पठन सामग्री
दिगम्बर जैन परम्परा: एक परिचय
दिगम्बर शब्द, साधु-आचार, संघ और परम्परा की प्रमुख विशेषताओं का संतुलित परिचय।
मूल पाठ
अक्षर आकार ऊपर से बदलेंदिगम्बर जैन परम्परा जैन धर्म की दो प्रमुख परम्पराओं में से एक है। संस्कृत में दिक् का अर्थ दिशा और अम्बर का अर्थ वस्त्र है; इसलिए दिगम्बर का भावार्थ दिशाओं को वस्त्र मानने वाला या आकाश-वस्त्रधारी है। यह नाम मुख्यतः पूर्ण दिगम्बर मुनियों के कठोर अपरिग्रह से जुड़ा है।
साधु-आचार
पूर्ण मुनि वस्त्र और निजी संपत्ति का त्याग करते हैं। पिच्छी और कमण्डलु जैसे सीमित उपकरण भी संयम, जीव-दया और शुद्धि से जुड़े होते हैं। ऐलक और क्षुल्लक क्रमशः प्रारम्भिक या मध्यवर्ती त्याग-स्थितियाँ हैं, जबकि आर्यिकाएँ श्वेत वस्त्र धारण करती हैं। इन रूपों को केवल बाहरी पहचान नहीं, बल्कि परिग्रह घटाने की साधना के रूप में समझना चाहिए।
चार प्रकार का संघ
जैन संघ में मुनि, आर्यिका, श्रावक और श्राविका सम्मिलित माने जाते हैं। गृहस्थ अनुयायी पूर्ण मुनि-व्रतों के स्थान पर अपनी क्षमता के अनुसार अणुव्रत, पूजा, स्वाध्याय, दान और संयम का अभ्यास करते हैं।
साझे आधार
अहिंसा, अनेकान्त, कर्म-सिद्धान्त, आत्मा की शुद्धि, रत्नत्रय और मोक्ष का लक्ष्य सम्पूर्ण जैन परम्परा के मूल विषय हैं। दिगम्बर और श्वेताम्बर परम्पराओं में ग्रंथ-सूची, मुनि-आचार और कुछ दार्शनिक व्याख्याओं में अंतर हैं, फिर भी दोनों जिन, कर्म और मोक्षमार्ग के केंद्रीय सिद्धान्तों को मानती हैं।
दिगम्बर समाज के भीतर भी तेरापंथ, बीसपंथ और तारणपंथ जैसी परम्पराएँ हैं। स्थानीय आचार और पूजा-विधि में भिन्नता हो सकती है; इसलिए किसी एक प्रचलन को सभी दिगम्बर समुदायों पर लागू नहीं समझना चाहिए।