पठन सामग्री
रत्नत्रय: मोक्षमार्ग के तीन आधार
सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चरित्र को साथ समझने वाला संक्षिप्त अध्ययन।
मूल पाठ
अक्षर आकार ऊपर से बदलेंतत्त्वार्थसूत्र का आरम्भिक सूत्र सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चरित्र को मोक्षमार्ग बताता है। इन तीनों को रत्नत्रय या तीन रत्न कहा जाता है।
सम्यग्दर्शन
तत्त्वों के यथार्थ स्वरूप में श्रद्धा। इसका अर्थ अंधविश्वास नहीं, बल्कि सत्य को ग्रहण करने की सही दृष्टि, विनय और पूर्वाग्रह से मुक्ति की दिशा है।
सम्यग्ज्ञान
वस्तु को जैसा है वैसा, संदेह, भ्रम और विपरीत समझ से रहित जानना। अध्ययन, मनन और अनुभूति ज्ञान को परिपक्व करते हैं। केवल सूचना-संग्रह को सम्यग्ज्ञान नहीं कहा जा सकता।
सम्यक्चरित्र
जानी और मानी हुई बात को आचरण में उतारना। अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, संयम और कषायों की शान्ति इसकी दिशा दिखाते हैं।
तीनों का संबंध
दृष्टि बिना ज्ञान दिशाहीन हो सकता है, ज्ञान बिना आचरण निष्फल रह सकता है और आचरण बिना सही समझ यांत्रिक बन सकता है। इसलिए रत्नत्रय को अलग-अलग सीढ़ियाँ ही नहीं, परस्पर सहायक साधना माना जाता है। गृहस्थ अपने स्तर पर सम्यक दृष्टि, नियमित स्वाध्याय, सीमित व्रत और सजग व्यवहार से इसका अभ्यास कर सकता है।