पठन सामग्री
कर्म-प्रक्रिया: आस्रव, बन्ध, संवर और निर्जरा
जैन कर्म-सिद्धान्त में बन्धन से मुक्ति तक की चार मुख्य प्रक्रियाओं का सरल मानचित्र।
मूल पाठ
अक्षर आकार ऊपर से बदलेंजैन दर्शन कर्म को केवल भाग्य या नैतिक हिसाब नहीं, बल्कि आत्मा से बंधने वाले सूक्ष्म पुद्गल के रूप में समझाता है। मन, वचन और काय की गतिविधि तथा कषाय कर्म-सम्बन्ध को प्रभावित करते हैं।
आस्रव
आत्मा की ओर कर्म का प्रवाह। असावधानी, हिंसा, असत्य, चोरी, विषयासक्ति, संग्रह और क्रोध-मान-माया-लोभ जैसे भाव आस्रव को बढ़ाते हैं।
बन्ध
आये हुए कर्म-पुद्गल का आत्मा से जुड़ना। जैन ग्रंथ बन्ध को प्रकृति, स्थिति, अनुभाग और प्रदेश जैसे पहलुओं से समझाते हैं—कौन-सा कर्म, कितने समय, कितनी तीव्रता और कितनी मात्रा में बंधा।
संवर
नये कर्म के प्रवाह को रोकना। गुप्ति, समिति, धर्म, अनुप्रेक्षा, परीषहजय और चारित्र जैसे साधनों का विवेचन ग्रंथों में मिलता है। व्यवहार में सजगता, संयम और कषायों को शांत करना इसकी दिशा है।
निर्जरा
पहले से बंधे कर्मों का क्षय। स्वाभाविक फल के समय कर्म क्षीण होता है; साधना, तप और समता से शीघ्र या साधित निर्जरा का विचार भी किया जाता है।
मोक्ष
जब नया बन्ध रुकता है और समस्त बंधे कर्म पूर्णतः नष्ट हो जाते हैं, तब आत्मा मुक्त सिद्ध अवस्था को प्राप्त करती है। यह सार केवल प्रारम्भिक मानचित्र है; आठ मूल कर्मों और उनके उपभेदों का अध्ययन अलग से आवश्यक है।