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विषापहार स्तोत्रम् — संस्कृत मुक्त संस्करण

महाकवि धनञ्जय

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“नानार्थमेकार्थमदस्त्वदुक्तं हितं वचस्ते निशमय्य वक्तुः ।”

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चतुर्विंशति तीर्थंकर स्वस्ति मंगल विधान

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“।।इति श्रीचतुर्विंशति–तीर्थंकर स्वस्ति मंगलविधानं पुष्पांजलिं क्षिपामि।।”

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तीस चौबीसी का अर्घ्य

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“ॐ ह्रीं पंचभरत, पंचऐरावत, दशक्षेत्रविषयेषु ​त्रिंशति चतुर्विंशतीनां विंशति अधिकसप्तशत तीर्थंकरेभ्य: नम: अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा”

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अथ श्री मंगलाष्टक स्तोत्रम्

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“अर्थ:- शोभायुक्त और नमस्कार करते हुए देवेन्द्रों और असुरेन्द्रों के मुकुटों के चमकदार रत्नों की कान्ति से जिनके श्रीचरणों के नखरूपी चन्द्रमा की ज्योति स्फुरायमान हो रही है, जो प्रवचनरूप सागर के लिए स्थायी चन्द्रमा हैं एवं योगीजन जिनकी स्तुति करते रहते हैं, ऐसे…”

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श्री आदिनाथ-जिन पूजा (चाँदखेड़ी)

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“ॐ ह्रीं फाल्गुनकृष्ण-एकादश्यां केवलज्ञान-मंडिताय श्री आदिनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।४।”

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श्री पद्मप्रभ जिन पूजा (बाड़ा)

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“ॐ ह्रीं फाल्गुनकृष्ण-चतुर्थ्यां मोक्षमंगल-प्राप्ताय श्रीपद्मप्रभजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।५।”

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