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देव-स्तुति

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“दुष्टन देहु निकार, साधुन को रख लीजे”

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पंच कल्याणक: पाँच मंगल घटनाएँ

JainSudha सम्पादकीय सार

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“पंच कल्याणक तीर्थंकर के अंतिम भव की पाँच अत्यन्त मंगल घटनाओं का क्रम है। पूजा, प्रतिष्ठा, कथा और तीर्थक्षेत्रों में इनका विशेष स्मरण होता है।”

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चौबीस तीर्थंकर: क्रम और दिगम्बर लांछन

JainSudha सम्पादकीय सार

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“तीर्थंकर वह जिन हैं जो केवलज्ञान के बाद चार प्रकार के संघ के लिए मोक्षमार्ग का तीर्थ स्थापित करते हैं। वर्तमान अवसर्पिणी काल में चौबीस तीर्थंकर माने जाते हैं। प्रतिमा की पहचान में लांछन सहायक होता है।”

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दिगम्बर सिद्धान्त और ग्रंथ-परम्परा

JainSudha सम्पादकीय सार

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“• प्रथमानुयोग — महापुरुषों, तीर्थंकरों और धार्मिक कथाओं के माध्यम से आदर्श जीवन का वर्णन।”

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जाप्य-मंत्र-सूची

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“ओं ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं श्री वृषभनाथ तीर्थंकराय नम:।”

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कृत्रिम-अकृत्रिम चैत्य-चैत्यालयों की अर्चना

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“ॐ ह्रीं श्री​त्रिलोक संबंधी कृ​त्रिमाकृ​त्रिम–चैत्य-चैत्यालयेभ्य: अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।”

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समुच्चय महार्घ्य

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“ॐ ह्रीं अरिहंत्सिद्धाचार्योपाध्याय-सर्वसाधुभ्यो द्वादशांगजिनागमेभ्यो उत्तमक्षमादि-दशलक्षण-धर्माय दर्शनविशुद्ध्यादि-षोडशकारणेभ्यो सम्यग्दर्शन-सम्यग्ज्ञान-सम्यक्चारित्रेभ्यो त्रिलोकस्थित जिनबिम्बेभ्यो पंचमेरु-सम्बन्धि-अशीति-जिनचैत्यालयस्थ जिनबिम्बेभ्यो नंदीश्वर-…”

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श्री वीर-निर्वाणोत्सव : दीपावली-पूजन

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“जिस समय अधर्म बढ़ रहा था, धर्म के नाम पर असंख्य पशुओं को यज्ञ की बलि-वेदी पर होमा जाता था, संसार में अज्ञान छा रहा था और जब संसार के लोग आत्मा के उद्धार करनेवाले सत्य-मार्ग को भूल रहे थे, ऐसे भयंकर समय में जगत् के प्राणियों को सत्यमार्ग दर्शाने व दु:खपीड़ित वि…”

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शुभ + लाभ

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“(विधि करानेवाले यह बही दुकान के प्रमुख सज्जन के हाथों में देवें और पुष्प क्षेपें। इसके बाद नीचे लिखा हुआ पद व मंत्र पढ़कर शुभकामना करें और उन सज्जन को फूलमाला पहिनाकर पुष्प-क्षेपण करें)”

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तत्त्वार्थसूत्रम् (मोक्षशास्त्रम्)

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“दर्शन-विशुद्धिर्विनयसम्पत्रता-शीलव्रतेष्वनतीचारोऽभीक्ष्णज्ञानोपयोग-संवेगौ-शक्तितस्त्याग-तपसी-साधुसमाधिर्वैयावृत्यकरणमर्हदाचार्य-बहुश्रुत-प्रवचनभक्तिरावश्यका -परिहाणिर्मार्गप्रभावना-प्रवचनवत्सलत्वमिति तीर्थंकरत्वस्य”

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भूपाल चतुर्विंशतिका (हिन्दी)

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“मूल संस्कृत-काव्य कवि भूपाल की रचना है। इसमें अलंकार की अनुपम-छटा छिटक रही है। भूपाल 11-12वीं शताब्दी के उच्चकोटि के कवि हैं। उनका अधिक परिचय प्राप्त नहीं है। इस हिंदी अनुवाद का उपकार कविश्री भूधरदास द्वारा हुआ है”

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मेरी-भावना

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“अहंकार का भाव न रक्खूँ, नहीं किसी पर क्रोध करूँ”

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