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सात तत्त्व: जीव से मोक्ष तक

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जीव, अजीव, आस्रव, बन्ध, संवर, निर्जरा और मोक्ष का क्रमबद्ध परिचय।

जैन ज्ञान HindiDevanagari

मूल पाठ

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जैन दर्शन में सात तत्त्व संसार, कर्म और मुक्ति की प्रक्रिया को समझने का आधार देते हैं।

१. जीव — चेतना वाला आत्म-द्रव्य। संसारी जीव कर्म के कारण अलग-अलग शरीर और अवस्थाएँ प्राप्त करता है।
२. अजीव — चेतना-रहित द्रव्यों का व्यापक वर्ग। इसमें पुद्गल, धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, आकाश और काल का विचार आता है।
३. आस्रव — मन, वचन और काय की गतिविधियों तथा कषायों के कारण कर्म का आत्मा की ओर प्रवाह।
४. बन्ध — कर्म-पुद्गल का आत्मा से बंधना। कर्म की प्रकृति, अवधि, तीव्रता और मात्रा के अनुसार उसका प्रभाव समझाया जाता है।
५. संवर — नये कर्म के प्रवाह को रोकना। संयम, सावधानी, व्रत, ध्यान और कषाय-नियंत्रण इसके साधन माने जाते हैं।
६. निर्जरा — पहले से बंधे कर्मों का क्षय। तप, प्रायश्चित्त, ध्यान और समता को इस प्रक्रिया से जोड़ा जाता है।
७. मोक्ष — सभी कर्मों से पूर्ण मुक्ति और आत्मा की सिद्ध अवस्था।

इनका क्रम एक व्यावहारिक प्रश्न-माला भी है: मैं कौन हूँ, बन्धन कैसे बनता है, उसे कैसे रोका जाए और मुक्ति की दिशा क्या है? कुछ परम्पराएँ पुण्य और पाप को जोड़कर नौ पदार्थों की चर्चा भी करती हैं; वर्गीकरण में अंतर होने पर मूल संदर्भ अवश्य देखना चाहिए।

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