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पंच कल्याणक: पाँच मंगल घटनाएँ

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तीर्थंकर जीवन से जुड़ी गर्भ, जन्म, दीक्षा, केवलज्ञान और मोक्ष की पाँच कल्याणक घटनाएँ।

जैन ज्ञान HindiDevanagari

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पंच कल्याणक तीर्थंकर के अंतिम भव की पाँच अत्यन्त मंगल घटनाओं का क्रम है। पूजा, प्रतिष्ठा, कथा और तीर्थक्षेत्रों में इनका विशेष स्मरण होता है।

१. गर्भ कल्याणक
तीर्थंकर जीव का माता के गर्भ में अवतरण। परम्परागत कथाओं में माता के शुभ स्वप्न और देवों द्वारा उत्सव का वर्णन मिलता है।

२. जन्म कल्याणक
तीर्थंकर का जन्म। अभिषेक, आनन्द और लोक-कल्याण की संभावना से जुड़ी कथाएँ इस घटना को विशिष्ट बनाती हैं।

३. तप या दीक्षा कल्याणक
राज्य, परिवार और परिग्रह छोड़कर मुनि-दीक्षा तथा कठोर साधना का आरम्भ। अलग स्रोत इसे दीक्षा या तप कल्याणक नाम से लिख सकते हैं।

४. ज्ञान कल्याणक
घातिया कर्मों के क्षय के बाद केवलज्ञान की प्राप्ति। तीर्थंकर समवसरण में धर्मोपदेश देते हैं और चार प्रकार के संघ का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

५. मोक्ष या निर्वाण कल्याणक
शेष कर्मों के पूर्ण क्षय के बाद जन्म-मरण से मुक्ति और सिद्ध अवस्था की प्राप्ति।

कल्याणक को केवल बाहरी उत्सव नहीं, आन्तरिक यात्रा के संकेत की तरह भी पढ़ा जा सकता है—शुभ दिशा, त्याग, ज्ञान और पूर्ण वीतरागता। किसी विशेष तीर्थंकर की तिथि या स्थान की जानकारी लेते समय परम्परागत पंचांग और प्रमाणित ग्रंथ का मिलान करें।

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