सामायिक पाठ : काल-अनंत भ्रम्यो
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“वर्द्धमान जिन नमूँ वमूँ भवदु:ख कर्मकृत”
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“वर्द्धमान जिन नमूँ वमूँ भवदु:ख कर्मकृत”
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“दुष्टन देहु निकार, साधुन को रख लीजे”
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“महासंकटों से निकारे विधाता, सबे संपदा सर्व को देहि दाता”
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“तुम जग में सर्वज्ञ कहाओ, छट्ठे तीर्थंकर कहलाओ ।”
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“तुम जग में सर्वज्ञ कहावो, अष्टम-तीर्थंकर कहलावो ।।८।।”
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“एक तपस्वी देख वहाँ पर, उससे बोले वचन सुनाकर ।।४।।”
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“काला नाग होय फन धारी, या हो शेर भयंकर भारी ।।१३।।”
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“अस्माकं (शांतिधारा-कर्ता का नाम) श्री तीर्थंकरभक्ति- प्रसादात्”
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“2. विद्यमान बीस तीर्थंकरों का अर्घ्य”
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“हे वीतरागी नाथ! तुमको, भी सरागी मानकर”
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“द्रव्य-भाव-नोकर्म शून्य, चैतन्य प्रभु जब से देखा”
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“पंच कल्याणक तीर्थंकर के अंतिम भव की पाँच अत्यन्त मंगल घटनाओं का क्रम है। पूजा, प्रतिष्ठा, कथा और तीर्थक्षेत्रों में इनका विशेष स्मरण होता है।”
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“तीर्थंकर वह जिन हैं जो केवलज्ञान के बाद चार प्रकार के संघ के लिए मोक्षमार्ग का तीर्थ स्थापित करते हैं। वर्तमान अवसर्पिणी काल में चौबीस तीर्थंकर माने जाते हैं। प्रतिमा की पहचान में लांछन सहायक होता है।”
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“२. उत्तम मार्दव — अहंकार घटाकर विनय और सरलता।”
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“• प्रथमानुयोग — महापुरुषों, तीर्थंकरों और धार्मिक कथाओं के माध्यम से आदर्श जीवन का वर्णन।”
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“ओं ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं श्री वृषभनाथ तीर्थंकराय नम:।”
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“ॐ ह्रीं श्रीत्रिलोक संबंधी कृत्रिमाकृत्रिम–चैत्य-चैत्यालयेभ्य: अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।”
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“ॐ ह्रीं अरिहंत्सिद्धाचार्योपाध्याय-सर्वसाधुभ्यो द्वादशांगजिनागमेभ्यो उत्तमक्षमादि-दशलक्षण-धर्माय दर्शनविशुद्ध्यादि-षोडशकारणेभ्यो सम्यग्दर्शन-सम्यग्ज्ञान-सम्यक्चारित्रेभ्यो त्रिलोकस्थित जिनबिम्बेभ्यो पंचमेरु-सम्बन्धि-अशीति-जिनचैत्यालयस्थ जिनबिम्बेभ्यो नंदीश्वर-…”
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“वे वन्दनीय जिनेश, तीर्थंकर स्वयं महावीर हैं”
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“जिस समय अधर्म बढ़ रहा था, धर्म के नाम पर असंख्य पशुओं को यज्ञ की बलि-वेदी पर होमा जाता था, संसार में अज्ञान छा रहा था और जब संसार के लोग आत्मा के उद्धार करनेवाले सत्य-मार्ग को भूल रहे थे, ऐसे भयंकर समय में जगत् के प्राणियों को सत्यमार्ग दर्शाने व दु:खपीड़ित वि…”
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“विहरमान बीस तीर्थंकरों का अर्घ्य”
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“तबै नौकारूपा, भव जलधि माँही अवतरी”
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“(विधि करानेवाले यह बही दुकान के प्रमुख सज्जन के हाथों में देवें और पुष्प क्षेपें। इसके बाद नीचे लिखा हुआ पद व मंत्र पढ़कर शुभकामना करें और उन सज्जन को फूलमाला पहिनाकर पुष्प-क्षेपण करें)”
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“चरम तीर्थंकर चरम शरीर, ‘पावापुरि’ स्वामी महावीर”
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“दर्शन-विशुद्धिर्विनयसम्पत्रता-शीलव्रतेष्वनतीचारोऽभीक्ष्णज्ञानोपयोग-संवेगौ-शक्तितस्त्याग-तपसी-साधुसमाधिर्वैयावृत्यकरणमर्हदाचार्य-बहुश्रुत-प्रवचनभक्तिरावश्यका -परिहाणिर्मार्गप्रभावना-प्रवचनवत्सलत्वमिति तीर्थंकरत्वस्य”
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“34. तीर्थंकर महावीर”
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“मूल संस्कृत-काव्य कवि भूपाल की रचना है। इसमें अलंकार की अनुपम-छटा छिटक रही है। भूपाल 11-12वीं शताब्दी के उच्चकोटि के कवि हैं। उनका अधिक परिचय प्राप्त नहीं है। इस हिंदी अनुवाद का उपकार कविश्री भूधरदास द्वारा हुआ है”
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“श्री रत्नाकर सूरि विरचित स्तोत्र का हिन्दी पद्यानुवाद”
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“अहंकार का भाव न रक्खूँ, नहीं किसी पर क्रोध करूँ”
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“एक दिवस शुभ कर्म-संजोगे, क्षेमंकर मुनि वंदे”
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