अनेकान्तवाद और स्याद्वाद: संक्षिप्त परिचय
JainSudha सम्पादकीय सार
वस्तु के अनेक पक्ष और कथन की सापेक्ष शर्त को समझने वाला आरम्भिक अध्ययन।
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नाम याद न हो तो पाठ की कोई पंक्ति लिखें—हिन्दी, देवनागरी या Roman English में।
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JainSudha सम्पादकीय सार
वस्तु के अनेक पक्ष और कथन की सापेक्ष शर्त को समझने वाला आरम्भिक अध्ययन।
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वर्तमान अवसर्पिणी के चौबीस तीर्थंकरों और दिगम्बर परम्परा में प्रचलित लांछनों की संदर्भ-सूची।
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उत्तम क्षमा से उत्तम ब्रह्मचर्य तक दिगम्बर परम्परा के दस धर्मों का संक्षिप्त अध्ययन।
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अहिंसा और अपरिग्रह को भोजन, वाणी, उपभोग और दैनिक निर्णयों में लागू करने के व्यावहारिक संकेत।
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सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चरित्र को साथ समझने वाला संक्षिप्त अध्ययन।
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णमोकार मंत्र में नमस्कार किये जाने वाले पाँच परम पदों का सरल अर्थ।
पढ़ें →श्री ऋषभदेवाय नम: | श्री महावीराय नम: | श्री गौतम-गणधराय नम: | श्री केवलज्ञान-लक्ष्म्यै नम: | श्री जिन-सरस्वत्यै नम:। शरशभ मतकरतक कषण अमवसयवर नरवण सव...
पढ़ें →श्री रत्नाकर सूरि विरचित स्तोत्र का हिन्दी पद्यानुवाद कविश्री रामचरित उपाध्याय शुभ-केलि के आनंद के धन के मनोहर धाम हो, नरनाथ से सुरनाथ से पूजित चरण ग...
पढ़ें →कविश्री मंगतराय (दोहा) वंदूँ श्री अरिहंतपद, वीतराग विज्ञान | वरणूँ बारह भावना, जग-जीवन-हित जान ||१|| (विष्णुपद छंद) कहाँ गये चक्री जिन जीता, भरतखंड सा...
पढ़ें →कविश्री भूधर दासजी (अनित्य भावना) राजा राणा छत्रपति, हाथिन के असवार | मरना सबको एक दिन, अपनी-अपनी बार ||१|| (अशरण भावना) दल-बल देवी-देवता, मात-पिता-पर...
पढ़ें →कविश्री जुगलकिशोर जिसने राग-द्वेष-कामादिक जीते, सब जग जान लिया | सब जीवों को मोक्षमार्ग का, निस्पृह हो उपदेश दिया || बुद्ध-वीर-जिन-हरि-हर-ब्रह्मा, या...
पढ़ें →कविश्री वृन्दावन दास (शैर की लय में तथा और रागिनियों में भी बनती है।) श्रीपति जिनवर करुणायतनं, दु:खहरन तुम्हारा बाना है | मत मेरी बार अबार करो, मोहि द...
पढ़ें →कविश्री मनोहरलाल वर्णी ‘सहजानंद’ हूँ स्वतंत्र निश्चल निष्काम, ज्ञाता-दृष्टा आतम-राम | मैं वह हूँ जो हैं भगवान्, जो मैं हूँ वह हैं भगवान् | अन्तर यही ऊ...
पढ़ें →भावना दिन-रात मेरी, सब सुखी संसार हो | सत्य-संयम-शील का, व्यवहार हर घर-बार हो || धर्म का परचार हो, अरु देश का उद्धार हो | और ये उजड़ा हुआ, भारत चमन गु...
पढ़ें →कविश्री मनोहरलाल वर्णी ‘सहजानंद’ मैं दर्शन-ज्ञान-स्वरूपी हूँ, मैं सहजानंद-स्वरूपी हूँ | हूँ ज्ञानमात्र परभाव शून्य, हूँ सहज-ज्ञानघन स्वयंपूर्ण | हूँ स...
पढ़ें →यहाँ से इस अवसर्पिणी-काल में भगवान् आदिनाथ जी, वासुपूज्य जी, नेमिनाथ जी एवं भगवान् महावीर स्वामी को छोड़कर शेष बीस तीर्थंकर मोक्ष पधारे हैं। इस वंदना...
पढ़ें →रस-त्याग के अभ्यास से हम अपनी जिव्हा इंद्रिय पर नियंत्रण कर सकते हैं | रविवार को – नमक (खारे पदार्थ) सोमवार को – हरे फल, सब्जियां मंगलवार को – मीठे पद...
पढ़ें →श्रावक की भूमिका में मोक्षमार्ग के अनुरूप आचरण करने के लिए ग्यारह प्रतिमा व्रतों का पालन करते हुए धर्म साधना करते है :- प्रथम: दर्शन प्रतिमा: धारक सा...
पढ़ें →जैन परंपरा का मूल मंगल मंत्र।
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