ध...
पढ़ें →आचार्य श्री विद्याभूषण सन्मतिसागर जी (पूजन विधि निर्देश) (गीतिका छन्द) किया नहिं बैर कमठासुर, क्षमा वसुधा सुहार्इ है | जगी करुणा अमल हृदय, नाग-नागिन द...
पढ़ें →आचार्य उमास्वामी मोक्षमार्गस्य नेतारं भेत्तारं कर्मभूभृताम् । ज्ञातारं विश्वतत्त्वानां वंदे तद्गुणलब्धये || त्रैकाल्यं द्रव्य-षट्कं नव-पद-सहितं जीव-षट...
पढ़ें →महीनों के क्रम से पंच- कल्याणक तिथियाँ श्रावकगण नीचे लिखे दिनों में अवश्य पूजन एवं स्वाध्याय करें, क्योंकि ऐसा करने से विशेष-पुण्य व लाभ की प्राप्ति ह...
पढ़ें →श्री चौबीस तीर्थंकरों की पंच कल्याणक तिथियाँ हर एक श्रावक नीचे लिखे दिनों में कल्याणक पाठ सहित पूजन और स्वाध्याय जरूर करें | इससे अतिशय पुण्य और लाभ क...
पढ़ें →सूतक में देव-शास्त्र-गुरु का पूजन-प्रक्षालादि तथा मंदिर जी की जाजम-वस्त्रादि को स्पर्श नहीं करना चाहिये। सूतक का समय पूर्ण हुए बाद पूजनादि, सत्पात्र-द...
पढ़ें →प्रतिकार-रहित उपसर्ग आने पर, दुष्काल होने पर, बुढ़ापा अथवा रोग विशेष के हो जाने पर, रत्नत्रय धर्म की आराधना करते हुये शरीर का त्याग करना सल्लेखना है |...
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