चौबीस तीर्थंकर निर्वाणभूमि चालीसा
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“चौबीस तीर्थंकर नमूँ, नमूँ सिद्ध भगवान”
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“चौबीस तीर्थंकर नमूँ, नमूँ सिद्ध भगवान”
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“जन्में यहाँ अनंतों जिनवर, पूज्य धरा यह सर्वहितंकर”
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“बाकी के इक्किस तीर्थंकर, खड्गासन से पहुँचे शिवपुर।।२७।।”
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“वे थीं तीर्थंकर की माता, जिन्हें नमावें देव भी माथा।।४।।”
पढ़ें →महाकवि धनपाल
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“मोहतिमिरौधदिनकर नगर गुणगणानां पौरागाम् ॥]”
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“वाग्देवीरतिकेतनं जयरमाक्रीडानिधानं महत् ।”
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“येन स्मरास्त्रनिकरैरपराजितेन”
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“स्तत्किं चित्रं जिन वपुरिदं यत्सुवर्णीकरोषि ॥ ४ ॥”
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“नानार्थमेकार्थमदस्त्वदुक्तं हितं वचस्ते निशमय्य वक्तुः ।”
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“।।इति श्रीचतुर्विंशति–तीर्थंकर स्वस्ति मंगलविधानं पुष्पांजलिं क्षिपामि।।”
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“जंघाऽनल-श्रेणि-फलांबु-तंतु-प्रसून-बीजांकुर-चारणाह्वा:”
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“सुरपति उरग नरनाथ तिनकरि वंदनीक सुपद-प्रभा”
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“ॐ ह्रीं पंचभरत, पंचऐरावत, दशक्षेत्रविषयेषु त्रिंशति चतुर्विंशतीनां विंशति अधिकसप्तशत तीर्थंकरेभ्य: नम: अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा”
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“द्वीप अढ़ाई मेरु पन, सब तीर्थंकर बीस”
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“अर्थ:- शोभायुक्त और नमस्कार करते हुए देवेन्द्रों और असुरेन्द्रों के मुकुटों के चमकदार रत्नों की कान्ति से जिनके श्रीचरणों के नखरूपी चन्द्रमा की ज्योति स्फुरायमान हो रही है, जो प्रवचनरूप सागर के लिए स्थायी चन्द्रमा हैं एवं योगीजन जिनकी स्तुति करते रहते हैं, ऐसे…”
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“जन्म-जन्मकृतं पापं, दर्शनेन विनश्यति”
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“गनिये अठारह दोष तिनकरि रहित देव निरंजनो”
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“ता पर वारिज रच्यो प्रभा दिनकर छिपै”
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“अंत:पत्र-तटेष्वनाहत-युतं ह्रींकार-संवेष्टितम्”
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“यश्चिन्तामणि-शुद्ध-भाव-परमं ज्ञानात्मकैरर्चयेत्,”
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“तुष-खंड निकारे जल सु-पखारे, पुंज तुम्हारे ढिंग धारे”
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“जबै जानकी राम ने जो निकारी,”
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“अनुक्रमसों शिव लहे, ’रत्न’ इमि कहें पुकारे”
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“यह विरद सुनकर शरण आयो, कृपा कीज्यो नाथजी”
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“जिन-पूजा तें स्वर्ग-विमान, अनुक्रम तें पावें निर्वाण”
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“ॐ ह्रीं फाल्गुनकृष्ण-एकादश्यां केवलज्ञान-मंडिताय श्री आदिनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।४।”
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“जब प्रथम तीर्थंकर ऋषभ की, सृष्टि में जय-जय-जय हुर्इ”
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“ॐ ह्रीं फाल्गुनकृष्ण-चतुर्थ्यां मोक्षमंगल-प्राप्ताय श्रीपद्मप्रभजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।५।”
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“यह क्षुधा मिटाने को प्रभुवर, नैवेद्य बनाकर लाया हूँ”
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“भव-भव निज पर उपकार किया, तीर्थंकर पुण्य सँजोया था”
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