समस्त जैन अर्घ्यावली — महार्घ्य, शांतिपाठ एवं विसर्जन
परंपरागत दिगम्बर जैन पूजा-पाठ
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“अरिहंत श्रुत सिद्धांत गुरु निर्ग्रंथ नित पूजा रचूँ”
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139 परिणाम “पूजा” के लिए
परंपरागत दिगम्बर जैन पूजा-पाठ
मिलती हुई पंक्ति
“अरिहंत श्रुत सिद्धांत गुरु निर्ग्रंथ नित पूजा रचूँ”
पढ़ें →आचार्य अमृतचन्द्र
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“दानतपोजिनपूजाविद्यातिशयैश् च जिनधर्मः ॥ ३० ॥”
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“हम उनकी ही पूजा करने, पहुँचे थे वहाँ स्वर्गलोक से।।२०।।”
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“पिता सुदर्शन धन्य कहाते, देवों द्वारा पूजा पाते।।४।।”
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“मात-पिता की पूजा करते, पुन: न गर्भवास हो जिससे।।७।।”
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“उनमें क्षेत्रपाल जगनामी ,हर शुभ कार्य में पूजा मानी”
पढ़ें →महाकवि धनपाल
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“[पूजावसरे सदृशः सदृष्टश्चक्रस त्वमपि भरतेन ।”
पढ़ें →कवि भूपाल
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“चीर्णान्युग्रतपांसि तेन सुचिरं पूजाश्च बह्व्यः कृताः ।”
पढ़ें →आचार्य वादिराज
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“१, पूजयेत्. 'चायृ पूजानिशामनयोः'. २. कुष्ठरोगाक्रान्तं मदीयं शरीरमिति”
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“पूजा प्रारम्भ करते समय नौ बार णमोकार मंत्र पढ़कर, विनय पाठ और मंगल पाठ बोलकर पूजा प्रारम्भ करनी चाहिए”
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“अर्थ- जल, चन्दन, अक्षत्, पुष्प, नैवेद्य, दीप, धूप, फल व अर्घ्य से, धवल-मंगल गीतों की ध्वनि से पूरित मंदिर जी में (भगवान के) कल्याणकों की पूजा करता हूँ”
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“… स्वामी की परम्परा) वर्त्ती भव्य जीवों के कल्याण की भावना से मैं जिनेन्द्र पूजा की विधि आरम्भ करता हूँ”
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“अरिहंत श्रुत-सिद्धांत गुरु-निर्ग्रन्थ नित पूजा रचूँ”
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“तिन सबकी पूजा करूँ, मन-वच-तन धरि शीस”
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“अर्थ:- इन्द्रों द्वारा जिनकी पूजा की गई, ऐसे अरिहन्त भगवान्, सिद्ध-पद के स्वामी सिद्ध भगवान्, जिनशासन को समुन्नत करनेवाले आचार्य, जैन-सिद्धांत को सुव्यवस्थित पढ़ानेवाले उपाध्याय, रत्नत्रय के आराधक साधु, ये पाँचों परमेष्ठी प्रतिदिन मंगल करें।”
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“… चूर्ण से, दिव्य सुगंधित द्रव्य से, दिव्य अभिषेक से हमेशा अर्चना करते हैं, पूजा करते हैं, वन्दना करते हैं, नमस्कार करते हैं। मैं भी यहीं से वहाँ स्थित सभी प्रतिमाओं की हमेशा अर्चना करता हूँ, पूजा करता हूँ, वंदना करता हूँ, नमस्कार करता हूँ। मेरे दु:ख क्षय हों,…”
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“पूजाएँ दो प्रकार से की जा सकती हैं। ‘द्रव्यपूजा’ द्रव्याष्टक बोलते हुए क्रमश: द्रव्य चढ़ाते हुए करते हैं। जबकि ‘भावपूजा’ आरम्भ–परिग्रह त्यागने वाले श्रावक, मुनिगण तथा बिना सामग्री के पूजन करने के इच्छुक मन के भावों से ‘भावाष्टक’ बोलकर करते हैं। सिद्धों की पूजा…”
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“कीज्यो शीतल छाँह, चंदन से पूजा करूँ”
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“इन्द्र आय पूजा करी, मैं पूजूं यह थान”
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“शास्त्रोक्त-विधि पूजा-महोत्सव सुरपती चक्री करें”
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“तुम आदिनाथ अनादि सेऊँ, सेय पद-पूजा करूँ”
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“जिन-पूजा तें सब सुख होय, जिन-पूजा-सम अवर न कोय”
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“नाथ! तोरी पूजा को फल पायो,”
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“यह मोह तड़क कर टूट पड़े, प्रभु! सार्थक फल पूजा तेरी”
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“हे चाँदखेड़ी के आदिनाथ प्रभु! तुम पद-पूजा करता हूँ”
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“तेरे चरणों की पूजा से मैं, परम-पदारथ पाया हूँ”
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“आये कौशाम्बी नगर, पद-पूजा के काज”
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“पूजा में ध्यान लगाने को, अक्षत धोकर ले आया हूँ”
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“मंत्री नृप चाँदनगाँव आय, दर्शन करि पूजा विधि बनाय”
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“जो भव्य श्रद्धा भक्ति से नवदेवता पूजा करें”
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