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छह द्रव्य: जैन दर्शन में विश्व का आधार

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जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल—छह द्रव्यों की सरल व्याख्या।

जैन ज्ञान HindiDevanagari

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जैन दर्शन में द्रव्य वह है जिसमें गुण और पर्याय होते हैं। विश्व को छह मूल द्रव्यों से समझाया जाता है।

१. जीव द्रव्य — चेतना और उपयोग इसका विशिष्ट लक्षण है। जीव अनन्त माने गये हैं।
२. पुद्गल द्रव्य — रूप, रस, गंध और स्पर्श वाला भौतिक द्रव्य। सूक्ष्म कर्म-पुद्गल से लेकर स्थूल शरीर तक पुद्गल के रूप हैं।
३. धर्मास्तिकाय — गति करने वाले जीव और पुद्गल के लिए गति का माध्यम। यहाँ धर्म का अर्थ पुण्य या धार्मिक आचरण नहीं है।
४. अधर्मास्तिकाय — जीव और पुद्गल के ठहरने का माध्यम। यहाँ अधर्म का अर्थ पाप नहीं है।
५. आकाश द्रव्य — अन्य द्रव्यों को अवकाश देता है। लोकाकाश में अन्य पाँच द्रव्य पाए जाते हैं; अलोकाकाश उससे परे अवकाश है।
६. काल द्रव्य — परिवर्तन और क्रम को समझने का आधार। दिगम्बर व्याख्या में काल को स्वतंत्र द्रव्य माना जाता है।

अस्तिकाय शब्द ऐसे द्रव्य के लिए आता है जिसके अनेक प्रदेश माने जाते हैं। काल को छोड़कर शेष पाँच को पंचास्तिकाय कहा जाता है। छह द्रव्य का अध्ययन जीव-अजीव, परिवर्तन, कर्म और ब्रह्माण्ड-विज्ञान को एक साथ समझने में सहायता देता है।

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