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चौबीस तीर्थंकर चालीसा

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“बाकी के इक्किस तीर्थंकर, खड्गासन से पहुँचे शिवपुर।।२७।।”

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तीस चौबीसी का अर्घ्य

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“ॐ ह्रीं पंचभरत, पंचऐरावत, दशक्षेत्रविषयेषु ​त्रिंशति चतुर्विंशतीनां विंशति अधिकसप्तशत तीर्थंकरेभ्य: नम: अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा”

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अथ श्री मंगलाष्टक स्तोत्रम्

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“अर्थ:- शोभायुक्त और नमस्कार करते हुए देवेन्द्रों और असुरेन्द्रों के मुकुटों के चमकदार रत्नों की कान्ति से जिनके श्रीचरणों के नखरूपी चन्द्रमा की ज्योति स्फुरायमान हो रही है, जो प्रवचनरूप सागर के लिए स्थायी चन्द्रमा हैं एवं योगीजन जिनकी स्तुति करते रहते हैं, ऐसे…”

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जलाभिषेक पाठ

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“ता पर वारिज रच्यो प्रभा दिनकर छिपै”

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श्री आदिनाथ-जिन पूजा (चाँदखेड़ी)

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“ॐ ह्रीं फाल्गुनकृष्ण-एकादश्यां केवलज्ञान-मंडिताय श्री आदिनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।४।”

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श्री पद्मप्रभ जिन पूजा (बाड़ा)

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“ॐ ह्रीं फाल्गुनकृष्ण-चतुर्थ्यां मोक्षमंगल-प्राप्ताय श्रीपद्मप्रभजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।५।”

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