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109 परिणाम “जैन” के लिए

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समस्त जैन अर्घ्यावली — महार्घ्य, शांतिपाठ एवं विसर्जन

परंपरागत दिगम्बर जैन पूजा-पाठ

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“जैनागम का वह सुधा कलश जो बिखराते हैं गली-गली।”

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अर्घ्य संग्रह
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सरस्वती चालीसा

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“दृष्टिवाद के पाँच भेद हैं, जिन्हें बताते जैन वेद हैं।।११।।”

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स्वस्ति (मंगल) विधान

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“श्रीमूलसंघ-सुदृशां सुकृतैकहेतुर्, जैनेन्द्र-यज्ञ-विधिरेष मयाऽभ्यधायि”

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अथ श्री मंगलाष्टक स्तोत्रम्

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“अर्थ:- इन्द्रों द्वारा जिनकी पूजा की गई, ऐसे अरिहन्त भगवान्, सिद्ध-पद के स्वामी सिद्ध भगवान्, जिनशासन को समुन्नत करनेवाले आचार्य, जैन-सिद्धांत को सुव्यवस्थित पढ़ानेवाले उपाध्याय, रत्नत्रय के आराधक साधु, ये पाँचों परमेष्ठी प्रतिदिन मंगल करें।”

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समुच्चय पूजा

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“अनेकांतमय द्वादशांगी बखानी, नमौं लोकमाता श्री जैनवाणी”

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दशलक्षण-धर्म पूजा

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“श्री जैनवानी तत्त्वज्ञानी, भर्इ विषय-पयोगता”

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स्वयंभूस्तोत्र-भाषा

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“…ं मैं आज्ञा सिद्ध हूँ, अधिक क्या कहूँ, सिद्ध सारस्वत हूँ और अब आपके सम्मुख जैन-वादी खड़ा है, जिसकी शक्ति हो मुझसे शास्त्रार्थ कर ले।”

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क्षमावणी पर्व-पूजा

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“जैनधर्म में शंक न आने, सो नि:शंकित गुण चित ठाने”

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उपसर्ग-हर स्तोत्र

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“जिन व्यक्तियों की कुंडली में कालसर्प योग हो उसे उपसर्ग-हर स्तोत्र का पाठ, इस दोष को शांत कर जीवन में आशातीत सफलता दिलाता है, जैन-जैनेतर ग्रंथों में इसकी महत्ता है ।”

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शांति पाठ (संस्कृत)

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“जैनेन्द्रं धर्मचक्रं, प्रभवतु सततं सर्वसौख्यप्रदायि”

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